दहेज हत्या मामले में पति की उम्रकैद बरकरार, कलकत्ता हाईकोर्ट बोला- पढ़ा-लिखा होने के कारण गैरकानूनी मांग की थी जानकारी

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साक्ष्यों में मामूली अंतर अपने आप अभियोजन के पूरे मामले को अविश्वसनीय नहीं बनाता

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के मामले में पति की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। अदालत ने कहा कि स्नातक और पेशे से दस्तावेज लेखक होने के कारण आरोपी जानता था कि दहेज मांगना गैरकानूनी है। सबूतों में मामूली अंतर से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।

दहेज हत्या पर कलकत्ता हाईकोर्ट सख्त, पति की अपील खारिज

कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में दोषी पति की उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि आरोपी स्नातक था और पेशे से दस्तावेज लेखक था। इसलिए वह अच्छी तरह जानता था कि दहेज की मांग करना गैरकानूनी है।

न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अनुज सिंह की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने महिला की हत्या का आरोप उचित संदेह से परे साबित कर दिया है।

अदालत ने आरोपी की उस मांग को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने जेल में अब तक बिताई गई अवधि को ही पर्याप्त सजा मानने का अनुरोध किया था।

पीठ ने मामले की गंभीरता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दहेज हत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा उसके अपराध के अनुरूप है।

क्या था पूरा मामला?

मामले के अनुसार, महिला की शादी 25 मई 2009 को हुई थी। अभियोजन पक्ष ने बताया कि शादी के समय उसके परिवार ने 60 हजार रुपये नकद, लगभग छह तोले सोने के आभूषण और घरेलू सामान दहेज के रूप में दिया था।

आरोप था कि शादी के बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों ने 50 हजार रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की। मांग पूरी नहीं होने पर महिला को कथित तौर पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा।

महिला के भाई और परिवार के अन्य सदस्यों ने हस्तक्षेप कर मामले को सुलझाने की कोशिश की, लेकिन प्रताड़ना बंद नहीं हुई।

अगस्त 2010 में महिला के मायके वालों को सूचना मिली कि उसकी तबीयत बेहद खराब है। जब वे उसके ससुराल पहुंचे, तो उन्होंने एक कमरे को बाहर से बंद पाया और वहां से धुआं निकलता देखा।

दरवाजा तोड़कर अंदर जाने पर महिला का जला हुआ शव मिला। अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला को पहले पीटा गया और फिर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई।

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पुलिस ने बरामद किए मिट्टी के तेल का डिब्बा और अन्य सामान

घटना के बाद पुलिस ने पति समेत चार आरोपियों के खिलाफ हत्या और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत मामला दर्ज किया। धारा 498A पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ क्रूरता से संबंधित थी।

जांच के दौरान महिला के शरीर पर चोटों के निशान पाए गए। पुलिस ने घटनास्थल से मिट्टी के तेल का डिब्बा, लोहे की छड़, लकड़ी का डंडा और गैस लाइटर भी बरामद किया।

ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पति को दहेज हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में दोषसिद्धि और सजा को चुनौती दी।

अपील की सुनवाई के दौरान एक अन्य आरोपी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद पति की अपील पर सुनवाई जारी रही।

आरोपी ने क्या दलील दी?

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि महिला को आग किसने लगाई थी। बचाव पक्ष ने जांच में दर्ज चोटों और पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट के बीच कथित अंतर का भी हवाला दिया।

आरोपी ने यह भी कहा कि बरामदगी से संबंधित दस्तावेजों में तारीखों का अंतर है, इसलिए अभियोजन के साक्ष्यों पर संदेह किया जाना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत के अनुसार, साक्ष्यों में मामूली अंतर अपने आप अभियोजन के पूरे मामले को अविश्वसनीय नहीं बनाता।

पीठ ने कहा कि पंचनामा तैयार करने वाले अधिकारियों द्वारा दर्ज चोटों में से दो की पुष्टि पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने भी की थी। इसलिए बचाव पक्ष की दलील से अभियोजन के मामले पर निर्णायक संदेह पैदा नहीं होता।

घर के भीतर हुई घटना में प्रत्यक्षदर्शी न होना निर्णायक नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि घर के भीतर होने वाली ऐसी घटनाओं में अक्सर कोई प्रत्यक्षदर्शी उपलब्ध नहीं होता। इसलिए मामले का मूल्यांकन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है।

अदालत ने पाया कि महिला के साथ मारपीट किए जाने और उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाए जाने के साक्ष्य मौजूद थे। महिला को पहले से प्रताड़ित किए जाने के आरोपों को भी अदालत ने मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में देखा।

पीठ ने यह भी कहा कि जब अभियोजन पक्ष ने संबंधित परिस्थितियों को साबित कर दिया था, तब आरोपियों से यह अपेक्षा थी कि वे महिला की मृत्यु की परिस्थितियों के बारे में कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण दें। लेकिन पूछताछ के दौरान आरोपियों ने आरोपों और सामने आए तथ्यों से इनकार करने के अलावा कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि बरामदगी की तारीखों में मामूली अंतर भी अपने आप अभियोजन के मामले को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

पढ़ा-लिखा होने के बावजूद दहेज की मांग, अदालत ने सजा को उचित माना

सजा के सवाल पर हाईकोर्ट ने आरोपी की शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, आरोपी स्नातक था और दस्तावेज लेखक के रूप में काम करता था। इसलिए उसे यह जानकारी होने की अपेक्षा थी कि दहेज मांगना कानून के विरुद्ध है।

पीठ ने माना कि महिला की हत्या का आरोप उचित संदेह से परे साबित हो चुका है। ऐसे में आरोपी को केवल जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर रिहा करने या उसकी सजा कम करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं था।

उम्रकैद और जुर्माना बरकरार

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा कायम रखी। आरोपी को दहेज हत्या के मामले में उम्रकैद और 10 हजार रुपये का जुर्माना भुगतना होगा।

इसके अलावा, क्रूरता के अपराध में तीन साल की सश्रम कैद और दो हजार रुपये का जुर्माना भी बरकरार रखा गया।

कानूनी निष्कर्ष: इस फैसले में हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मूल्यांकन, घरेलू परिसर में हुई घटना में प्रत्यक्षदर्शी की अनुपस्थिति और साक्ष्यों में मामूली विसंगतियों के महत्व पर विचार किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटे-मोटे अंतर तभी निर्णायक हो सकते हैं, जब वे अभियोजन के मूल मामले या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की विश्वसनीयता को वास्तव में प्रभावित करें।

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