बच्चों की कस्टडी लड़ाई को Article 226 के तहत हेबियस कॉर्पस कार्यवाही में नहीं बदला जा सकता- HC

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अंतरराष्ट्रीय चाइल्ड कस्टडी विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हेबियस कॉर्पस याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने अमेरिका में मां के साथ रह रहे बच्चे की कस्टडी को लेकर दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बच्चों की कस्टडी लड़ाई को Article 226 के तहत हेबियस कॉर्पस कार्यवाही में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने पक्षकारों को NCPCR और अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की छूट दी।

Delhi High Court ने अंतरराष्ट्रीय चाइल्ड कस्टडी विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि बच्चों की अभिरक्षा (custody) से जुड़े जटिल विवादों का समाधान हेबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि