गर्भावस्था नौकरी में बाधा नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने PET टालने से इनकार को बताया असंवैधानिक, महिला अभ्यर्थी को बड़ी राहत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था किसी महिला को सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया से बाहर करने का आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने यूपी वन रक्षक भर्ती में गर्भवती अभ्यर्थी के लिए दोबारा PET कराने और एक OBC (महिला) पद सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि गर्भावस्था किसी महिला अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) को निर्देश दिया कि वह वन रक्षक (Forest Guard) और वन्यजीव रक्षक (Wildlife Guard) भर्ती में नौ माह की गर्भवती अभ्यर्थी का चार सप्ताह के भीतर शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) आयोजित करे।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक अभ्यर्थी का परिणाम घोषित नहीं हो जाता, तब तक OBC (महिला) श्रेणी का एक पद रिक्त रखा जाए। यदि वह PET और चयन प्रक्रिया के अन्य चरणों में सफल होकर मेरिट में आती है, तो उसे नियुक्ति दी जाए।
कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा गर्भावस्था के आधार पर PET स्थगित करने से इनकार करना महिला को मां बनने और रोजगार पाने के अधिकार के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करता है, जो संविधान के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने कहा,
“गर्भावस्था के कारण PET स्थगित करने से इनकार करना एक महिला को बच्चे को जन्म देने और रोजगार के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करता है। यह उसके प्रजनन के अधिकार (Right of Reproduction) और रोजगार के अधिकार (Right to Employment) दोनों में हस्तक्षेप है।”
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता कोमल जायसवाल ने 12 सितंबर 2023 को जारी विज्ञापन के तहत वन रक्षक एवं वन्यजीव रक्षक पदों के लिए आवेदन किया था।
भर्ती प्रक्रिया के दौरान:
- नवंबर 2023 में उनका विवाह हुआ।
- मई 2025 में वह गर्भवती हुईं।
- उन्होंने 9 नवंबर 2025 को लिखित परीक्षा दी और सफल रहीं।
- 8 जनवरी 2026 को परिणाम घोषित हुआ।
- इसके बाद उन्हें 10 से 19 फरवरी 2026 के बीच आयोजित PET में शामिल होना था, जिसमें 4 घंटे के भीतर 14 किलोमीटर पैदल चलना अनिवार्य था।
उस समय वह नौ माह की गर्भवती थीं। उन्होंने 27 जनवरी 2026 को आयोग से प्रसव के बाद लगभग एक माह के लिए PET स्थगित करने का अनुरोध किया, लेकिन आयोग ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।
हाई कोर्ट ने आयोग के रवैये पर जताई नाराजगी
अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश वन विभाग अधीनस्थ सेवा नियम, 2015 में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि PET स्थगित नहीं किया जा सकता। यदि नियम किसी विशेष परिस्थिति पर मौन हैं, तो आयोग के पास असाधारण परिस्थितियों में राहत देने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन और लिखित परीक्षा के बीच दो वर्ष से अधिक का समय था। इस दौरान अभ्यर्थी का विवाह हुआ और वह गर्भवती हुई। ऐसे में आयोग को संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था।
मातृत्व को बताया प्राकृतिक अवस्था
हाई कोर्ट ने कहा कि मातृत्व किसी महिला के जीवन की सबसे स्वाभाविक अवस्था है। इसे सरकारी नौकरी पाने में बाधा नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गर्भावस्था न तो नियुक्ति के लिए अयोग्यता है और न ही चयन प्रक्रिया में भाग लेने पर कोई कानूनी प्रतिबंध।
आयोग की दलील भी खारिज
आयोग ने अदालत को बताया कि 709 पदों के विरुद्ध 332 महिला अभ्यर्थी पहले ही मेडिकल परीक्षा पास कर चुकी हैं।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि इससे याचिकाकर्ता का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि वह PET पास करती हैं और मेरिट में आती हैं तो उन्हें नियुक्ति का अधिकार मिलेगा।
हाई कोर्ट के निर्देश
अदालत ने विशेष अपील स्वीकार करते हुए:
- एकल न्यायाधीश का आदेश रद्द कर दिया।
- आयोग को चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता की PET कराने का निर्देश दिया।
- OBC (महिला) श्रेणी का एक पद रिक्त रखने का आदेश दिया।
- यदि याचिकाकर्ता चयन प्रक्रिया के सभी चरणों में सफल होती हैं और मेरिट में आती हैं, तो उन्हें उसी तिथि से नियुक्ति देने का निर्देश दिया, जिस दिन उनकी श्रेणी में उनसे कम मेरिट वाले उम्मीदवार को नियुक्ति मिली थी।
यह फैसला महिलाओं के रोजगार के अधिकार, मातृत्व अधिकार और लैंगिक समानता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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