प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां डटे रहने के कारण करीब 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शनकारी किसी विरोध स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसानों, मजदूरों, ट्रेड यूनियनों और अन्य समूहों को भी प्रदर्शन का समान अधिकार है। सुनवाई में तुषार मेहता और मुकुल रोहतगी ने भी अपनी दलीलें रखीं।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि प्रदर्शनकारी किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकते। ऐसे स्थानों का इस्तेमाल केवल एक निश्चित अवधि के लिए किया जा सकता है, ताकि दूसरे समूहों को भी अपनी मांगों और मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराने का अवसर मिल सके।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अक्टूबर में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी एक समूह को किसी प्रदर्शन स्थल पर स्थायी रूप से कब्जा करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा, “आप किसी जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। किसान कहां जाएंगे? मजदूर कहां जाएंगे? ट्रेड यूनियनें कहां जाएंगी? बेघर लोग कहां जाएंगे? हर किसी को विरोध करने का अधिकार है।”
दूसरे प्रदर्शनकारी समूहों के अधिकारों का भी रखना होगा ध्यान
पीठ ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करने वाले समूहों के बीच प्रदर्शन स्थल के इस्तेमाल को लेकर मौजूद दावों का भी उल्लेख किया। सीजेआई ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि किसी समूह को अधिक समय क्यों दिया जा रहा है और दूसरे समूहों को पर्याप्त समय क्यों नहीं मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि संभव है कि किसी अन्य समूह ने भी उसी स्थान पर प्रदर्शन करने की मांग की हो। जगह एक हो या दो, लेकिन विरोध करने का अधिकार सभी को है।
सीजेआई ने स्पष्ट किया कि कोई समूह केवल इस आधार पर दूसरों को प्रदर्शन स्थल से बाहर नहीं रख सकता कि उसने पहले से उस जगह पर कब्जा कर रखा है। किसी एक समूह के कब्जे को दूसरे प्रदर्शनकारियों के अधिकारों में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता।
तुषार मेहता ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन का दिया उदाहरण
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध-प्रदर्शन का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि जुलाई में पार्टी को प्रदर्शन के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां डटे रहे।
तुषार मेहता ने यह भी कहा कि इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की। उन्होंने दलील दी कि संसद कोई सामान्य राजनीतिक इमारत नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता का प्रतीक है। इसलिए वहां तक मार्च करने या सुप्रीम कोर्ट परिसर में विरोध-प्रदर्शन करने की अनुमति बिना संबंधित मंजूरी के नहीं दी जा सकती।
व्यापारियों के नुकसान का मुकुल रोहतगी ने उठाया मुद्दा
कारोबारियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि विरोध-प्रदर्शनों के कारण करीब 2,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है।
उन्होंने अदालत को बताया कि दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित रामलीला मैदान कनॉट प्लेस से लगभग एक मील की दूरी पर स्थित है। उनके मुताबिक, इस क्षेत्र के आसपास आसफ अली रोड, दरियागंज, तुर्कमान गेट और कमला मार्केट जैसे प्रमुख थोक बाजार हैं, जो आगे जामा मस्जिद के इलाके से जुड़ते हैं।
रोहतगी ने कहा कि इस पूरे क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं और व्यापारिक गतिविधियां होती हैं। ऐसे में विरोध-प्रदर्शनों के प्रभाव को देखते हुए सरकार को इस विषय पर व्यापक नीति बनानी चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार दिल्ली के साथ-साथ अन्य राज्यों की राजधानियों के लिए भी प्रदर्शन स्थलों और उनकी व्यवस्था को लेकर योजना तैयार करे। उनके अनुसार, अब यह मुद्दा केवल जंतर-मंतर तक सीमित नहीं रह गया है।
प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ-साथ सार्वजनिक स्थलों के समान और उचित इस्तेमाल का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने रेखांकित किया कि किसी एक समूह को लंबे समय तक प्रदर्शन स्थल पर बने रहने की अनुमति देने से अन्य समूहों के विरोध करने के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष प्रदर्शनकारियों के अधिकार, संसद और न्यायालय परिसर की सुरक्षा तथा विरोध-प्रदर्शनों से व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दे भी उठे।
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