34 साल बाद बुलंदशहर कोर्ट का फैसला: जज से बदसलूकी के आरोप में दो वकील बरी, अभियोजन 34 साल में पेश कर सका सिर्फ एक गवाह

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34 साल लंबी आपराधिक सुनवाई, अभियोजन की विफलता और न्याय में देरी

बुलंदशहर की अदालत ने 34 साल पुराने मामले में दो अधिवक्ताओं को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। अभियोजन 34 वर्षों में सिर्फ एक गवाह पेश कर सका, जो अदालत में अपने मूल बयान से मुकर गया।

34 साल बाद आया फैसला, दो अधिवक्ता दोषमुक्त

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की अदालत ने करीब 34 साल पुराने मामले में दो अधिवक्ताओं को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। मामला वर्ष 1992 में खुर्जा न्यायालय में तत्कालीन न्यायिक अधिकारी के साथ कथित बदसलूकी, मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी से जुड़ा था।

मामले में अभियोजन पक्ष 34 वर्षों की लंबी सुनवाई के दौरान केवल एक गवाह पेश कर सका। खास बात यह रही कि यह इकलौता गवाह भी अदालत में अपने मूल बयान से मुकर गया और उसने कथित घटना से संबंधित आरोपों की पुष्टि नहीं की।

तीसरे आरोपी अधिवक्ता विजय राघव की फैसला आने से पहले ही मृत्यु हो चुकी थी।

24 जून 1992 को जज ने दर्ज कराया था मुकदमा

अभिलेखों के अनुसार, 24 जून 1992 को खुर्जा न्यायालय में तैनात तत्कालीन मुंसिफ/न्यायिक दंडाधिकारी एसीजे-जेडी अशोक कुमार वर्मा ने खुर्जा नगर थाने में तहरीर दी थी।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जब न्यायिक अधिकारी मोटर वाहन रिलीज प्रार्थना पत्र पर सुनवाई कर रहे थे, उसी दौरान स्थानीय अधिवक्ता वेदपाल राघव, प्रेमशंकर चौहान और विजय राघव अदालत कक्ष में प्रवेश कर गए।

आरोप था कि अधिवक्ताओं ने अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया और गाली-गलौज की।

जज को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप

मामले में आरोप लगाया गया था कि अधिवक्ताओं ने न्यायिक पत्रावली में लगी अर्जी को कथित तौर पर फाड़कर अपनी जेब में रख लिया।

इसके अलावा उन पर डायस पर चढ़कर अभद्रता करने और बाद में पीठासीन अधिकारी के चैंबर में घुसने का आरोप लगाया गया।

शिकायत के अनुसार, चैंबर में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई।

पुलिस ने मामले में संबंधित धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।

34 साल में अभियोजन पेश कर सका सिर्फ एक गवाह

चार्जशीट दाखिल होने के बाद मुकदमा अदालत में चलता रहा। वर्ष 2004 में आरोप तय किए गए।

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इसके बाद महत्वपूर्ण फाइल वर्षों तक गवाही का इंतजार करती रही। अदालत की ओर से अभियोजन को गवाह पेश करने के लिए कई अवसर दिए गए, लेकिन लंबी अवधि के बावजूद अभियोजन केवल एक गवाह को अदालत में पेश कर सका।

सुनवाई के दौरान यही गवाह अपने मूल बयानों से मुकर गया।

उसने अदालत में जज के साथ किसी भी प्रकार की बदसलूकी, मारपीट या न्यायिक पत्रावली फाड़े जाने की घटना से इनकार कर दिया।

अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका

अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए आपराधिक मुकदमों में अभियोजन के दायित्व को रेखांकित किया।

अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने का कानूनी दायित्व होता है।

मामले में स्वतंत्र गवाह या आरोपों की पुष्टि करने वाला ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने के कारण अदालत ने दोनों अधिवक्ताओं को संदेह का लाभ दिया।

इसके साथ ही दोनों को दोषमुक्त कर दिया गया और मामले की पत्रावली को हमेशा के लिए दाखिल दफ्तर करने का आदेश दिया गया।

तीसरे आरोपी की फैसला आने से पहले हो चुकी थी मौत

मामले में तीसरे आरोपी अधिवक्ता विजय राघव का फैसला सुनाए जाने से पहले ही निधन हो चुका था। इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही उनके निधन के कारण आगे नहीं बढ़ सकी।

17 सितंबर को अदालत ने अभियोजन को दी थी कड़ी चेतावनी

अदालती आदेश के अनुसार, गवाह पेश करने में लगातार हो रही देरी को लेकर अदालत ने अभियोजन को कई अवसर दिए थे।

आखिरकार 17 सितंबर 2026 को अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिलाधिकारी, एसएसपी और संयुक्त निदेशक अभियोजन, बुलंदशहर को पत्र भेजा।

अदालत ने चेतावनी दी थी कि यदि 24 सितंबर 2026 तक गवाह पेश नहीं किए गए तो प्रतिकूल आदेश की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन की होगी।

इसके बाद मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने दोनों अधिवक्ताओं को दोषमुक्त कर दिया।

34 साल तक मुकदमे का बोझ झेलना भी सवाल

फैसले के बाद अधिवक्ताओं ने इस मामले में न्याय मिलने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए।

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अधिवक्ता अनुज कौशिक ने कहा कि अदालत के आदेश से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि दोनों पक्षों को इस फैसले के लिए इतना लंबा इंतजार करना पड़ा। उन्होंने कहा कि अदालतों में अभी भी चार लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं और लोग वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

अधिवक्ता ब्रूनो भूषण ने कहा कि सिस्टम की इस लापरवाही का असर संबंधित अधिवक्ताओं को झेलना पड़ा। उनके अनुसार, उन्हें इतने वर्षों तक न्याय के लिए इंतजार करना पड़ा और इतने लंबे समय तक आरोपों का सामना करते रहना पड़ा।

फैसला केवल बरी होने तक सीमित नहीं, न्याय में देरी का सवाल भी अहम

बुलंदशहर का यह मामला केवल दो अधिवक्ताओं के दोषमुक्त होने तक सीमित नहीं है। 1992 में दर्ज मुकदमे में 2004 में आरोप तय होने के बावजूद वर्षों तक गवाही आगे नहीं बढ़ सकी और अंततः अभियोजन 34 साल में केवल एक गवाह पेश कर पाया।

जब वही गवाह अदालत में अभियोजन के आरोपों की पुष्टि करने से मुकर गया और कोई स्वतंत्र या ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, तो अदालत के सामने आरोपों को संदेह से परे साबित करने की अभियोजन की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो सकी।

यह मामला लंबे समय तक लंबित रहने वाले आपराधिक मुकदमों में त्वरित सुनवाई, अभियोजन की प्रभावी पैरवी और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया के महत्व को भी रेखांकित करता है।

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