संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति की रजिस्ट्री आदेश नहीं : कलकत्ता हाई कोर्ट

Like to Share

एक ही सौदे में दोहरी भूमिका पर भी कोर्ट ने जताई चिंता

वह एक ओर मूल आवंटी के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक (Attorney) के रूप में विक्रय विलेख पर हस्ताक्षर कर रहा था, जबकि दूसरी ओर उसी संपत्ति का खरीदार भी स्वयं वही था।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि संदिग्ध दस्तावेजों और अप्रमाणित भुगतान के आधार पर किसी व्यक्ति के पक्ष में संपत्ति का रजिस्ट्री (Conveyance Deed) कराने का आदेश नहीं दिया जा सकता। ऐसे स्वामित्व विवाद का समाधान सिविल मुकदमे के जरिए ही होगा।


संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति की रजिस्ट्री का आदेश नहीं दिया जा सकता: कलकत्ता हाई कोर्ट

कलकत्ता हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के स्वामित्व (Title) पर संदेह हो, दस्तावेज संदिग्ध हों और भुगतान का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न हो, तो अदालत उसके पक्ष में संपत्ति का रजिस्ट्री (Conveyance Deed) कराने का आदेश नहीं दे सकती।

न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति एम.डी. शब्बार रशीदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि स्वामित्व और संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़े जटिल विवादों का निपटारा केवल विधिवत दायर सिविल वाद में मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।


क्या था मामला?

यह मामला संचयनी सेविंग्स एंड इन्वेस्टमेंट (इंडिया) लिमिटेड से जुड़ा था, जो विभिन्न रियल एस्टेट परियोजनाएं विकसित कर रही थी। बाद में कंपनी परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया में चली गई और हाई कोर्ट ने कंपनी के कार्यों के संचालन के लिए एक विशेष अधिकारी (Special Officer) नियुक्त किया।

कंपनी ने परिसमापन से पहले कई खरीदारों को आवासीय इकाइयां आवंटित की थीं। इनमें से एक आवंटी (Original Allottee) को नवी मुंबई के सीबीडी बेलापुर स्थित एक फ्लैट आवंटित किया गया था। हालांकि, बाद में वह आवंटी संपर्क से बाहर हो गया और अदालत की ओर से नोटिस दिए जाने के बावजूद उसका पता नहीं चल सका।


आवेदक ने किस आधार पर किया दावा?

आवेदक ने दावा किया कि मूल आवंटी ने 5 मार्च 2019 को एक पंजीकृत विक्रय विलेख (Registered Sale Deed) के माध्यम से उक्त फ्लैट के सभी अधिकार उसके पक्ष में हस्तांतरित कर दिए थे।

Must Read -  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से NI Act के तहत अनुसूचित अपराधों के मुकदमों में तेजी लाने के लिए विशेष अदालतों का विस्तार करने का आग्रह किया

उसने अदालत से अनुरोध किया कि विशेष अधिकारी को निर्देश दिया जाए कि वह संबंधित फ्लैट के संबंध में उसके पक्ष में कन्वेयंस डीड (Conveyance Deed) निष्पादित एवं पंजीकृत करें।

आवेदक का कहना था कि उसने हाउसिंग सोसाइटी के सभी बकाया भुगतान भी कर दिए हैं और यदि कोई अन्य राशि शेष हो तो उसे चुकाने के लिए भी तैयार है।


विशेष अधिकारी ने उठाए गंभीर सवाल

विशेष अधिकारी ने इस दावे का विरोध करते हुए कई गंभीर आपत्तियां उठाईं।

उन्होंने बताया कि मूल आवंटी का लंबे समय से कोई पता नहीं चल रहा है और आवेदक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यता संदिग्ध प्रतीत होती है।

विशेष अधिकारी ने यह भी बताया कि जिस अवधि में कथित भुगतान किए गए, उस समय स्वयं आवेदक संबंधित हाउसिंग सोसाइटी का सचिव (Secretary) था।

