झारखंड DGP नियुक्ति नियम पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति: ‘प्रकाश सिंह’ फैसले से टकराव का प्रथमदृष्टया संकेत

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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के DGP नियुक्ति नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि छह महीने से कम सेवा शेष रहने वाले अधिकारी को DGP पद के लिए योग्य बनाना प्रकाश सिंह मामले में तय सिद्धांतों के विपरीत प्रथमदृष्टया प्रतीत होता है। कोर्ट ने झारखंड सरकार को एक सप्ताह का समय दिया।

झारखंड में DGP की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि Selection and Appointment of Director General and Inspector General of Police, Jharkhand (Head of Police Force) Regulations, 2025 के कुछ प्रावधान पुलिस सुधारों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ फैसले में तय सिद्धांतों से प्रथमदृष्टया टकराते दिखाई देते हैं।

यह मामला केंद्र सरकार की उस याचिका/आवेदन पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें झारखंड के 2025 के DGP नियुक्ति नियमों तथा इनके तहत की गई नियुक्तियों की वैधता को चुनौती दी गई है।

छह महीने से कम सेवा शेष होने पर DGP नियुक्ति पर सवाल

केंद्र सरकार की मुख्य आपत्ति यह है कि झारखंड के नियम ऐसे पुलिस अधिकारियों को भी DGP पद के लिए विचार योग्य बनाते हैं, जिनकी सेवानिवृत्ति में छह महीने से कम समय बचा हो।

सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2019 में प्रकाश सिंह मामले में स्पष्ट किया था कि DGP पद के लिए उन्हीं अधिकारियों के नाम की सिफारिश की जानी चाहिए, जिनकी सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम छह महीने की सेवा शेष हो।

इसी आधार पर केंद्र ने झारखंड में की गई DGP नियुक्तियों पर सवाल उठाया है।

पीठ ने टिप्पणी की:

“किसी अधिकारी को राज्य के पुलिस महानिदेशक के पद पर नियुक्ति के लिए तब भी पात्र बनाया गया है, जब उसकी सेवानिवृत्ति से पहले शेष सेवा छह महीने से कम है। प्रथमदृष्टया ऐसा प्रावधान इस न्यायालय द्वारा प्रकाश सिंह मामले में निर्धारित कानून के सीधे विपरीत प्रतीत होता है।”

तदाशा मिश्रा की नियुक्ति भी सवालों के घेरे में

केंद्र ने विशेष रूप से झारखंड की मौजूदा DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति का मुद्दा उठाया है।

IPS अधिकारी तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को दो वर्ष के कार्यकाल के लिए झारखंड का पूर्णकालिक DGP नियुक्त किया गया था। यह नियुक्ति उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले हुई थी।

इससे पहले वह कार्यवाहक DGP के रूप में कार्य कर रही थीं। उनसे पहले IPS अधिकारी अनुराग गुप्ता ने DGP पद से स्वेच्छा से इस्तीफा दिया था।

केंद्र का कहना है कि दोनों नियुक्तियों के समय संबंधित अधिकारियों के पास सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित छह महीने की न्यूनतम अवशिष्ट सेवा नहीं थी।

‘किसकी सरकार सत्ता में है, यह हमारी चिंता नहीं’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष या सरकार को निशाना बनाना नहीं है।

उन्होंने कहा:

“हमारी चिंता यह नहीं है कि केंद्र या राज्य में कौन सत्ता में है। हमारा बाध्यकारी कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि इस न्यायालय द्वारा घोषित कानून को कमजोर न किया जाए।”

पीठ ने झारखंड सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है। राज्य को या तो अपने DGP नियुक्ति नियम पर पुनर्विचार करना होगा या फिर अदालत के समक्ष उसका बचाव करना होगा।

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तदाशा मिश्रा को भी नोटिस, नियुक्ति के भविष्य पर अदालत की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने DGP तदाशा मिश्रा से भी जवाब मांगा है।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि उनकी नियुक्ति के आधार पर उनके पक्ष में एक अधिकार पहले ही बन चुका है। यदि अदालत नियम को रद्द करती है, तो इसका उनकी नियुक्ति पर प्रभाव पड़ सकता है।

CJI ने कहा:

“एक अधिकार पहले ही उनके पक्ष में बन चुका है। यदि हम नियम को रद्द करते हैं, तो इसका उनकी नियुक्ति पर प्रभाव पड़ सकता है। अन्यथा, हम नियम को भविष्य के लिए रद्द कर सकते हैं और कह सकते हैं कि अधिकारी पद पर बनी रहें।”

झारखंड सरकार ने उठाया दूसरे राज्यों का मुद्दा

झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने केंद्र की कार्रवाई पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार केवल झारखंड को निशाना बना रही है, जबकि अन्य राज्यों में भी DGP नियुक्ति से जुड़े नियमों और नियुक्तियों की जांच की जरूरत है।

