सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी और वाणिज्यिक यौन शोषण पीड़ितों के पुनर्वास को Article 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का हिस्सा माना

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मानव तस्करी पीड़ितों के पुनर्वास को मौलिक अधिकार बताया: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया व्यापक ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’

कोर्ट ने व्यापक ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’ जारी करते हुए केंद्र और राज्यों को कई महत्वपूर्ण निर्देश-

  • पीड़ितों का गैर-अपराधीकरण
  • बंद आश्रय गृह आधारित पुनर्वास मॉडल पर पुनर्विचार
  • स्वैच्छिक यौन कर्मियों के अधिकार
  • व्यापक मानव तस्करी विरोधी कानून
  • बाल तस्करी की परिभाषा पर पुनर्विचार

मानव तस्करी के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई का महत्वपूर्ण पड़ाव

सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी और वाणिज्यिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation-CSE) के पीड़ितों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में व्यापक फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़ितों का पुनर्वास केवल सरकारी कल्याणकारी नीति का विषय नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने मानव तस्करी को मानव गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर हमला बताते हुए पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया। अदालत ने बचाव, संरक्षण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन और अभियोजन की पूरी प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए एक व्यापक “विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान” जारी किया।


प्रज्वला की जनहित याचिका से शुरू हुआ था मामला

यह मामला वर्ष 2004 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) से उत्पन्न हुआ था, जिसमें एंटी-ट्रैफिकिंग संगठन ‘प्रज्वला’ ने मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति के शिकार व्यक्तियों के बचाव, संरक्षण, पुनर्वास और समाज में पुनर्स्थापन की व्यवस्था में मौजूद गंभीर कमियों को उजागर किया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि तस्करी के शिकार लोगों को अपराधी की तरह देखा जाता है, जबकि वे स्वयं गंभीर अपराध के पीड़ित होते हैं।

वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि एक ऑर्गनाइज्ड क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (OCIA) बनाई जाएगी और मानव तस्करी से निपटने के लिए एक व्यापक कानून तैयार किया जाएगा। इन आश्वासनों के आधार पर अदालत ने मूल याचिका का निस्तारण कर दिया था।

हालांकि बाद के वर्षों में कई मसौदा विधेयक तैयार हुए, लेकिन न तो OCIA का गठन हुआ और न ही व्यापक कानून लागू हो सका। इसी कारण याचिकाकर्ता ने पुनः अदालत का रुख किया।


मानव तस्करी को बताया जटिल सामाजिक समस्या

अदालत ने संयुक्त राष्ट्र के पालर्मो प्रोटोकॉल, 2000 का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि मानव तस्करी केवल किसी व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भर्ती करना, आश्रय देना, नियंत्रण में रखना और शोषण करना भी शामिल है।

कोर्ट ने कहा कि गरीबी, सामाजिक बहिष्कार, लैंगिक भेदभाव, शिक्षा की कमी, आर्थिक असुरक्षा और पारिवारिक संकट जैसी परिस्थितियां तस्करों के लिए अवसर पैदा करती हैं।

पीठ ने कहा कि आज तस्करी का स्वरूप बदल चुका है और अब यह केवल पारंपरिक देह व्यापार केंद्रों तक सीमित नहीं है। इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से होने वाली साइबर-सक्षम मानव तस्करी (Cyber-Enabled Human Trafficking – CEHT) तेजी से बढ़ रही है।


केवल गरीबी नहीं, कई कारकों का परिणाम है तस्करी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानव तस्करी को किसी एक कारण से नहीं समझा जा सकता।

अदालत ने कहा कि न केवल गरीबी, बल्कि लैंगिक असमानता, सामाजिक संरचना, जातीय भेदभाव, पलायन, शिक्षा की कमी और अन्य अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से तस्करी की स्थितियां पैदा होती हैं।

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कोर्ट के अनुसार, मानव तस्करी एक “जटिल सामाजिक घटना” है, जिससे निपटने के लिए बहु-विषयक (multidisciplinary) दृष्टिकोण आवश्यक है।


अनुच्छेद 21 और 23 के संयुक्त अध्ययन से निकला पुनर्वास का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी का निषेध) को एक साथ पढ़ते हुए कहा कि राज्य की जिम्मेदारी केवल पीड़ित को बचाने तक सीमित नहीं है।

अदालत ने कहा कि तस्करी से मुक्त कराए गए व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने के लिए उसका सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पुनर्वास सुनिश्चित करना भी राज्य का संवैधानिक दायित्व है।

पीठ ने कहा कि पुनर्वास के बिना बचाव अभियान अधूरा है और केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाता है।


पुनर्वास का अर्थ केवल आश्रय और आर्थिक सहायता नहीं

कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास को केवल भोजन, आश्रय, चिकित्सा सुविधा, मुआवजा या कौशल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं किया जा सकता।

इसके साथ-साथ समाज में व्याप्त कलंक, अलगाव और भेदभाव को दूर करना भी पुनर्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अदालत के अनुसार, पीड़ितों को सम्मानजनक तरीके से समाज में पुनः स्थापित करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना पुनर्वास प्रक्रिया का मूल उद्देश्य होना चाहिए।


