सुप्रीम कोर्ट ने समझाया: ‘Certiorari’ में हाईकोर्ट कब दखल दे सकता है? दस्तावेजी सबूत नजरअंदाज करने पर हस्तक्षेप जायज
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट certiorari jurisdiction में सामान्य अपीलीय अदालत की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता, लेकिन महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी और perverse finding होने पर Articles 226 और 227 के तहत हस्तक्षेप कर सकता है।
महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी हो तो हाईकोर्ट का हस्तक्षेप वैध
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि Article 226 और 227 के तहत certiorari jurisdiction का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट सामान्य अपीलीय अदालत की तरह तथ्यों और साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता। हालांकि, यदि किसी वैधानिक प्राधिकरण ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों की अनदेखी कर ऐसी finding दर्ज की है, जो साक्ष्य से पूरी तरह असमर्थित या perverse है, तो हाईकोर्ट उस आदेश में हस्तक्षेप कर सकता है।
जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर और उज्जल भुइयां की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें सहकारी समिति से जुड़े विवाद में Registrar/Arbitrator और Delhi Co-operative Tribunal के आदेशों को रद्द किया गया था।
पीठ ने माना कि हाईकोर्ट ने अपनी certiorari jurisdiction की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया था।
क्या था पूरा विवाद?
मामला Burmah Shell Co-operative Housing Society में एक व्यक्ति की सदस्यता और उसके आधार पर आवासीय प्लॉट के allotment से जुड़ा था।
मूल दावेदार का कहना था कि वह सोसाइटी का सदस्य था और प्लॉट हासिल करने के लिए आवश्यक दायित्वों को पूरा कर चुका था, लेकिन उसे अवैध रूप से प्लॉट आवंटित नहीं किया गया।
इस मामले में पहले भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विवाद पहुंचा था। 21 अगस्त 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने ex-parte award को रद्द करते हुए arbitration proceedings को उस चरण से आगे जारी रखने का निर्देश दिया था, जहां सोसाइटी के खिलाफ ex-parte कार्यवाही हुई थी।
मूल arbitrator की मृत्यु के बाद Registrar, Co-operative Societies, Delhi ने arbitrator के रूप में कार्यभार संभाला।
Arbitrator और Tribunal ने दावेदार को सदस्य माना
Remand के बाद 7 अक्टूबर 2003 को arbitrator ने माना कि मूल दावेदार सोसाइटी का सदस्य था और उसने प्लॉट के allotment के लिए आवश्यक दायित्व पूरे किए थे।
Arbitrator ने Managing Committee को निर्देश दिया कि भूमि की पूरी कीमत का भुगतान किए जाने पर दावेदार के कानूनी उत्तराधिकारी को प्लॉट आवंटित किया जाए।
इसके बाद सोसाइटी ने Delhi Co-operative Tribunal के समक्ष अपील की, लेकिन Tribunal ने arbitrator के फैसले को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट के सामने सामने आए महत्वपूर्ण दस्तावेज – “Article 226/227 में Certiorari: हाईकोर्ट कब कर सकता है हस्तक्षेप?”
