पुलिस कांस्टेबल की विधवा को 25 लाख बीमा, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा—लाभकारी योजना से इनकार अनुचित

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पुलिस कांस्टेबल की विधवा को 25 लाख बीमा, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बैंक की अपील खारिज की

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ग्रामीण बैंक की अपील खारिज करते हुए पुलिस कांस्टेबल की विधवा को 25 लाख रुपये बीमा भुगतान का आदेश बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा—लाभकारी योजना से इनकार अनुचित।


🔴 हाई कोर्ट का सख्त रुख, बैंक को राहत नहीं

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने उत्तराखंड ग्रामीण बैंक की अपील खारिज करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सिंगल जज के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें बैंक को एक दिवंगत पुलिस कांस्टेबल की विधवा को 25 लाख रुपये बीमा राशि देने का निर्देश दिया गया था।

चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि बैंक का दावा अस्वीकार करना कानून और रिकॉर्ड—दोनों के विपरीत था।


⚖️ वेतन खाता होने से पात्रता सिद्ध

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि मृतक पुलिसकर्मी का बैंक में सक्रिय वेतनभोगी खाता था। अदालत ने यह भी नोट किया कि खाते में नियमित रूप से वेतन जमा हो रहा था और इसमें कोई चूक नहीं थी।

इसके बावजूद बैंक ने केवल इस आधार पर दावा खारिज किया कि मृतक का नाम पुलिस विभाग द्वारा भेजी गई सूची में शामिल नहीं था—जिसे अदालत ने असंगत माना।


🚔 ड्यूटी के दौरान दुर्घटना में हुई थी मौत

मामले के अनुसार, मृतक उत्तराखंड पुलिस में कांस्टेबल थे और एसडीआरएफ में प्रतिनियुक्ति पर चालक के रूप में तैनात थे। 7 अगस्त 2021 को ड्यूटी के दौरान एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।

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वे अपने पीछे पत्नी और तीन बेटियों को छोड़ गए, जिसके बाद विधवा ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया।


🛡️ ‘मुफ्त पुलिस आकस्मिक मृत्यु बीमा’ योजना का लाभ

उत्तराखंड ग्रामीण बैंक ने 12 अप्रैल 2021 को नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (NICL) के साथ मिलकर “Complimentary Police Accidental Death Insurance Cover” योजना शुरू की थी।

इस योजना के तहत बैंक में वेतन खाता रखने वाले सभी पुलिस कर्मियों को, उनके कैडर की परवाह किए बिना, 25 लाख रुपये का बीमा कवर दिया जाना था। प्रीमियम का पूरा खर्च बैंक द्वारा वहन किया जाता था।


❌ सूची में नाम न होने पर बैंक का इनकार

बैंक ने मई 2022 में विधवा का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पुलिस विभाग द्वारा भेजी गई 676 कर्मचारियों की सूची में मृतक का नाम शामिल नहीं था।

हालांकि, पहले सिंगल जज ने इस तर्क को खारिज करते हुए बैंक को बीमा राशि के साथ 5% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था, जिसे अब खंडपीठ ने भी सही ठहराया।


📊 कोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष: योजना लाभकारी, इनकार अनुचित

हाई कोर्ट ने कहा कि यह योजना एक लाभकारी (beneficial) योजना थी, जिसका उद्देश्य सभी पात्र पुलिसकर्मियों को सुरक्षा देना था।

अदालत ने माना कि योजना का लाभ लेने की मुख्य शर्त केवल यह थी कि संबंधित व्यक्ति का बैंक में सक्रिय वेतन खाता हो, जिसमें नियमित वेतन जमा होता हो—और मृतक इस शर्त को पूरा करते थे।


⚖️ बैंक के तर्क को बताया निराधार

कोर्ट ने बैंक के इस तर्क को खारिज कर दिया कि मृतक योजना के पात्र नहीं थे। अदालत ने कहा कि यह दावा रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों के विपरीत और पूरी तरह निराधार है।

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साथ ही, बैंक के वकील ने भी यह स्वीकार किया कि बीमा प्रीमियम का भुगतान बैंक द्वारा ही किया जाना था।


🏛️ सिंगल जज के आदेश में कोई खामी नहीं

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सिंगल जज द्वारा पारित आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। इसलिए अपील में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने कहा कि वह रिट कोर्ट के निष्कर्ष से भिन्न दृष्टिकोण अपनाने के इच्छुक नहीं है।


🌐 निर्णय का व्यापक प्रभाव

यह फैसला लाभकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि तकनीकी आधारों पर पात्र लाभार्थियों को वंचित नहीं किया जा सकता।


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