वे न तो आदतन अपराधी थे और न ही गंभीर अपराध के आरोपी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने वकील और पूर्व सैनिक को हथकड़ी लगाकर ले जाने को अपमानजनक बताया। महाराष्ट्र सरकार को 50-50 हजार रुपये मुआवजा देने के निर्देश।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख
Bombay High Court की नागपुर पीठ ने वकील और पूर्व सैनिक को हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक रूप से ले जाने को अपमानजनक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करार दिया है।
अदालत ने Government of Maharashtra को दोनों याचिकाकर्ताओं को 50-50 हजार रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसे आठ सप्ताह के भीतर अदा करना होगा।
पुलिस के आदर्श वाक्य की याद दिलाई
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि महाराष्ट्र पुलिस का आदर्श वाक्य ‘सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय’ है, जिसका अर्थ है—अच्छों की रक्षा और बुराइयों का दमन। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को इस आदर्श का पालन करना चाहिए।
क्या था मामला
मामला अमरावती जिले के तलेगांव पुलिस थाने से जुड़ा है, जहां से याचिकाकर्ताओं—वकील योगेश्वर कवाड़े और पूर्व सैनिक अविनाश दाते—को हथकड़ी लगाकर राज्य परिवहन बस से तहसीलदार कार्यालय ले जाया गया था।
वहीं उन्हें जमानत दी गई थी।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति Urmila Joshi-Phalke और न्यायमूर्ति Nivedita Mehta की पीठ ने कहा कि कानून लागू करने वालों की जिम्मेदारी केवल आरोपी या पीड़ित तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राज्य के प्रति भी है।
अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं को अनावश्यक रूप से अपमानित किया, जो किसी भी नागरिक के साथ स्वीकार्य नहीं है।
‘केवल कार्रवाई काफी नहीं’
अदालत ने कहा कि संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसे मुआवजा देना भी आवश्यक है। कोर्ट ने इसे “कानूनी चोट के लिए न्यायिक उपचार” का अनिवार्य हिस्सा बताया।
याचिकाकर्ताओं के आरोप
याचिका के अनुसार, अगस्त 2010 में दोनों याचिकाकर्ता एक शिकायत दर्ज कराने पुलिस थाने गए थे, लेकिन उनके खिलाफ ही पलट शिकायत दर्ज कर ली गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें आधी रात के बाद अवैध रूप से हिरासत में रखा, कपड़े उतरवाए और केवल अंत:वस्त्र में बैठाए रखा।
अगले दिन उन्हें हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक बस में ले जाया गया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा।
‘न तो आदतन, न गंभीर अपराधी’
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे न तो आदतन अपराधी थे और न ही गंभीर अपराध के आरोपी, फिर भी उनके साथ ऐसा व्यवहार किया गया।
फैसले का महत्व
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि पुलिस द्वारा की गई किसी भी अपमानजनक या अवैध कार्रवाई पर केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ितों को मुआवजा देना भी जरूरी है।
यह फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और पुलिस जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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