भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ASI का 2003 आदेश रद्द, भोजशाला को माता सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र माना

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प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लागू नहीं होगा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया और इसे राजा भोज कालीन माता वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में मान्यता दी। अदालत ने ASI के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा-अधिकार सीमित कर शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी।


भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर कई याचिकाओं और अपीलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी शामिल थे, ने धार स्थित भोजशाला परिसर के विवादित हिस्से को प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत “संरक्षित स्मारक” घोषित किया।

अदालत ने कहा कि विवादित स्थल वास्तव में माता वाग्देवी (सरस्वती) का भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जिसका संबंध परमार वंश के राजा भोज से है।


ASI का 2003 का आदेश रद्द

खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 7 अप्रैल 2003 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत हिंदुओं के पूजा-अधिकार सीमित किए गए थे और मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।


धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व

अदालत ने कहा—

“सरकार का संवैधानिक दायित्व केवल प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि गर्भगृह और आध्यात्मिक महत्व वाली देव प्रतिमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं, कानून-व्यवस्था और पवित्रता बनाए रखने के लिए धन उपलब्ध कराना भी राज्य की जिम्मेदारी है।”


क्या था विवाद?

भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों की ओर से अलग-अलग दावे किए गए थे।

2003 के ASI आदेश के अनुसार—

  • मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज की अनुमति दी गई थी।
  • हिंदुओं को केवल बसंत पंचमी पर पारंपरिक अनुष्ठान करने तथा प्रत्येक मंगलवार सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा करने की अनुमति थी।
  • श्रद्धालुओं को केवल फूल और थोड़े चावल चढ़ाने की इजाजत थी।
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इसी आदेश को विभिन्न याचिकाओं में चुनौती दी गई थी।


मुख्य सवाल: 15 अगस्त 1947 को क्या था स्थल का स्वरूप?

मामले में अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था—

  • क्या विवादित क्षेत्र “संरक्षित स्मारक” है?
  • स्वतंत्रता के समय यानी 15 अगस्त 1947 को इसका धार्मिक स्वरूप क्या था?

ऐतिहासिक दस्तावेजों और ASI सर्वेक्षण का अध्ययन

अदालत ने 2024 में ASI द्वारा कराए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण, वीडियोग्राफी, संस्कृत अभिलेखों, ऐतिहासिक पुस्तकों, शिलालेखों और स्थापत्य अवशेषों का विस्तृत परीक्षण किया।

रिपोर्ट में पाया गया कि—

  • धार परमार शासकों की राजधानी थी।
  • बाद में मुस्लिम शासकों ने पूर्ववर्ती हिंदू मंदिरों के अवशेषों का उपयोग कर मस्जिदों का निर्माण कराया।
  • स्तंभों, शिलाखंडों और संस्कृत अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि वहां पहले एक हिंदू मंदिर मौजूद था।
  • यह स्थान देवी सरस्वती की उपासना और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र था।

ASI ने अपना वैधानिक दायित्व नहीं निभाया

हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 16 और धारा 21, प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत ASI का दायित्व था कि वह स्थल की वास्तविक प्रकृति और मूल स्वरूप का निर्धारण करे।

लेकिन ASI ने ऐसा नहीं किया और स्थल को “भोजशाला या कमाल मौला मस्जिद” के रूप में अधिसूचित कर दिया।


प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लागू नहीं होगा

अदालत ने कहा कि चूंकि यह स्थल 1958 अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है, इसलिए प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजन्स) एक्ट, 1991 की धारा 4 इसके ऊपर लागू नहीं होती।

इसलिए 1991 का कानून इस स्थल के धार्मिक स्वरूप को स्थायी रूप से निर्धारित करने के लिए आधार नहीं बन सकता।


भोजशाला पहले से संरक्षित स्मारक थी

खंडपीठ ने माना कि 1904 के कानून और बाद में 1951 तथा 1958 के अधिनियमों के तहत यह स्थल पहले से ही संरक्षित स्मारक था और ASI इसके प्रबंधन का कार्य कर रहा था।

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इस प्रकार, धारा 39(2) के तहत विवादित क्षेत्र संरक्षित स्मारक माना जाएगा।


राजा भोज कालीन सरस्वती मंदिर था भोजशाला परिसर

अदालत ने ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट, ऐतिहासिक साहित्य, स्थापत्य साक्ष्यों और अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि—

  • मूल संरचना सरस्वती उपासना और संस्कृत शिक्षा का केंद्र थी।
  • बाद में मंदिर को क्षतिग्रस्त किया गया, मूर्तियों को नष्ट किया गया और उसके अवशेषों का उपयोग कर मस्जिद का निर्माण किया गया।
  • वर्तमान संरचना परमार कालीन मंदिर के ऊपर निर्मित है।
  • राजा भोज के काल से संबंधित साहित्य और वास्तुशिल्पीय संदर्भ वहां माता सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं।

हाई कोर्ट का निष्कर्ष

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि विवादित स्थल का ऐतिहासिक और मूल स्वरूप भोजशाला, अर्थात माता सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था। इसलिए ASI द्वारा 2003 में जारी वह आदेश, जिसमें हिंदुओं के पूजा-अधिकार सीमित किए गए थे और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी, कानून के अनुरूप नहीं है और उसे निरस्त किया जाता है।


मामला

Hindu Front for Justice v. Union of India, 2026


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