सिब्बल ने बिहार और अन्य राज्यों के नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि दूसरे राज्यों के प्रावधान भी सवालों के घेरे में हैं, तो उनकी भी जांच होनी चाहिए।

उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक DGP की सेवानिवृत्ति अप्रैल में होनी थी, लेकिन उन्हें मार्च में DGP नियुक्त किया गया और केंद्र सरकार ने स्वयं उनका कार्यकाल छह महीने बढ़ाया।

सिब्बल ने कहा कि ऐसे मामलों की भी अदालत में जांच होनी चाहिए।

केंद्र ने ‘चुनिंदा कार्रवाई’ के आरोप से किया इनकार

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र किसी राज्य के साथ चुनिंदा व्यवहार नहीं कर रहा है।

उन्होंने कहा:

“यदि अन्य राज्य हैं, चाहे वहां किसी भी पार्टी की सरकार हो, और उनके कानून उतने ही खराब या उससे भी खराब हैं, तो उन्हें भी जाना चाहिए। मैं चुनिंदा रवैया नहीं अपना सकता।”

इस पर सिब्बल ने कहा कि यदि ऐसे अन्य कानून हैं, तो उन्हें भी अदालत के संज्ञान में लाया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति बागची ने इस पर हल्के-फुल्के अंदाज में कहा:

“यही तो adversarial system की खूबसूरती है।”

DGP नियुक्ति प्रक्रिया की सभी राज्यों में होगी समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह केवल झारखंड तक इस जांच को सीमित नहीं रखेगा।

अदालत ने अमीकस क्यूरी राजू रामचंद्रन से कहा कि वह देश के अन्य राज्यों में DGP नियुक्ति से संबंधित कानूनों, नियमों और विनियमों की भी समीक्षा करें और यह देखें कि वे प्रकाश सिंह मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं।

अदालत ने निर्देश दिया:

“विद्वान अमीकस, जो DGP की नियुक्ति के संबंध में झारखंड राज्य द्वारा बनाए गए नियमों की जांच कर रहे हैं, उनसे यह भी अनुरोध किया जाता है कि वे अन्य राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों, नियमों और विनियमों तथा उन राज्यों द्वारा की गई नियुक्तियों के परिणामों को भी देखें।”

‘प्रकाश सिंह’ मामले में क्या तय हुआ था?

प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों के संबंध में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। DGP की नियुक्ति के संदर्भ में मार्च 2019 के आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया था कि DGP पद के लिए ऐसे अधिकारियों पर विचार किया जाए जिनकी सेवानिवृत्ति से पहले कम से कम छह महीने की सेवा शेष हो।

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केंद्र का आरोप है कि झारखंड ने अपने नियमों में बदलाव कर इस सिद्धांत से अलग व्यवस्था बनाई और ऐसा करने से पहले सुप्रीम कोर्ट की अनुमति भी नहीं ली।

केंद्र के अनुसार, प्रकाश सिंह के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि केंद्र या कोई राज्य उस फैसले में निर्धारित सिद्धांतों में बदलाव चाहता है, तो उसे सुप्रीम कोर्ट का रुख करना होगा।

UPSC को अधिकारियों के नाम भेजने की प्रक्रिया पर भी विवाद

केंद्र ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि झारखंड ने प्रकाश सिंह फैसले के कुछ हिस्सों को चुनिंदा रूप से अपनाया।

याचिका के अनुसार, राज्य ने DGP को दो वर्ष का कार्यकाल देने के सिद्धांत को अपनाया, लेकिन संभावित उम्मीदवारों के नाम UPSC को भेजने सहित अदालत द्वारा निर्धारित चयन प्रक्रिया से अलग रास्ता अपनाया।

हालांकि, ये केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई आपत्तियां हैं और इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

अमीकस क्यूरी ने भी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति पर उठाया था सवाल

अमीकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने भी हाल में अदालत के समक्ष कहा था कि तदाशा मिश्रा को उनकी सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले DGP नियुक्त करना प्रकाश सिंह मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को व्यापक बनाते हुए सभी राज्यों में DGP नियुक्ति के लिए बनाए गए कानूनों और नियमों की जांच का रास्ता खोल दिया है।

आगे क्या होगा?

झारखंड सरकार को अब एक सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करना होगा कि वह अपने 2025 के DGP नियुक्ति नियम में बदलाव करना चाहती है या उसका कानूनी बचाव करेगी। साथ ही, DGP तदाशा मिश्रा का जवाब भी अदालत के सामने आएगा।

इस मामले का प्रभाव केवल झारखंड तक सीमित रहने की संभावना नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अमीकस क्यूरी को सभी राज्यों के DGP नियुक्ति कानूनों और उनके तहत हुई नियुक्तियों की समीक्षा करने को कहा है।

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