तीन मासूम बच्चों की हत्या मामले में मां और देवर बरी, हाईकोर्ट ने पलटी फांसी और उम्रकैद की सजा

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने औरैया में तीन बच्चों की हत्या के मामले में फांसी की सजा पाने वाली मां प्रियंका और उम्रकैद की सजा पाए आशीष को बरी कर दिया।

कोर्ट ने बाल गवाह के बयान में गंभीर विरोधाभास और अभियोजन की खामियों को आधार बनाया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने औरैया जिले में तीन मासूम बच्चों की हत्या के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उनकी मां प्रियंका और उसके देवर आशीष को बरी कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने प्रियंका को हत्या के मामले में फांसी की सजा और आशीष को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की पीठ ने यह फैसला सुनाया।

सेंगर नदी में तीन बच्चों की मौत का मामला

मामला 27 जून 2024 का है। घटना औरैया के कोतवाली थाना क्षेत्र में तालेपुर गांव के पास स्थित सेंगर नदी के पुल से जुड़ी थी।

अभियोजन के अनुसार, प्रियंका ने अपने पति अवनीश की मौत के बाद अपने देवर आशीष के साथ मिलकर अपने चार बच्चों को नदी में डुबोकर मारने की साजिश रची थी। बच्चों की उम्र क्रमशः सोनू (9 वर्ष), आदित्य (5 वर्ष), माधव (6 वर्ष) और मंगल (4 वर्ष) बताई गई थी।

आरोप था कि घटना के दौरान आदित्य, माधव और मंगल की नदी में डूबने से मौत हो गई, जबकि सबसे बड़ा बेटा सोनू कथित तौर पर अपनी जान बचाकर वहां से निकल गया।

अवैध संबंध को बताया गया था हत्या की वजह

अभियोजन की कहानी के मुताबिक, प्रियंका और आशीष के बीच कथित अवैध संबंध थे और इसी वजह से दोनों ने बच्चों को रास्ते से हटाने की साजिश रची।

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने जुलाई 2025 में प्रियंका को हत्या का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। वहीं आशीष को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।

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दोनों आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

बाल गवाह के बयान में गंभीर विरोधाभास

Allahabad High Court ने अपीलों पर सुनवाई के दौरान अभियोजन के प्रमुख साक्ष्य के तौर पर पेश किए गए बाल गवाह सोनू के बयान की विशेष रूप से जांच की।

कोर्ट ने पाया कि सोनू के बयान में कई महत्वपूर्ण और गंभीर विरोधाभास हैं। अदालत ने उसके बयान की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि परिस्थितियों से यह संकेत मिलता है कि बच्चे को उसके रिश्तेदारों द्वारा सिखाए-पढ़ाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि घटना के समय सोनू की उम्र करीब 8-9 वर्ष थी और वह घटना का एकमात्र प्रत्यक्ष बाल गवाह था।

‘अगर मां ने साजिश रची होती तो सबसे बड़े बच्चे को क्यों छोड़ती?’

हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी की तार्किकता पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि यदि प्रियंका ने वास्तव में अपने बच्चों की हत्या की साजिश रची होती, तो यह समझना कठिन है कि वह सबसे बड़े बेटे सोनू को सुरक्षित क्यों छोड़ती।

सोनू जीवित रहने के बाद घटना के संबंध में गवाही दे सकता था। अदालत ने इस परिस्थिति को अभियोजन की कहानी का मूल्यांकन करते समय महत्वपूर्ण माना।

ग्राम प्रधान को अभियोजन ने नहीं बनाया गवाह

हाईकोर्ट ने अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों में एक और महत्वपूर्ण कमी को रेखांकित किया।

घटना की सबसे पहली सूचना ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण ने पुलिस को दी थी। इसके बावजूद अभियोजन ने उन्हें अदालत के समक्ष गवाह के रूप में पेश नहीं किया।

कोर्ट ने माना कि मामले की शुरुआती सूचना देने वाले महत्वपूर्ण व्यक्ति को गवाह न बनाए जाने से अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर सवाल पैदा होते हैं।

संदेह का लाभ देते हुए दोनों आरोपियों को बरी किया

हाईकोर्ट ने समग्र साक्ष्यों और परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को उस स्तर तक साबित नहीं कर सका, जो आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए आवश्यक है।

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अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए प्रियंका और आशीष दोनों को बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई क्रमशः फांसी तथा आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।

कानूनी महत्व

फैसले में एक बार फिर यह सिद्धांत सामने आता है कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि केवल आरोपों या संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती। अभियोजन को आरोपी के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है।

विशेष रूप से बाल गवाह की गवाही का मूल्यांकन करते समय अदालत को उसकी विश्वसनीयता, बयान में स्थिरता और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ उसके सामंजस्य की जांच करनी होती है। यदि प्रमुख गवाही में गंभीर विरोधाभास हों और स्वतंत्र साक्ष्य भी अभियोजन की कहानी को पर्याप्त रूप से समर्थन न देते हों, तो दोषसिद्धि कायम रखना कठिन हो सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया।

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