स्वैच्छिक वयस्क यौन कार्य और तस्करी में अंतर जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रत्येक वेश्यावृत्ति का मामला मानव तस्करी नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि बचाव अभियान के दौरान यह जांच आवश्यक है कि कोई वयस्क व्यक्ति वास्तव में तस्करी का शिकार है या अपनी इच्छा से यौन कार्य में संलग्न है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से यौन कार्य करने वाले वयस्कों को जबरन हिरासत में रखना या संस्थागत बंदी बनाना उनकी स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा।


सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया व्यापक ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’

अनुच्छेद 32 और 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए, जो उचित कानून बनने तक लागू रहेंगे।

1. मूलभूत सिद्धांत

  • पीड़ित की गरिमा और मानवाधिकार सर्वोपरि होंगे।
  • पीड़ितों को कभी अपराधी नहीं माना जाएगा।
  • पुनर्वास और संरक्षण के उपाय यथासंभव पीड़ित की सूचित सहमति पर आधारित होंगे।
  • किसी भी प्रकार के कलंक या भेदभाव की अनुमति नहीं होगी।
  • पीड़ित की सुरक्षा, गोपनीयता और सम्मान सुनिश्चित किया जाएगा।

2. बचाव से पहले और बचाव के दौरान की व्यवस्था

अदालत ने एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स (AHTUs) को मजबूत करने और अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देने का निर्देश दिया। बचाव अभियान पीड़ित-संवेदनशील तरीके से संचालित किए जाएंगे।

3. बचाव के बाद संरक्षण

पीड़ितों को कानूनी सहायता, चिकित्सा सुविधा, परामर्श, सुरक्षित आवास और न्यायिक निगरानी का अधिकार मिलेगा।

4. पुनर्वास

पुनर्वास कार्यक्रमों में शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार सृजन, सामाजिक सहायता और सरकारी योजनाओं तक पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।

5. पुनर्स्थापन और पुनर्मिलन

परिवार या समुदाय में वापसी केवल तभी होगी जब इससे पीड़ित की सुरक्षा को खतरा न हो। पीड़ित की इच्छा को प्राथमिकता दी जाएगी।

6. अभियोजन और मुकदमा

पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों को कानूनी और सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा ताकि वे बिना भय के न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सकें।

7. रोकथाम और प्रशिक्षण

रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और अन्य संवेदनशील स्थानों पर निगरानी बढ़ाने तथा पुलिस, अभियोजकों, न्यायिक अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों को नियमित प्रशिक्षण देने का निर्देश दिया गया।

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OCIA के गठन का आदेश देने से कोर्ट का इनकार

अदालत ने प्रस्तावित ऑर्गनाइज्ड क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (OCIA) के गठन की आवश्यकता पर विचार किया।

हालांकि कोर्ट ने माना कि वर्तमान व्यवस्था में कई एजेंसियों के बीच जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि कोई पूर्ण कानूनी या संस्थागत शून्यता मौजूद है।

इसी आधार पर अदालत ने OCIA के गठन का अनिवार्य आदेश देने से इनकार कर दिया, जबकि भविष्य में इस पर विचार करने का विकल्प सरकार के लिए खुला रखा।


केंद्र और राज्यों को दिए महत्वपूर्ण सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी कीं—

पीड़ितों का गैर-अपराधीकरण

अदालत ने कहा कि ITPA की कुछ धाराओं के कारण कई बार तस्करी के शिकार व्यक्तियों के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज हो जाता है। इस स्थिति को बदलने के लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता है।

बंद आश्रय गृह आधारित पुनर्वास मॉडल पर पुनर्विचार

कोर्ट ने कहा कि केवल बंद संस्थानों में रखने वाला पुनर्वास मॉडल हमेशा प्रभावी नहीं होता और अधिक लचीले तथा पीड़ित-केंद्रित विकल्प विकसित किए जाने चाहिए।

स्वैच्छिक यौन कर्मियों के अधिकार

अदालत ने कहा कि स्वैच्छिक वयस्क यौन कर्मियों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए और उन्हें तस्करी के मामलों के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए।

बाल तस्करी की परिभाषा पर पुनर्विचार

कोर्ट ने संकेत दिया कि भारतीय कानून में बाल तस्करी की वर्तमान परिभाषा पालर्मो प्रोटोकॉल से पूरी तरह मेल नहीं खाती और इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

व्यापक मानव तस्करी विरोधी कानून

अदालत ने केंद्र सरकार से सभी प्रकार की मानव तस्करी और शोषण को समाहित करने वाला व्यापक कानून बनाने पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया।


राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन माह में अनुपालन का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तीन माह के भीतर आवश्यक नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, कल्याण संस्थाओं की अधिसूचना और अन्य निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

मामले को अनुपालन रिपोर्ट के लिए सितंबर 2026 में सूचीबद्ध किया गया है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि मानव तस्करी और वाणिज्यिक यौन शोषण केवल आपराधिक कानून का विषय नहीं, बल्कि मानव गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न है। अदालत द्वारा तैयार किया गया ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’ पीड़ितों को न्यायिक व्यवस्था के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मामला: Prajwala v. Union of India


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