हेट स्पीच पर नए अपराध बनाना न्यायपालिका का काम नहीं, मौजूदा कानून पर्याप्त – सुप्रीम कोर्ट

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हेट स्पीच पर नया कानून नहीं बना सकता कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच पर नए अपराध बनाना न्यायपालिका का काम नहीं, मौजूदा कानून पर्याप्त हैं—समस्या लागू करने में है, न कि कानून की कमी में।


सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश

Supreme Court of India ने हेट स्पीच और अफवाह फैलाने (rumour mongering) पर नए कानून बनाने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बड़ा संवैधानिक सिद्धांत दोहराया—अदालत नए आपराधिक अपराध (criminal offences) नहीं बना सकती। यह कार्य केवल विधायिका (Legislature) के अधिकार क्षेत्र में आता है।


पीठ और मामला

न्यायमूर्ति Vikram Nath और न्यायमूर्ति Sandeep Mehta की खंडपीठ Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India में दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने Article 32 of the Constitution of India के तहत कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी।


‘सेपरेशन ऑफ पावर्स’ पर जोर

कोर्ट ने कहा कि संविधान “शक्तियों के विभाजन” (separation of powers) के सिद्धांत पर आधारित है। न्यायपालिका का काम कानून की व्याख्या करना है, न कि नया कानून बनाना। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सरकार या संसद को नया कानून बनाने का निर्देश (mandamus) भी नहीं दे सकती।


हेट स्पीच पर पहले से कानून मौजूद

अदालत ने माना कि Indian Penal Code और अन्य कानूनों में पहले से ऐसे प्रावधान मौजूद हैं, जो सांप्रदायिक वैमनस्य, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और सार्वजनिक शांति भंग करने वाले कृत्यों को दंडित करते हैं। इसलिए “कानूनी शून्यता” (legislative vacuum) का तर्क स्वीकार नहीं किया गया।

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समस्या कानून में नहीं, लागू करने में

कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच की घटनाएं कानून की कमी नहीं बल्कि उसके “कमजोर या असमान लागू होने” (uneven enforcement) को दर्शाती हैं। ऐसे मामलों में समाधान कानून बनाने से नहीं बल्कि मौजूदा प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन से होगा।


लॉ कमीशन रिपोर्ट पर टिप्पणी

याचिकाकर्ता ने Law Commission of India की 267वीं रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमें नए प्रावधान जोड़ने की सिफारिश की गई थी। कोर्ट ने कहा कि यह सुझाव विधायिका के विचार का विषय है, न कि न्यायिक आदेश का।


FIR दर्ज करने पर महत्वपूर्ण स्पष्टता

अदालत ने एक अहम मुद्दे पर भी स्पष्ट किया कि यदि किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की जानकारी मिलती है, तो Section 154 CrPC के तहत FIR दर्ज करना अनिवार्य है। इसमें आरोपी की हैसियत या पद कोई मायने नहीं रखता।


सैंक्शन (Sanction) कब जरूरी?

कोर्ट ने कहा कि Section 156(3) CrPC के तहत जांच शुरू करने या FIR दर्ज करने के लिए पूर्व अनुमति (sanction) जरूरी नहीं है। सैंक्शन की आवश्यकता केवल उस चरण पर होती है जब अदालत मामले का संज्ञान (cognizance) लेती है।


पर्याप्त कानूनी उपाय मौजूद

कोर्ट ने बताया कि अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो कानून में पहले से कई उपाय मौजूद हैं—जैसे उच्च अधिकारियों से शिकायत, मजिस्ट्रेट के पास जाना, या संवैधानिक अदालतों का दरवाजा खटखटाना। इस “मल्टी-लेयर सिस्टम” को पर्याप्त और प्रभावी माना गया।


कंटीन्यूइंग मंडामस से इनकार

अदालत ने “continuing mandamus” जारी करने से भी इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में संभावित घटनाओं को ध्यान में रखकर लगातार निगरानी करना न्यायपालिका का कार्य नहीं है और इससे अन्य संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप होगा।

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संविधान के ‘Fraternity’ सिद्धांत का उल्लेख

अदालत ने Constitution of India के “Fraternity” (भाईचारा) सिद्धांत और Article 51A के तहत नागरिकों के कर्तव्य को रेखांकित किया कि सभी नागरिकों को आपसी सद्भाव और भाईचारा बनाए रखना चाहिए।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि हेट स्पीच जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समाधान न्यायपालिका द्वारा नए कानून बनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में है। यह निर्णय संवैधानिक सीमाओं और संस्थागत संतुलन को पुनः स्थापित करता है।


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