छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 वर्षीय बेटे की कस्टडी पिता को सौंपी, कहा- बच्चे की इच्छा और कल्याण सर्वोपरि

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 वर्षीय बच्चे की कस्टडी पिता के पास बरकरार रखते हुए मां की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि बच्चे की इच्छा और उसका सर्वोत्तम हित (वेलफेयर) ही कस्टडी मामलों में सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है।


छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आठ वर्षीय बच्चे की कस्टडी उसके पिता के पास बरकरार रखते हुए मां की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े मामलों में बच्चे का सर्वोत्तम हित (Welfare of the Child) सर्वोपरि होता है। अदालत ने बच्चे से बातचीत के बाद पाया कि वह अपने पिता के साथ ही रहना चाहता है और उसे पिता तथा सौतेली मां दोनों से उचित देखभाल, स्नेह और शिक्षा मिल रही है।

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने 22 जुलाई के आदेश में कहा कि बच्चे ने स्पष्ट रूप से अपने पिता के साथ रहने की इच्छा जताई और मां के साथ जाने से इनकार किया।

बच्चे ने क्या बताया?

अदालत ने बच्चे से व्यक्तिगत बातचीत की। इस दौरान उसने बताया कि उसके पिता और सौतेली मां उसकी अच्छी तरह देखभाल करते हैं, उसे पर्याप्त ध्यान मिलता है और उसकी पढ़ाई भी ठीक से कराई जा रही है।

अदालत ने आदेश में कहा कि बातचीत के दौरान बच्चे ने स्पष्ट किया कि वह अपने पिता के साथ ही रहना चाहता है और उसे किसी प्रकार की उपेक्षा या दुर्व्यवहार का सामना नहीं करना पड़ रहा है।

मां ने क्या दलील दी?

मां ने गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 और हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 के तहत बेटे की कस्टडी की मांग की थी। उनका कहना था कि वह बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकती हैं।

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उन्होंने आरोप लगाया कि पिता के दोबारा विवाह के बाद बच्चे के साथ सौतेली मां जैसा व्यवहार किया जा रहा है और भविष्य में उसके साथ कोई अप्रिय घटना होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें बेटे से मिलने नहीं दिया जाता, जिससे वे मातृत्व के सुख से वंचित हो रही हैं।

पिता का पक्ष

पिता ने बताया कि दोनों का विवाह वर्ष 2016 में हुआ था और बाद में आपसी सहमति से तलाक हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी अक्सर विवाद कर मायके चली जाती थी और अंततः तलाक पर जोर दिया।

उन्होंने अदालत को बताया कि वह ड्राइवर के रूप में कार्य करते हैं, प्रतिदिन लगभग 500 रुपये कमाते हैं और बेटे की शिक्षा तथा पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मां ने भी पुनर्विवाह कर लिया है और उनका एक अन्य पुत्र है। ऐसे में बच्चे के साथ सौतेले पिता जैसा व्यवहार होने की आशंका भी हो सकती है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने कहा कि दोनों माता-पिता स्वयं को बच्चे के लिए बेहतर अभिभावक बता रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि सिद्धांत है।

खंडपीठ ने पाया कि पिता लंबे समय से बच्चे की देखभाल कर रहे हैं और उसकी शिक्षा का भी ध्यान रख रहे हैं। बच्चे की स्पष्ट इच्छा भी पिता के साथ रहने की थी। ऐसे में परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने मां की अपील खारिज कर दी और पिता की कस्टडी बरकरार रखते हुए मां के विजिटेशन राइट्स (मुलाकात के अधिकार) जारी रखे।

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दोनों पक्षों की ओर से कौन पेश हुआ?

मां की ओर से अधिवक्ता विश्वनाथ श्रीवास और पारसमणि श्रीवास ने दलील दी कि पिता ड्राइवर होने के कारण बच्चे को पर्याप्त समय नहीं दे सकते और मां आर्थिक व सामाजिक रूप से बेहतर स्थिति में हैं।

वहीं, पिता की ओर से अधिवक्ता पवन कुमार कश्यप ने कहा कि मां कई वर्ष पहले बच्चे को छोड़कर चली गई थीं और उसके बाद बच्चे के प्रति कोई स्नेह या जिम्मेदारी नहीं निभाई। उन्होंने कहा कि पिता बच्चे को उचित देखभाल, शिक्षा और पारिवारिक वातावरण उपलब्ध करा रहे हैं।

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