FIR दर्ज न होने या सही जांच नहीं होने पर सीधे हाई कोर्ट का रुख करना सामान्य नियम नहीं: सुप्रीम कोर्ट

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BNSS में FIR और जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया

Sujal Vishwas Attavar v. State of Maharashtra (2026) में सुप्रीम कोर्ट ने Sakiri Vasu फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि FIR दर्ज न होने या उचित जांच नहीं होने की शिकायत पर पहले BNSS में उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने चाहिए। असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर सीधे अनुच्छेद 226 या धारा 482 CrPC का सहारा लेना उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने Sujal Vishwas Attavar v. The State of Maharashtra (2026) में स्पष्ट किया है कि FIR दर्ज नहीं होने या पुलिस द्वारा उचित जांच नहीं किए जाने की शिकायत पर सामान्यतः सीधे हाई कोर्ट के असाधारण क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता को पहले कानून में उपलब्ध वैधानिक उपायों का सहारा लेना चाहिए।

न्यायालय ने इस संबंध में Sakiri Vasu v. State of UP (2008) में दिए गए सिद्धांतों पर भरोसा किया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार या CrPC की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल तब नहीं किया जाना चाहिए, जब समान रूप से प्रभावी वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध हों।

FIR दर्ज नहीं होने पर सीधे रिट याचिका दायर करना सामान्य उपाय नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की शिकायत है कि पुलिस ने उसकी FIR दर्ज नहीं की है या FIR दर्ज होने के बावजूद उचित जांच नहीं की जा रही है, तो सामान्यतः उसे सबसे पहले हाई कोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का दरवाजा नहीं खटखटाना चाहिए।

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ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता को पहले संबंधित कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रियाओं का पालन करना होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियों में विशेष तात्कालिकता हो, तो अलग स्थिति बन सकती है।

इस प्रकार, असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर वैधानिक उपायों को दरकिनार कर सीधे संवैधानिक या अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करना उचित नहीं होगा।

BNSS में FIR और जांच के लिए निर्धारित क्रमबद्ध प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत उपलब्ध वैधानिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि आपराधिक अभियोजन शुरू करने के लिए कानून में एक क्रमबद्ध प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

इस प्रक्रिया के प्रमुख चरण हैं:

  1. धारा 173(1), BNSS: संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना सबसे पहले संबंधित पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जाएगी। कानून के अनुसार FIR दर्ज करने की प्रक्रिया इसी स्तर से शुरू होती है।
  2. धारा 173(4), BNSS: यदि थाना प्रभारी FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो शिकायतकर्ता संबंधित क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) के समक्ष अपनी शिकायत भेज सकता है।
  3. धारा 175(3), BNSS: यदि इसके बाद भी शिकायत का समाधान नहीं होता है, तो शिकायतकर्ता संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर सकता है और कानून के अनुसार उचित आदेश की मांग कर सकता है।

वैधानिक उपाय अपनाने के बाद ही असाधारण क्षेत्राधिकार का सवाल

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि FIR दर्ज कराने और उचित पुलिस जांच सुनिश्चित कराने के लिए BNSS में उपलब्ध उपायों को प्रभावी प्राथमिक प्रक्रिया के रूप में देखा गया है।

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अदालत ने Sakiri Vasu के सिद्धांतों को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार और CrPC की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियां वैधानिक उपायों का सामान्य विकल्प नहीं हैं।

हालांकि, जहां परिस्थितियां विशेष तात्कालिकता की मांग करती हैं, वहां असाधारण क्षेत्राधिकार के इस्तेमाल की संभावना बनी रह सकती है।

निर्णय: Sujal Vishwas Attavar v. The State of Maharashtra (2026 SC)

प्रमुख संदर्भ: Sakiri Vasu v. State of UP (2008 SC)

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