‘नाम से नहीं, सबूत से तय होगा अपराध’, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म मामले में आरोपी को बरी किया

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‘हर रामचंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हो सकता’

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि केवल नाम से किसी व्यक्ति के चरित्र का आकलन नहीं किया जा सकता। अदालत ने पीड़िता के बयानों में विरोधाभास, उसकी उम्र, परिस्थितियों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी को देखते हुए संदेह का लाभ दिया।


‘नाम नहीं, व्यक्ति और सबूत मायने रखते हैं’ : हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म के एक मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति को बरी करते हुए प्रसिद्ध अंग्रेज़ी नाटककार विलियम शेक्सपियर के Romeo and Juliet के प्रसिद्ध कथन “What’s in a name?” का उल्लेख किया।

न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने कहा कि प्रत्येक धर्म में बच्चों के नाम ईश्वर, देवी-देवताओं, संतों या पौराणिक पात्रों के नाम पर रखने की परंपरा है, लेकिन किसी व्यक्ति का नाम उसके व्यक्तित्व, आचरण या चरित्र का निर्धारण नहीं करता।


‘हर रामचंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं हो सकता’

अदालत ने कहा कि यदि केवल नाम से ही व्यक्ति का चरित्र तय होता, तो भारत का हर रामचंद्र मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जैसा होता।

अपने 22 जुलाई के फैसले में न्यायालय ने कहा कि नाम चाहे कितना भी आदर्श, आकर्षक या अर्थपूर्ण क्यों न हो, महत्व नाम का नहीं बल्कि व्यक्ति के आचरण और उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों का होता है।

इसी संदर्भ में अदालत ने शेक्सपियर की प्रसिद्ध पंक्ति भी उद्धृत की— “What is in a name? That which we call a rose by any other name would smell as sweet.”


क्या था पूरा मामला?

मामले की शुरुआत 6 अप्रैल 2006 को दर्ज एफआईआर से हुई, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया कि उसकी किशोर बेटी दो दिन पहले घर से लापता हो गई थी।

तीन दिन बाद लड़की के भाई और चाचा ने पुलिस को सूचना दी कि उन्हें लड़की और कथित आरोपी का पता चल गया है। इसके बाद पुलिस, भाई और चाचा की मौजूदगी में दोनों को बरामद किया गया।

लड़की के बयान के आधार पर आरोपी के खिलाफ अपहरण और दुष्कर्म का आरोपपत्र दाखिल किया गया। ट्रायल कोर्ट ने 15 गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।

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बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

आरोपी की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास हैं।

उन्होंने कहा कि घटना के समय लड़की बालिग थी और वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। इसलिए अपहरण का अपराध बनता ही नहीं है।

दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करते हैं कि लड़की का अपहरण किया गया था और उसके साथ यौन उत्पीड़न भी हुआ।


हाईकोर्ट ने माना- लड़की बालिग थी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना के समय लड़की की उम्र लगभग 18.4 वर्ष थी।

अदालत ने यह भी देखा कि कथित घटना दिन के उजाले में हुई, दोनों ने सार्वजनिक परिवहन से यात्रा की और नवरात्रि के दौरान भीड़भाड़ वाले मंदिर में भी गए, जहां पुलिस की भी पर्याप्त मौजूदगी थी।


‘यदि सहमति नहीं थी तो विरोध का अवसर था’

अदालत ने कहा कि यदि लड़की अपनी इच्छा के विरुद्ध आरोपी के साथ जा रही होती या किसी दबाव अथवा धमकी में होती, तो उसके पास रास्ते में कई अवसर थे जब वह शोर मचा सकती थी या लोगों से मदद मांग सकती थी।

न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने लगातार उसे धमकाया, हथियार दिखाया या ऐसा भय उत्पन्न किया कि वह विरोध न कर सके।


पीड़िता ने अपील के दौरान भी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई से किया इनकार

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि अपील की सुनवाई के दौरान स्वयं महिला ने कहा कि वह आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहती, क्योंकि वह अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी और आरोपी की कोई गलती नहीं थी।

अदालत ने इसे भी मामले के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल किया।

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वैज्ञानिक साक्ष्य निर्णायक नहीं, दुष्कर्म का आरोप संदेहास्पद

अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के आरोप को सिद्ध करने के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक (फोरेंसिक) साक्ष्य निर्णायक नहीं थे।

साथ ही रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह प्रतीत हो कि लड़की ने कथित घटना के दौरान प्रतिरोध किया था या विरोध दर्ज कराया था।

इन परिस्थितियों में अदालत ने अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह व्यक्त करते हुए आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया।


फैसले का महत्व

यह निर्णय दोहराता है कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपहरण और दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों, पीड़िता के बयानों, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है। यह फैसला मामले के विशिष्ट तथ्यों पर आधारित है और प्रत्येक आपराधिक मामले का निर्णय उसके अपने साक्ष्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।


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