PNB अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- विभागीय जांच में कर्मचारी को निष्पक्ष और प्रभावी बचाव का अवसर मिलना जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने PNB अधिकारी की 2012 की बर्खास्तगी रद्द करते हुए कहा कि संबंधित दस्तावेज और मूल रिकॉर्ड उपलब्ध न कराना, महत्वपूर्ण गवाहों से जिरह का अवसर न देना और बचाव साक्ष्य रोकना निष्पक्ष सुनवाई से इनकार है। कोर्ट ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों को ‘नो एविडेंस’ पर आधारित माना।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के एक पूर्व अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि विभागीय जांच में कर्मचारी को निष्पक्ष और प्रभावी बचाव का अवसर मिलना जरूरी है। संबंधित दस्तावेज उपलब्ध न कराना, विवादित दस्तावेजों की मूल प्रतियां पेश न करना, महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही न कराना और प्रासंगिक बचाव साक्ष्य पेश करने से रोकना, सामूहिक रूप से कर्मचारी के बचाव को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
न्यायमूर्ति इरशाद अली ने 18 सितंबर के आदेश में कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी द्वारा दर्ज दोषसिद्धि के निष्कर्ष अनुमानों, धारणाओं और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे, इसलिए यह ‘no evidence’ का मामला था।
चाणक्य के अर्थशास्त्र का किया उल्लेख
कोर्ट ने अपने फैसले में चाणक्य के संस्कृत ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ का उल्लेख करते हुए न्याय और दंड के सिद्धांत पर जोर दिया। फैसले में कहा गया कि अपराध के अनुपात में दंड दिया जाना चाहिए और न्याय का उचित तरीके से प्रशासन होना चाहिए।
हालांकि, मामले का निर्णय विभागीय जांच में उपलब्ध साक्ष्य और अपनाई गई प्रक्रिया के न्यायिक परीक्षण के आधार पर किया गया।
1978 में PNB में क्लर्क के रूप में हुई थी नियुक्ति
याचिकाकर्ता ने दिसंबर 1978 में PNB में क्लर्क-कम-कैशियर के रूप में सेवा शुरू की थी। वर्ष 1984 में उन्हें Officer Grade-I और 1987 में Assistant Manager के पद पर पदोन्नति मिली।
वह लखनऊ के विधान सभा मार्ग स्थित शाखा में Assistant Manager के रूप में तैनात थे, तभी फरवरी 1999 में उनके खिलाफ धोखाधड़ी और बैंक निधियों के कथित दुरुपयोग से संबंधित FIR दर्ज हुई। उन्हें मार्च 1999 में गिरफ्तार किया गया और अप्रैल 2002 में चार्जशीट दाखिल की गई।
बचाव के लिए मांगे थे 48 महत्वपूर्ण दस्तावेज
विभागीय कार्यवाही के दौरान अधिकारी ने अपने बचाव के लिए 48 महत्वपूर्ण दस्तावेज मांगे थे। उनका आरोप था कि बैंक ने इन दस्तावेजों की मूल प्रतियां उपलब्ध नहीं कराईं और असत्यापित फोटोकॉपी पर भरोसा किया।
इसके अलावा, महत्वपूर्ण गवाहों और दस्तावेजों के लेखकों की गवाही भी नहीं कराई गई। इनमें मुख्य शिकायतकर्ता भी शामिल था। याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें महत्वपूर्ण बचाव गवाह पेश करने की अनुमति भी नहीं दी गई और कई तारीखों पर कार्यवाही उनके उचित नोटिस के बिना एकतरफा (ex parte) आगे बढ़ाई गई।
उन्होंने गवाहों से जिरह करने की अनुमति मांगी, लेकिन उनकी मांगें स्वीकार नहीं की गईं।
2012 में हुई थी बर्खास्तगी
नवंबर 2012 में अनुशासनिक प्राधिकारी ने अधिकारी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को सिद्ध मानते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके साथ भविष्य में रोजगार के लिए उनकी पात्रता भी समाप्त कर दी गई और निलंबन अवधि के वेतन से संबंधित प्रतिकूल आदेश भी दिया गया।
वर्ष 2014 में विभागीय अपील भी खारिज कर दी गई। अपीलीय प्राधिकारी ने संक्षिप्त आदेश में कहा कि अधिकारी आरोपों को गलत साबित करने में विफल रहे।
इसके बाद अधिकारी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
बैंक पर ही था आरोप साबित करने का दायित्व
हाईकोर्ट ने पाया कि अनुशासनिक और अपीलीय दोनों प्राधिकारियों ने आरोपों को साबित करने का दायित्व बैंक पर डालने के बजाय कर्मचारी पर यह जिम्मेदारी डाल दी कि वह अपने खिलाफ आरोपों को गलत साबित करे।
कोर्ट ने कहा कि यह दृष्टिकोण सही नहीं था।
पीठ ने कहा कि मामला महज इस बात पर असहमति का नहीं है कि विभागीय अधिकारियों ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन किस तरह किया। चुनौती पूरी विभागीय जांच की बुनियाद पर है।
‘सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर’ होने का दावा भी साबित नहीं हुआ
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी था कि बैंक अधिकारी को ‘System Administrator’ के रूप में तैनात किए जाने के आधार पर कुछ आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने पाया कि PNB यह साबित नहीं कर सका कि याचिकाकर्ता वास्तव में कभी इस पद पर तैनात था। खास तौर पर कोर्ट ने उस सिविल मुकदमे का उल्लेख किया, जिसे स्वयं बैंक ने दायर किया था और जिसमें सिविल कोर्ट पहले ही स्पष्ट निष्कर्ष दे चुका था कि बैंक यह साबित नहीं कर पाया कि अधिकारी ‘System Administrator’ के पद पर था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय प्राधिकारी इस महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे।
‘नो एविडेंस’ का मामला
कोर्ट ने दस्तावेजों, गवाहों और विभागीय जांच की प्रक्रिया का समग्र मूल्यांकन करते हुए पाया कि—
- महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए;
- मूल दस्तावेज पेश नहीं किए गए;
- महत्वपूर्ण गवाहों की जांच नहीं हुई;
- बचाव साक्ष्य पेश करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया;
- जिस बुनियादी तथ्य पर प्रबंधन का मामला आधारित था, वह साबित नहीं हुआ;
- अनुशासनिक और अपीलीय प्राधिकारियों ने याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर सार्थक विचार नहीं किया।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने जांच अधिकारी के निष्कर्षों को अनुमान और hearsay पर आधारित माना और कहा कि यह ‘no evidence’ का क्लासिक मामला है।
बर्खास्तगी का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को विभागीय कार्यवाही में निष्पक्ष और प्रभावी बचाव का अवसर नहीं मिला। इसलिए 2012 का बर्खास्तगी आदेश और उसके बाद अपीलीय प्राधिकारी का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता।
इस फैसले में कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि विभागीय कार्यवाही में कर्मचारी को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप प्रासंगिक दस्तावेज, साक्ष्य और प्रभावी जिरह का अवसर दिया जाना जांच की वैधता के लिए महत्वपूर्ण है।
विभागीय जांच में न्यायिक समीक्षा केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि जांच अधिकारी ने साक्ष्यों का मूल्यांकन अलग तरीके से किया या नहीं। यदि आरोप साबित करने के लिए आवश्यक मूल साक्ष्य ही उपलब्ध नहीं कराया गया, महत्वपूर्ण गवाहों की जांच नहीं हुई और कर्मचारी को प्रभावी बचाव का अवसर नहीं मिला, तो ऐसी कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निष्पक्ष विभागीय प्रक्रिया की कसौटी पर विफल हो सकती है।
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