पति की मौत के बाद गैराज में रहने को मजबूर महिला को दिल्ली हाई कोर्ट से राहत, सास को साझा घर में जगह देने का निर्देश

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हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत एक विधवा महिला को बड़ी अंतरिम राहत

दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्वी दिल्ली में गैराज में रह रही एक विधवा महिला को अंतरिम राहत देते हुए सास को परिवार के घर में एक फ्लोर पर रहने की जगह देने का निर्देश दिया। जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि रहने के अधिकार का फैसला होने तक किसी महिला को बेघर नहीं छोड़ा जा सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत एक विधवा महिला को बड़ी अंतरिम राहत दी है। पूर्वी दिल्ली में संपत्ति विवाद के कारण वर्ष 2022 से परेशान महिला अपने पति की नवंबर 2024 में मृत्यु के बाद एक ऐसे गैराज में रहने को मजबूर थी, जहां शौचालय और बाथरूम तक की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसकी सास को त्रिलोकपुरी स्थित परिवार के घर के किसी एक फ्लोर पर उसे रहने की जगह देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक महिला के निवास के अधिकार पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक उसे बिना छत के नहीं छोड़ा जा सकता।

महिला ने घरेलू हिंसा कानून के तहत अंतरिम निवास की मांग वाली अपनी अर्जी खारिज किए जाने को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसका दावा था कि वह अपने दिवंगत पति राजू के साथ त्रिलोकपुरी स्थित इसी घर में रहती थी, जबकि उसकी सास ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी।

सास को साझा घर में रहने की जगह देने का निर्देश

27 अक्टूबर को पारित आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि याचिका पर फैसला होने तक महिला को बेघर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सास को अदालत के आदेशों के खुले उल्लंघन का लाभ उठाकर महिला के साझा घर में रहने के दावे को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि संबंधित संपत्ति का कम से कम एक फ्लोर सास के कब्जे में है।

2022 में शुरू हुआ था संपत्ति विवाद

विवाद की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी, जब महिला और उसका पति घर की चौथी मंजिल पर रह रहे थे। महिला की सास ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत अधिकारियों से संपर्क कर दंपति को घर से बेदखल करने की मांग की थी।

शुरुआत में बेदखली का आदेश पारित हुआ, लेकिन बाद में अपील में इसे रद्द कर दिया गया। अधिकारियों ने पाया था कि महिला का पति संपत्ति का सह-स्वामी (Co-owner) था।

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महिला के अनुसार, 13 अगस्त 2022 को उसकी सास ने चौथी मंजिल की बिजली आपूर्ति काट दी थी। इसके बाद उसे अपने पति के साथ घर छोड़ना पड़ा। पति ने बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल कराने तथा बेदखली से बचने के लिए सिविल कोर्ट का रुख किया, लेकिन उसकी अर्जी और बाद की अपील खारिज हो गईं।

पति के खिलाफ पुराने आदेश महिला के निवास अधिकार का फैसला नहीं कर सकते

हाई कोर्ट ने कहा कि महिला उन पुरानी कार्यवाहियों में पक्षकार नहीं थी। इसलिए उन मामलों में पारित आदेश उसके स्वतंत्र निवास अधिकार का निर्धारण नहीं कर सकते थे।

16 नवंबर 2024 को पति की मृत्यु के बाद महिला को उसके सिविल मुकदमे में शामिल किया गया था। हालांकि, यह मुकदमा 28 मई 2025 को वापस ले लिया गया। वहीं, महिला की सास ने भी 7 अगस्त 2025 को अपना मामला वापस ले लिया था।

हाई कोर्ट ने 8 फरवरी 2024 और 7 जनवरी 2025 के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके जरिए महिला की अंतरिम निवास संबंधी अर्जी खारिज की गई थी। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि दंपति के खिलाफ पारित बेदखली आदेश को डिविजनल कमिश्नर ने 17 मार्च 2023 को पहले ही रद्द कर दिया था।

पति की महिला रिश्तेदारों के खिलाफ भी घरेलू हिंसा कानून का सहारा ले सकती है महिला

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई महिला घरेलू हिंसा कानून के तहत अपने पति की महिला रिश्तेदारों के खिलाफ भी कार्यवाही कर सकती है। साथ ही, साझा घर (Shared Household) का मालिकाना हक पति के नाम होना जरूरी नहीं है।

कोर्ट ने 18 नवंबर 2023 की घरेलू घटना रिपोर्ट पर भी विचार किया। इसमें महिला ने आरोप लगाया था कि पानी और बिजली की आपूर्ति काटने के बाद उसे जबरन घर से बाहर निकाला गया। हाई कोर्ट के अनुसार, पहले की कार्यवाही में इस रिपोर्ट पर उचित रूप से विचार नहीं किया गया था।

गैराज में सोफा, बेड और फ्रिज के सहारे गुजार रही थी जिंदगी

हाई कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफिसर की 23 मई 2025 की रिपोर्ट पर विशेष ध्यान दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, महिला करीब तीन महीने से एक गैराज में रह रही थी।

22 मई को किए गए निरीक्षण के दौरान अधिकारी को वहां एक सोफा, सिंगल बेड, रेफ्रिजरेटर और कुछ बर्तन मिले। हालांकि, ये फर्नीचर और रेफ्रिजरेटर गैराज मालिक के थे। सबसे गंभीर बात यह थी कि गैराज में शौचालय या बाथरूम की कोई सुविधा नहीं थी। प्रोटेक्शन ऑफिसर ने महिला की रहने की स्थिति को खराब बताया था।

कोर्ट को यह भी बताया गया कि 22 मई और 24 सितंबर 2025 को पारित अंतरिम आदेशों के बावजूद चौथी मंजिल बेच दी गई थी। इन आदेशों में संपत्ति के संबंध में थर्ड-पार्टी अधिकार बनाने पर रोक लगाई गई थी और मौजूदा स्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया था।

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एक सप्ताह के भीतर फ्लोर देने और पुलिस निगरानी का आदेश

अंतरिम राहत देते हुए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि महिला को 28 अक्टूबर से एक सप्ताह के भीतर संपत्ति के किसी एक फ्लोर पर रहने की जगह उपलब्ध कराई जाए।

कोर्ट ने त्रिलोकपुरी पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को संपत्ति का दौरा करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि महिला को रहने के लिए उचित हिस्सा मिले।

अदालत ने निम्नलिखित निर्देश भी दिए:

  • सास महिला के आने-जाने, रहने और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच में किसी तरह की बाधा नहीं डालेगी।
  • किसी भी प्रकार की रुकावट आने पर पुलिस महिला की सहायता करेगी।
  • SHO को मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जिसमें महिला को दिए गए हिस्से की स्पष्ट पहचान होगी।
  • महिला को संपत्ति के मौजूदा बिजली कनेक्शन का इस्तेमाल करने की अनुमति होगी।

अंतरिम निवास की अर्जी पर मजिस्ट्रेट दोबारा करेंगे विचार

हाई कोर्ट ने महिला की अंतरिम निवास संबंधी अर्जी को दोबारा विचार के लिए मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल दिया गया निवास का इंतजाम मजिस्ट्रेट के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।

पीठ ने यह भी साफ किया कि आदेश में की गई टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष (Merits) पर कोई अंतिम राय नहीं माना जाएगा।

इस आदेश के जरिए हाई कोर्ट ने अंतरिम स्तर पर महिला को आवासीय सुरक्षा प्रदान की है, जबकि साझा घर में उसके कानूनी अधिकार का अंतिम निर्धारण संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा।

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