सोनिया गांधी के मतदाता सूची विवाद : “यदि सोनिया गांधी 1983 में भारतीय नागरिक बनीं, तो उससे पहले उनका नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ?”
राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिक बनने से पहले मतदाता सूची में शामिल होने के आरोप से जुड़े मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया है। अदालत 13 अगस्त 2026 को फैसला सुनाएगी।
दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले मतदाता सूची में शामिल किए जाने के आरोप से जुड़े मामले में दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला 13 अगस्त 2026 के लिए सुरक्षित रखा है।
अदालत ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि यदि वे लिखित दलीलें (Written Submissions) दाखिल करना चाहते हैं तो 1 अगस्त तक दाखिल कर सकते हैं।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता विकास त्रिपाठी का आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिक बनने से पहले ही मतदाता सूची में दर्ज कर दिया गया था। उनका कहना है कि यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल फर्जी दस्तावेजों या धोखाधड़ी के माध्यम से ही संभव था।
उन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी, लेकिन मजिस्ट्रेट अदालत ने उनकी अर्जी खारिज कर दी थी। उसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने पुनरीक्षण याचिका दायर की है।
सोनिया गांधी की ओर से क्या दलील दी गई?
सोनिया गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर.एस. चीमा और अधिवक्ता तरन्नुम चीमा ने अदालत में कहा कि:
- याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेज प्रामाणिक नहीं हैं।
- मामला केवल तथ्यों की तलाश (Fishing and Roving Inquiry) का प्रयास है।
- मजिस्ट्रेट द्वारा एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने का आदेश सही और कानूनसम्मत है।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बर्मन और अधिवक्ता नीरज ने तर्क दिया कि:
- भारतीय नागरिक बने बिना किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता।
- यदि नाम पहले दर्ज हुआ है, तो इसकी जांच आवश्यक है।
- मामला कथित जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के उपयोग से जुड़ा हो सकता है, इसलिए एफआईआर दर्ज कर जांच कराई जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की अहम टिप्पणियां
पूर्व सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे।
कोर्ट ने सोनिया गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से पूछा था:
“यदि सोनिया गांधी 1983 में भारतीय नागरिक बनीं, तो उससे पहले उनका नाम मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ?”
साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता से यह भी कहा था:
“आप एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं। यह मामला लगभग आधी सदी पुराना है। अब जांच किसकी होगी?”
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि याचिका के दायरे को अनावश्यक रूप से विस्तारित नहीं किया जा सकता।
अतिरिक्त दस्तावेज भी रिकॉर्ड पर लाने की मांग
याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान 1980 की निर्वाचन आयोग (Election Commission) की एक रिपोर्ट सहित अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति भी मांगी थी। उनका दावा है कि ये दस्तावेज उनके आरोपों का समर्थन करते हैं।
वहीं, सोनिया गांधी ने इन अतिरिक्त दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए हैं।
अब आगे क्या?
राउज़ एवेन्यू कोर्ट अब यह तय करेगा कि:
- मजिस्ट्रेट द्वारा एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने का आदेश सही था या नहीं।
- उपलब्ध सामग्री के आधार पर किसी आपराधिक जांच की आवश्यकता बनती है या नहीं।
यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि अदालत ने अभी तक आरोपों के गुण-दोष (Merits) पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है। फिलहाल मामला केवल एफआईआर दर्ज कराने की मांग से संबंधित पुनरीक्षण याचिका पर विचाराधीन है।
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