सोशल मीडिया पर जातिसूचक गाली देना SC/ST एक्ट के तहत अपराध : कलकत्ता हाईकोर्ट, ‘सार्वजनिक’ की परिभाषा में डिजिटल दुनिया भी शामिल

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‘सार्वजनिक’ शब्द का अर्थ केवल भौतिक स्थान तक सीमित नहीं

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर जाति के आधार पर अपमान या गाली देने का मामला SC/ST एक्ट के तहत अपराध हो सकता है। अदालत ने ‘सार्वजनिक’ शब्द की व्याख्या डिजिटल दुनिया तक विस्तारित करते हुए पुलिस की जांच पर भी सवाल उठाए।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर गाली देना या अपमानित करना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध हो सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में इस्तेमाल किए गए ‘सार्वजनिक’ शब्द का अर्थ केवल भौतिक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर इसमें इंटरनेट और सोशल मीडिया भी शामिल हो सकते हैं।

न्यायमूर्ति उदय कुमार की एकल पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) में सार्वजनिक स्थान से जुड़ी शर्त की व्याख्या बदलती तकनीक और डिजिटल संचार के संदर्भ में की जानी चाहिए।

यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि जाति से जुड़ी हर टिप्पणी अपने आप SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाती। प्रत्येक मामले में यह जांचना जरूरी है कि संबंधित अपराध के कानूनी तत्व और आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं या नहीं।

SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) क्या कहती हैं?

SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित करने, डराने या जातिसूचक गाली देने के मामले में आपराधिक कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, अपराध के लिए कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक शर्तों का पूरा होना भी जरूरी है।

ऐसे मामलों में मुख्य रूप से इन पहलुओं की जांच की जाती है:

  1. आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न हो।
  2. कथित कृत्य कानून में निर्धारित तरीके से पीड़ित की जाति के आधार पर अपमान या धमकी से संबंधित हो।
  3. घटना के संबंध में सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक दृश्यता से जुड़ी वैधानिक शर्त पूरी होती हो।

सोशल मीडिया के मामलों में विवाद का प्रमुख प्रश्न यही है कि ऑनलाइन पोस्ट, टिप्पणी या जातिसूचक गाली को कानून के तहत सार्वजनिक रूप से की गई घटना माना जा सकता है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में क्या कहा गया?

हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 में हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में सार्वजनिक स्थान से जुड़ी शर्त की व्याख्या करते हुए कहा था कि कथित अपमान ऐसी परिस्थिति में होना चाहिए, जहां आम लोग उसे देख या सुन सकें।

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अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल किसी स्थान पर घटना होने से वह स्वतः सार्वजनिक स्थान पर हुई घटना नहीं बन जाती। घटना की परिस्थितियां और वहां आम लोगों की मौजूदगी जैसे पहलू महत्वपूर्ण हैं।

रामकृष्णन चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

हाल ही में रामकृष्णन चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्कूल प्रबंधक के खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत शुरू की गई कार्रवाई रद्द कर दी थी।

पीठ ने कहा कि यह देखना आवश्यक है कि कथित टिप्पणी ऐसी परिस्थितियों में की गई थी या नहीं, जहां दूसरे लोग उसे देख या सुन सकते थे। केवल स्कूल परिसर में घटना होने से सार्वजनिक स्थान की कानूनी शर्त अपने आप पूरी नहीं हो जाती।

इससे स्पष्ट होता है कि अदालतों को प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करना होगा।

क्या था कलकत्ता हाईकोर्ट के सामने मामला?

मामले में शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित था। उसने आरोप लगाया कि सामान्य जाति के दो व्यक्तियों ने फेसबुक पर उसकी जाति, धर्म, भगवान और परिवार को लेकर अपमानजनक तथा जातिसूचक टिप्पणियां की थीं।

जांच के बाद पुलिस ने मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल की। पुलिस का कहना था कि कोलकाता साइबर पुलिस थाने के माध्यम से फेसबुक से संपर्क करने के बावजूद संबंधित व्यक्तियों की पहचान से जुड़ी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती दी। अलीपुर की विशेष अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि शिकायतकर्ता की ओर से दर्ज कराए गए तीन अन्य मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे।

हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रत्येक आपराधिक मामले का मूल्यांकन उसके अपने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल इसलिए किसी शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसी शिकायतकर्ता ने अन्य मामले भी दर्ज कराए हैं।

फेसबुक पर की गई टिप्पणियों की जांच को लेकर पुलिस पर सवाल

हाईकोर्ट ने जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, पुलिस ने फेसबुक पर की गई टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट सुरक्षित किए थे और संबंधित लोगों के बयान भी दर्ज किए थे।

ऐसी स्थिति में केवल स्थानीय साइबर जांच के दौरान आरोपियों की पहचान से जुड़ा सुराग नहीं मिलने के आधार पर जांच बंद करना पर्याप्त नहीं था।

अदालत ने कहा कि पुलिस को राज्य अपराध जांच विभाग की विशेष साइबर जांच और इंटरनेट से संबंधित तकनीकी जानकारी हासिल करने जैसे अन्य उपलब्ध उपायों पर भी विचार करना चाहिए था।

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इस प्रकार, हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों को डिजिटल माध्यम से किए गए कथित अपराधों की जांच में अधिक प्रभावी और व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

केरल हाईकोर्ट भी डिजिटल दुनिया के संदर्भ में कर चुका है व्याख्या

केरल हाईकोर्ट ने वर्ष 2022 में सूरज वी. सुकुमार बनाम केरल राज्य मामले में कहा था कि किसी कानून की व्याख्या इस तरह नहीं की जानी चाहिए, मानो उसके लागू होने के बाद समाज और तकनीक में कोई बदलाव ही नहीं आया हो।

अदालत ने माना था कि इंटरनेट ने सूचना और सामग्री के प्रसार का तरीका बदल दिया है। ऑनलाइन प्रकाशित सामग्री बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है और उसे अलग-अलग समय पर देखा जा सकता है।

केरल हाईकोर्ट के अनुसार, ‘सार्वजनिक’ शब्द का अत्यधिक संकीर्ण अर्थ निकालने से जातिगत अपमान और भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए कानून का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

फैसले का कानूनी महत्व

कलकत्ता हाईकोर्ट की टिप्पणी डिजिटल माध्यमों पर जातिगत उत्पीड़न के आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह बताती है कि सार्वजनिक स्थान की अवधारणा की व्याख्या करते समय इंटरनेट और सोशल मीडिया की प्रकृति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर की गई हर जाति-संबंधी टिप्पणी स्वतः SC/ST एक्ट के तहत अपराध होगी। आरोप की प्रकृति, आरोपी की स्थिति, कथित कृत्य का उद्देश्य, सार्वजनिक दृश्यता और कानून की अन्य आवश्यक शर्तों का मूल्यांकन प्रत्येक मामले में अलग-अलग करना होगा।

निष्कर्ष: कलकत्ता हाईकोर्ट ने डिजिटल दुनिया में जातिगत अपमान के आरोपों की जांच और ‘सार्वजनिक’ शब्द की व्याख्या को व्यापक संदर्भ में देखने पर जोर दिया है। साथ ही, अदालत की टिप्पणी यह भी रेखांकित करती है कि साइबर अपराधों की जांच में पुलिस को उपलब्ध तकनीकी और जांच संबंधी विकल्पों का उचित इस्तेमाल करना चाहिए।

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