इसके बाद सोसाइटी ने संविधान के Articles 226 और 227 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट के सामने ऐसे दस्तावेज रखे गए, जिनसे कथित तौर पर पता चलता था कि मूल दावेदार ने 1951 में सोसाइटी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और Managing Committee ने उस इस्तीफे को स्वीकार भी कर लिया था।
रिकॉर्ड में यह भी था कि:
- 5 मई 1951 की Managing Committee की बैठक में इस्तीफा स्वीकार किया गया था।
- 18 अगस्त 1951 को उसका share किसी अन्य सदस्य को transfer कर दिया गया था।
- 1952 में सदस्यता के लिए किए गए उसके बाद के आवेदन को भी स्वीकार नहीं किया गया।
- प्लॉट के लिए रकम जमा करने की उसकी मांग भी अस्वीकार कर दी गई थी।
इन दस्तावेजों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि arbitrator और Tribunal ने महत्वपूर्ण material evidence को नजरअंदाज किया था और उनके निष्कर्ष टिकाऊ नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट ने certiorari की सीमा स्पष्ट की
सुप्रीम कोर्ट ने Hari Vishnu Kamath v. Syed Ahmad Ishaque, (1954) 2 SCC 881 के सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए कहा कि writ court सामान्यतः appellate court की भूमिका नहीं निभाता। केवल इसलिए कि किसी तथ्य पर दूसरा दृष्टिकोण संभव है, certiorari के तहत साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि certiorari jurisdiction पूरी तरह निष्क्रिय नहीं है।
जहां jurisdictional error, natural justice का उल्लंघन या record पर स्पष्ट दिखाई देने वाली error of law मौजूद हो, वहां हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।
पीठ ने Central Council for Research in Ayurvedic Sciences v. Bikartan Das, (2023) 16 SCC 462 के सिद्धांत को भी दोहराया कि ‘no evidence’, surmises, conjectures या perversity पर आधारित finding certiorari proceedings में चुनौती योग्य हो सकती है।
‘बिना सबूत के finding हो तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है’
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“यदि कोई finding रिकॉर्ड पर मौजूद किसी evidence के बिना दर्ज की जाती है या किसी supporting document के बिना निष्कर्ष निकाला जाता है, तो हस्तक्षेप का मामला बन सकता है, क्योंकि ऐसी finding error of law होगी।”
कोर्ट ने पाया कि arbitrator और Tribunal ने relevant documentary material को नजरअंदाज किया था।
विशेष रूप से, arbitrator ने इस आधार पर यह मान लिया कि मूल दावेदार जीवनभर सोसाइटी का सदस्य बना रहा क्योंकि उसका नाम सदस्यों की एक सूची में मौजूद था। लेकिन अन्य दस्तावेज इसके विपरीत स्थिति दिखा रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि Registrar की finding में perversity स्पष्ट थी।
Tribunal का ‘cryptic’ आदेश भी बना महत्वपूर्ण कारण
पीठ ने यह भी कहा कि Tribunal ने arbitrator के निष्कर्ष को एक संक्षिप्त और cryptic order के जरिए बरकरार रखा था। ऐसे में हाईकोर्ट के लिए यह जांचना उचित था कि क्या संबंधित findings वास्तव में रिकॉर्ड पर उपलब्ध material से समर्थित थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि प्लॉट के allotment के लिए पहले से चार अन्य दावेदार मौजूद थे। इसलिए, मूल दावेदार की सदस्यता ही साबित न होने की स्थिति में उसके पक्ष में allotment का आदेश देना अन्य पूर्व दावेदारों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता था।
सदस्यता नहीं तो प्लॉट allotment का अधिकार भी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार यह निष्कर्ष निकल गया कि मूल दावेदार को सोसाइटी का सदस्य माना ही नहीं जा सकता, तो प्लॉट की वास्तविक उपलब्धता का सवाल महत्वहीन हो जाता है।
चूंकि वह सदस्य नहीं था, इसलिए उसे प्लॉट के allotment का कोई वैधानिक entitlement भी प्राप्त नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कीं
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दिल्ली हाईकोर्ट ने arbitrator और Tribunal के आदेशों को रद्द करके अपनी certiorari jurisdiction का अतिक्रमण नहीं किया था।
पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और संबंधित civil appeals को खारिज कर दिया। मामले में costs के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
फैसले की कानूनी अहमियत
यह फैसला एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराता है कि Article 226/227 के तहत certiorari appellate jurisdiction का विकल्प नहीं है। हाईकोर्ट सामान्यतः साक्ष्यों की दोबारा समीक्षा नहीं कर सकता, लेकिन यदि वैधानिक प्राधिकरण ने महत्वपूर्ण दस्तावेजों की अनदेखी की हो और उसके आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाला हो जो रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है, तो वह error of law और perversity के आधार पर हस्तक्षेप कर सकता है।
Case: Prakash Narain Sharma v. Burmah Shell Co-operative Housing Society
Civil Appeal Nos.: 10693–10694 of 2026
निर्णय: 31 अगस्त 2026
पीठ: जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर और जस्टिस उज्जल भुइयां
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