दिल का दौरा पड़ने से हुई थी महिला की मौत, बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती: आयोग
विशाखापत्तनम उपभोक्ता आयोग ने HDFC लाइफ इंश्योरेंस को पॉलिसी शुरू होने के पांच दिन बाद दिल का दौरा पड़ने से मृत महिला के पति को 50 लाख रुपये बीमा राशि, ब्याज और मुआवजा देने का निर्देश दिया। आयोग ने दावा खारिज करने को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना।
पॉलिसी के पांच दिन बाद हुई मौत, पति ने लगाई उपभोक्ता आयोग की शरण
विशाखापत्तनम उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस को एक महत्वपूर्ण मामले में मृत महिला के पति को 50 लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने बीमा कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार का दोषी माना।
यह आदेश आयोग की अध्यक्ष डॉ. गुडला तनुजा और सदस्य वर्री कृष्णा मूर्ति की पीठ ने 30 मई को पारित किया।
दिल का दौरा पड़ने से हुई थी महिला की मौत
53 वर्षीय सावरा भास्कर ने आयोग में शिकायत दायर कर कहा कि उनकी पत्नी सावरा राधा ने 10 मार्च 2025 को एचडीएफसी लाइफ स्मार्ट प्रोटेक्ट प्लान के तहत 50 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी ली थी और इसके लिए 50,000 रुपये का वार्षिक प्रीमियम जमा किया था।
पॉलिसी के अनुसार जोखिम (Risk) 10 मार्च 2025 से शुरू हो गया था। लेकिन महज पांच दिन बाद, 15 मार्च 2025 को उनकी पत्नी की घर पर दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई।
बीमा कंपनी ने पॉलिसी रद्द कर दावा खारिज किया
महिला की मृत्यु के बाद एचडीएफसी लाइफ ने 10 अप्रैल 2025 को “पॉलिसी डिस्कंटीन्यूएंस” का पत्र जारी करते हुए दावा खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि प्रस्ताव पत्र (Proposal Form) में महत्वपूर्ण तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था, इसलिए पॉलिसी रद्द की जाती है।
पति ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी की मृत्यु पॉलिसी अवधि के दौरान हुई थी, इसलिए बीमा कंपनी को बीमा राशि का भुगतान करना चाहिए था। बिना किसी वैध कारण के दावा खारिज करना सेवा में कमी है।
बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती: आयोग
उपभोक्ता आयोग ने कहा कि एक बार प्रीमियम स्वीकार कर पॉलिसी जारी करने के बाद बीमा कंपनी जोखिम उत्पन्न होने पर केवल अपवाद (Exclusion Clauses) का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती।
आयोग ने कहा—
“बीमा कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि प्रस्ताव पत्र में दी गई जानकारी गलत थी। इसलिए पॉलिसी रद्द करना और दावा अस्वीकार करना सेवा में कमी के समान है।”
गलत जानकारी के आरोप के समर्थन में कोई सबूत नहीं
आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं किया कि महिला ने प्रस्ताव पत्र में कोई गलत जानकारी दी थी। केवल जांच का हवाला देकर पॉलिसी रद्द करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
आयोग ने कहा कि बीमा कंपनी ने बीमित घटना होने के बाद दावे का सम्मान करने के बजाय जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया, जिससे शिकायतकर्ता को आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
50 लाख रुपये के साथ ब्याज और मुआवजा देने का आदेश
उपभोक्ता आयोग ने एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को—
- 50 लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करे।
- 15 मार्च 2025 से भुगतान की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे।
- मानसिक पीड़ा के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा दे।
- मुकदमे के खर्च के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करे।
बीमा कंपनी की दलील खारिज
एचडीएफसी लाइफ की ओर से कहा गया था कि पॉलिसी “उच्चतम सद्भावना” (Utmost Good Faith) के सिद्धांत पर आधारित होती है और गलत जानकारी दिए जाने पर अनुबंध निरस्त किया जा सकता है। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि पॉलिसी को शुरुआती अवधि (Early Period) में जांच के बाद रद्द किया गया था, इसलिए शिकायतकर्ता को कोई अधिकार प्राप्त नहीं हुआ।
हालांकि आयोग ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
फैसले का महत्व
आयोग के इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि केवल इस आधार पर कि बीमाधारक की पॉलिसी लेने के कुछ दिनों बाद मृत्यु हो गई, बीमा कंपनी दावा अस्वीकार नहीं कर सकती। यदि पॉलिसी वैध रूप से प्रभावी थी और बीमित घटना उसी अवधि में हुई, तो कंपनी पर दावा चुकाने की जिम्मेदारी बनी रहती है और मुआवजे का अधिकार मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों को प्राप्त होता है।
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