340 करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी और वैट चोरी मामले में सुरेश खेमानी और अशोक खेमानी की याचिका खारिज
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 340 करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी और वैट चोरी मामले में सुरेश खेमानी और अशोक खेमानी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि विभागीय कार्यवाही और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग हैं तथा सीबीआई के पास साजिश और फर्जी दस्तावेजों के पर्याप्त सबूत हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट से खेमानी बंधुओं को बड़ा झटका
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक्साइज ड्यूटी और वैट का भुगतान न करके लगभग 340 करोड़ रुपये की कथित टैक्स चोरी के मामले में सुरेश खेमानी और अशोक खेमानी को राहत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस शिवकुमार डिगे की एकल पीठ ने दोनों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही उनके खिलाफ औपचारिक ट्रायल का रास्ता साफ हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, वर्ष 2005 से 2010 के बीच रॉयल डिस्टिलरीज और खेमानी डिस्टिलरीज नामक कंपनियों पर भारी मात्रा में एक्साइज ड्यूटी और वैट की चोरी करने का आरोप है। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में यह भी आरोप लगाया कि टैक्स चोरी को अंजाम देने के लिए फर्जी दस्तावेजों और नकली बिलों का इस्तेमाल किया गया।
इन वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने के आरोप में सीबीआई ने खेमानी बंधुओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया था।
आपराधिक कार्रवाई रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट पहुंचे थे खेमानी बंधु
सुरेश खेमानी और अशोक खेमानी ने सीबीआई द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कराने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि संबंधित एक्साइज और वैट विभाग पहले ही उन्हें आरोपों से मुक्त कर चुके हैं। ऐसे में उन्हीं आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना कानून के अनुरूप नहीं है।
विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा अलग-अलग: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति तथा मानक अलग-अलग होते हैं।
अदालत ने कहा कि भले ही विभागीय स्तर पर सबूतों के अभाव में नोटिस समाप्त कर दिए गए हों, लेकिन सीबीआई के पास कथित साजिश, फर्जी बिल तैयार करने और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के संबंध में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।
शुरुआती चरण में आरोपों को खारिज करना उचित नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की इस प्रारंभिक अवस्था में आरोपों को निराधार बताकर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करना उचित नहीं होगा। आरोपों की सत्यता और तथ्यों का परीक्षण ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि यह तय करना कि आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं, ट्रायल कोर्ट का विषय है और इस स्तर पर हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज
इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खेमानी बंधुओं की याचिका खारिज कर दी और उन्हें किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया। अब सीबीआई द्वारा दायर मामले में नियमित आपराधिक ट्रायल आगे बढ़ेगा।
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