घर के भीतर जातिसूचक गाली ‘पब्लिक व्यू’ नहीं, SC/ST एक्ट का मामला नहीं बनता: सुप्रीम कोर्ट

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घर के भीतर कथित जातिसूचक टिप्पणी, यदि सार्वजनिक दृष्टि (public view) में न हो, तो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) लागू नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर के भीतर कथित जातिसूचक टिप्पणी, यदि सार्वजनिक दृष्टि (public view) में न हो, तो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) लागू नहीं होगी। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश और FIR रद्द की।

Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कथित जातिसूचक गाली-गलौज किसी निजी आवास के भीतर हुई हो और वह “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक दृष्टि में न हो, तो Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध नहीं बनता।

न्यायमूर्ति N.V. Anjaria और न्यायमूर्ति Prashant Kumar Mishra की खंडपीठ ने Delhi High Court के आदेश को रद्द करते हुए FIR और चार्जशीट दोनों को निरस्त कर दिया।

पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था मामला

मामला एक पारिवारिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता और आरोपी आपस में सगे भाई थे। विवाद दिल्ली के हरि नगर और रमेश नगर स्थित पैतृक संपत्तियों को लेकर चल रहा था।

शिकायतकर्ता ने 30 जनवरी 2021 को FIR दर्ज कर आरोप लगाया कि 28 जनवरी 2021 को आरोपी पक्ष ने घर का ताला तोड़ने की कोशिश की और इस दौरान एक महिला आरोपी ने “चूरा”, “चमार”, “हरिजन” और “गंदी नाली” जैसे जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।

शिकायत में यह भी कहा गया कि पिछले एक वर्ष से आरोपी बालकनी या ग्राउंड फ्लोर से जातिसूचक टिप्पणियां कर शिकायतकर्ता और उसके परिवार को अपमानित करते थे।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने तय किए थे आरोप

ट्रायल कोर्ट ने महिला आरोपी के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत आरोप तय किए थे, जबकि सभी आरोपियों पर Indian Penal Code की धारा 506 और 34 के तहत भी आरोप लगाए गए।

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दिल्ली हाईकोर्ट ने भी यह कहते हुए आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा था कि इस स्तर पर अदालत को “मिनी ट्रायल” नहीं करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘पब्लिक व्यू’ की शर्त पर दिया अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि इन धाराओं के तहत अपराध तभी बनता है, जब जातिसूचक अपमान “किसी सार्वजनिक दृष्टि वाले स्थान” पर किया गया हो।

कोर्ट ने कहा:

“घटना का ‘पब्लिक व्यू’ में होना SC/ST एक्ट के तहत अपराध स्थापित करने के लिए अनिवार्य शर्त (sine qua non) है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सार्वजनिक स्थान होना जरूरी नहीं, बल्कि ऐसा स्थान होना चाहिए जहां आम लोग घटना को देख या सुन सकें।

घर की चारदीवारी के भीतर हुई घटना

अदालत ने पाया कि FIR और चार्जशीट दोनों में घटना का स्थान “7/38, रमेश नगर, नई दिल्ली” बताया गया था, जो एक निजी आवास था।

कोर्ट ने गवाहों के बयान भी देखे और पाया कि किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह ने कथित जातिसूचक टिप्पणी सुनने या देखने की पुष्टि नहीं की।

पीठ ने कहा कि घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी और सार्वजनिक दृष्टि में नहीं थी, इसलिए SC/ST एक्ट की धाराएं लागू नहीं होतीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने फैसलों का दिया हवाला

कोर्ट ने अपने कई पूर्व फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें:

इन मामलों में भी कहा गया था कि यदि कथित जातिसूचक टिप्पणी सार्वजनिक दृष्टि में न हो, तो SC/ST एक्ट लागू नहीं होगा।

IPC की धारा 506 भी लागू नहीं: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत में आपराधिक धमकी (criminal intimidation) के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं थे।

कोर्ट के अनुसार, शिकायत में ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था जिससे यह साबित हो कि कथित धमकियों का उद्देश्य शिकायतकर्ता में “भय या आतंक” पैदा करना था।

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साथ ही अदालत को आरोपियों के बीच कोई “सामान्य आपराधिक मंशा” (common intention) भी नहीं दिखी।

FIR और चार्जशीट रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि FIR को पहली नजर में पढ़ने पर ही अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते, तो ऐसी कार्यवाही कानून का दुरुपयोग मानी जाएगी।

इसी आधार पर अदालत ने:

  • दिल्ली हाईकोर्ट का 22 अगस्त 2024 का आदेश रद्द किया,
  • ट्रायल कोर्ट के आरोप तय करने वाले आदेश निरस्त किए,
  • और FIR व चार्जशीट दोनों को खारिज कर दिया।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

यह फैसला SC/ST एक्ट के मामलों में “पब्लिक व्यू” की कानूनी व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी साबित होना चाहिए कि घटना सार्वजनिक दृष्टि में हुई थी।

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