इलाज में देरी को लेकर अस्पताल और डॉक्टर पर गंभीर टिप्पणी
हैदराबाद जिला उपभोक्ता आयोग ने 30 वर्षीय PhD स्कॉलर की इलाज में कथित देरी के मामले में निजी अस्पताल और न्यूरोलॉजिस्ट को सेवा में कमी का दोषी माना। माता-पिता को ₹1 करोड़ मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
इलाज में देरी को लेकर अस्पताल और डॉक्टर पर गंभीर टिप्पणी
हैदराबाद जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने 30 वर्षीय PhD स्कॉलर की मौत के मामले में एक निजी अस्पताल और उसके न्यूरोलॉजिस्ट को लापरवाही और सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर को संयुक्त रूप से मृतक के माता-पिता को ₹1 करोड़ मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा, शिकायतकर्ताओं को ₹50,000 कानूनी खर्च के रूप में भी देने का आदेश दिया गया है।
आयोग की अध्यक्ष बी. उमा वेंकट सुब्बा लक्ष्मी तथा सदस्य सी. लक्ष्मी प्रसन्ना और बी. राजी रेड्डी ने 25 अगस्त के आदेश में कहा कि अस्पताल और डॉक्टर ने तत्काल आवश्यक उपचार शुरू करने के बजाय परिवार की सहमति तथा बाद में COVID-19 RT-PCR रिपोर्ट का इंतजार किया, जिससे उपचार में देरी हुई।
चार घंटे की अहम अवधि में इलाज का आरोप
मृतक के माता-पिता के अनुसार, उनके बेटे को 17 अगस्त 2020 को गंभीर ब्रेन स्ट्रोक आया था। वह हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विषय में PhD कर रहा था।
परिजनों ने बताया कि युवक को दोपहर करीब 2 बजे हॉस्टल के गलियारे में बेहोशी की हालत में पाया गया और उसे तत्काल संबंधित अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में बताया गया कि उसे massive brain stroke हुआ है।
माता-पिता का आरोप था कि आवश्यक उपचार में देरी की गई और अस्पताल ने पहले एडवांस भुगतान जमा कराने पर जोर दिया। उनका दावा था कि स्ट्रोक के बाद उपचार के लिए महत्वपूर्ण चार घंटे की अवधि के भीतर आवश्यक चिकित्सा प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए थी।
अगले दिन डॉक्टर ने कथित तौर पर परिजनों को बताया कि सर्जरी की जाएगी। हालांकि, बाद में नर्स द्वारा RT-PCR टेस्ट के लिए सैंपल लिया गया और बताया गया कि COVID-19 रिपोर्ट आने के बाद ही सर्जरी की जाएगी।
RT-PCR रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद दूसरे अस्पताल रेफर
19 अगस्त 2020 की सुबह करीब 7 बजे RT-PCR रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद मरीज को COVID-19 के लिए निर्धारित अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी गई।
शिकायत के अनुसार, एंबुलेंस से दूसरे अस्पताल ले जाए जाने के दौरान मरीज बेहोश था और प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। दूसरे अस्पताल में भर्ती के समय परिजनों को बताया गया कि मरीज ब्रेन डेड हो चुका है।
इसके बाद उसकी हालत और बिगड़ती गई और 21 अगस्त को शाम करीब 4 बजे उसकी मौत हो गई।
अस्पताल ने आरोपों से किया इनकार
अस्पताल और डॉक्टर की ओर से आरोपों से इनकार किया गया। उनके वकीलों ने दलील दी कि संबंधित अस्पताल COVID-19 उपचार के लिए निर्धारित अस्पताल नहीं था और सरकारी निर्देशों के तहत COVID पॉजिटिव मरीजों की जांच कर उन्हें designated COVID hospital में रेफर करना अनिवार्य था।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मरीज को अस्पताल लाए जाने तक स्ट्रोक के बाद उपचार की महत्वपूर्ण चार घंटे की अवधि बीत चुकी थी। उनके मुताबिक, परिजन यह स्पष्ट नहीं कर सके थे कि स्ट्रोक कब शुरू हुआ या मरीज को आखिरी बार स्वस्थ अवस्था में कब देखा गया था। इसलिए मरीज को उसकी स्थिति स्थिर करने के लिए standard medication दी गई।
डॉक्टर की आपातकालीन चिकित्सा जिम्मेदारी पर जोर
मामले पर विचार करते हुए आयोग ने कहा कि डॉक्टर-पेशेंट संबंध का मूल आधार डॉक्टर का उचित कौशल, देखभाल और चिकित्सकीय ज्ञान के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है।
आयोग के अनुसार, अस्पताल और न्यूरोलॉजिस्ट की पेशेवर जिम्मेदारी थी कि मरीज को तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती। किसी भी procedural, administrative या consent-related बाधा को जीवनरक्षक उपचार में अनावश्यक देरी का कारण नहीं बनने देना चाहिए था।
‘भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से वंचित हुए वृद्ध माता-पिता’
आयोग ने मृतक की उम्र, उसकी शैक्षणिक योग्यता और PhD के बाद संभावित करियर को भी ध्यान में रखा। आयोग ने माना कि वह एक युवा और प्रतिभाशाली छात्र था, जिसके भविष्य में रोजगार प्राप्त कर अपने माता-पिता को आर्थिक सहयोग देने की पर्याप्त संभावना थी।
आयोग ने कहा कि उसकी असामयिक मृत्यु ने वृद्ध माता-पिता को उनके संभावित भविष्य के आर्थिक सहारे, सुरक्षा और देखभाल से वंचित कर दिया।
इन परिस्थितियों में आयोग ने माता-पिता को loss of dependency, income और future prospects के लिए ₹1 करोड़ का मुआवजा उचित, न्यायसंगत और न्यायोचित माना।
आयोग का आदेश
हैदराबाद जिला उपभोक्ता आयोग ने निजी अस्पताल और न्यूरोलॉजिस्ट को संयुक्त रूप से ₹1 करोड़ मुआवजा देने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त ₹50,000 कानूनी खर्च के रूप में भी भुगतान करने को कहा गया।
यह आदेश चिकित्सा लापरवाही से जुड़े मामलों में आपातकालीन उपचार में देरी, प्रशासनिक औपचारिकताओं और मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टर की पेशेवर जिम्मेदारी के महत्व को रेखांकित करता है।
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