रिकॉर्ड के अनुसार जुलाई से दिसंबर 2018 के बीच लगभग 12 भुगतान किए जाने का दावा किया गया, जिनमें—

  • लगभग 10.99 लाख रुपये सोसाइटी को,
  • 8 लाख रुपये नकद,
  • तथा लगभग 10 लाख रुपये संपत्ति कर (Property Tax) के रूप में भुगतान का उल्लेख था।

लेकिन इन भुगतानों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए।


एक ही सौदे में दोहरी भूमिका पर भी कोर्ट ने जताई चिंता

अदालत ने यह भी नोट किया कि आवेदक ने एक ही लेन-देन में दो अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।

वह एक ओर मूल आवंटी के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक (Attorney) के रूप में विक्रय विलेख पर हस्ताक्षर कर रहा था, जबकि दूसरी ओर उसी संपत्ति का खरीदार भी स्वयं वही था।

हाई कोर्ट ने कहा कि यह असामान्य व्यवस्था स्वयं इस लेन-देन की वैधता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करती है।


भुगतानों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला

अदालत ने पाया कि—

  • कथित नकद भुगतान का कोई विश्वसनीय दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं था।
  • संपत्ति कर जमा करने का भी पर्याप्त रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
  • विशेष अधिकारी द्वारा अनुरोध किए जाने के बावजूद हाउसिंग सोसाइटी ने भी इन भुगतानों की पुष्टि नहीं की।

ऐसी स्थिति में केवल हलफनामों (Affidavits) के आधार पर इन विवादित तथ्यों का निर्णय नहीं किया जा सकता।


सिविल मुकदमे में ही तय होगा स्वामित्व

हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला संपत्ति के स्वामित्व और हस्तांतरण की वैधता से जुड़े गंभीर विवादों का है।

Must Read -  अदालतें शापिंग फोरम नहीं जो एक ही मामले में बार-बार आएं : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

ऐसे विवादों का समाधान केवल मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर विधिवत दायर सिविल मुकदमे में ही किया जा सकता है।

अदालत ने आवेदक को सलाह दी कि वह कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 446 के तहत अनुमति लेकर सिविल वाद दायर कर अपने अधिकार सिद्ध करे।

हालांकि, आवेदक ने स्वयं ऐसा करने से इनकार कर दिया।


एसेट सेल कमेटी की सिफारिश का भी लिया संज्ञान

हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि एसेट सेल कमेटी ने संदिग्ध परिस्थितियों और बकाया भुगतान को देखते हुए संबंधित फ्लैट को सार्वजनिक नीलामी (Public Auction) के माध्यम से बेचने की सिफारिश की थी।

इस सिफारिश को भी किसी ने चुनौती नहीं दी थी।


हाई कोर्ट का फैसला

हाई कोर्ट ने कहा कि आवेदक अपने पक्ष में स्पष्ट, निर्विवाद और वैध स्वामित्व (Clear and Undisputed Title) सिद्ध करने में असफल रहा है।

चूंकि दस्तावेजों और भुगतानों की प्रामाणिकता संदेह के घेरे में है तथा आवेदक ने सिविल मुकदमा दायर करने का उचित कानूनी उपाय भी नहीं अपनाया, इसलिए अदालत विशेष अधिकारी को उसके पक्ष में कन्वेयंस डीड निष्पादित करने का निर्देश नहीं दे सकती।

इन्हीं कारणों से अदालत ने अपील खारिज कर दी।


Tags

#CalcuttaHighCourt #PropertyDispute #ConveyanceDeed #CivilSuit #PropertyLaw #RealEstate #TitleDispute #HousingSociety #CompaniesAct #LegalNews #कलकत्ता_हाईकोर्ट #संपत्ति_विवाद #कन्वेयंस_डीड #सिविल_वाद #रियल_एस्टेट #कंपनी_अधिनियम #कानूनी_समाचार

Leave a Comment