बिजली संयंत्र 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली नहीं दे रहा, उसकी पूरी लागत उपभोक्ताओं से वसूल नहीं की जा सकती
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि जो बिजली संयंत्र 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली नहीं दे रहा, उसकी पूरी लागत उपभोक्ताओं से वसूल नहीं की जा सकती। कोर्ट ने APTEL का आदेश रद्द किया।
Supreme Court of India ने बिजली टैरिफ और उपभोक्ता हितों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई भी बिजली उत्पादन कंपनी ऐसे संयंत्र की पूरी लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाल सकती, जो अब उन्हें बिजली आपूर्ति ही नहीं कर रहा है।
न्यायमूर्ति Alok Aradhe और न्यायमूर्ति Pamidighantam Sri Narasimha की खंडपीठ ने Delhi Electricity Regulatory Commission (DERC) की अपील स्वीकार करते हुए Appellate Tribunal for Electricity (APTEL) का आदेश रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि बिजली टैरिफ निर्धारण केवल गणितीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि उपभोक्ता हित और बिजली कंपनियों के उचित खर्च के बीच संतुलन स्थापित करने का नियामकीय कार्य है।
कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए लगाया गया था अस्थायी प्लांट
मामला दिल्ली के रिठाला स्थित संयुक्त चक्र विद्युत संयंत्र (Rithala Combined Cycle Power Plant) से जुड़ा था। Tata Power Delhi Distribution Ltd. (TPDDL) ने इस संयंत्र को 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली में बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए अस्थायी तौर पर स्थापित किया था।
परियोजना शुरू से ही 5 से 6 वर्ष की सीमित अवधि के लिए प्रस्तावित थी। DERC ने भी इसी आधार पर संयंत्र को मार्च 2018 तक संचालन और बिजली आपूर्ति की अनुमति दी थी।
DERC ने घटाई थी परियोजना लागत
TPDDL ने संयंत्र की पूंजीगत लागत 320.17 करोड़ रुपये बताई थी, लेकिन DERC ने जांच और मानक परीक्षण के बाद इसे घटाकर 197.70 करोड़ रुपये निर्धारित किया।
इस आदेश को TPDDL ने कभी चुनौती नहीं दी, जिससे यह अंतिम रूप से लागू हो गया।
बाद में कंपनी ने 2010-11 से 2016-17 तक के खर्चों के “ट्रू-अप” और 2017-18 की वार्षिक आवश्यकताओं के निर्धारण की मांग की। हालांकि आयोग ने मार्च 2018 के बाद शेष लागत और अतिरिक्त वहन लागत (carrying cost) की वसूली की अनुमति देने से इनकार कर दिया, क्योंकि संयंत्र ने उस अवधि के बाद उपभोक्ताओं को बिजली देना बंद कर दिया था।
APTEL ने दिया था कंपनी के पक्ष में फैसला
इसके खिलाफ TPDDL ने APTEL में अपील दायर की। ट्रिब्यूनल ने कहा कि चूंकि आयोग ने संयंत्र की उपयोगी आयु 15 वर्ष स्वीकार की थी, इसलिए कंपनी को पूरे 15 वर्षों तक अवमूल्यन (depreciation) के माध्यम से लागत वसूलने का अधिकार है।
APTEL ने DERC के आदेश को रद्द करते हुए मामला वापस भेजा और पूरी लागत 15 वर्षों में वसूलने की अनुमति देने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- उपभोक्ता से सेवा बिना शुल्क नहीं लिया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने APTEL के दृष्टिकोण को गलत बताते हुए कहा कि मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति नहीं हुई, इसलिए उनसे उस अवधि का शुल्क नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“टैरिफ निर्धारण केवल लागत वसूली का साधन नहीं, बल्कि उपभोक्ता हितों की सुरक्षा का भी माध्यम है।”
पीठ ने यह भी कहा कि TPDDL के सामने संयंत्र बेचने या “मर्चेंट जनरेटर” के रूप में बिजली बेचने का विकल्प उपलब्ध था। इसलिए उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना उचित नहीं था।
Regulation 6.32 को लेकर कोर्ट की महत्वपूर्ण व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने Delhi Electricity Regulatory Commission Tariff Regulations, 2011 के Regulation 6.32 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह केवल अवमूल्यन की गणना की पद्धति बताता है। इसे अलग-थलग पढ़कर बिजली कंपनियों को बिना शर्त पूरी लागत वसूलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान को Regulation 4.1 और Electricity Act, 2003 की धारा 61(d) के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से पढ़ना होगा, जिसमें उपभोक्ता हित को सर्वोपरि रखा गया है।
पीठ ने स्पष्ट किया:
“Regulation 6.32 बिजली उत्पादन कंपनी को ऐसा पूर्ण और निरपेक्ष अधिकार नहीं देता कि वह उस अवधि के लिए भी उपभोक्ताओं से अवमूल्यन वसूले, जब संयंत्र उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति ही नहीं कर रहा हो।”
“ट्रू-अप” प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं हो सकता
अदालत ने कहा कि “ट्रू-अप” कार्यवाही का उद्देश्य केवल पहले से स्वीकृत टैरिफ ढांचे को लागू करना होता है, न कि उसे दोबारा बदलना या पुनर्गठित करना।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि APTEL ने संयंत्र की तकनीकी उपयोगी आयु और नियामकीय वसूली अवधि के बीच अंतर को समझने में गलती की।
सुप्रीम कोर्ट ने DERC का आदेश बहाल किया
सभी मुद्दों पर DERC के पक्ष में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने APTEL का आदेश रद्द कर दिया और आयोग द्वारा पारित मूल आदेश को बहाल कर दिया।
यह फैसला भविष्य में बिजली टैरिफ निर्धारण, उपभोक्ता अधिकारों और बिजली कंपनियों की लागत वसूली से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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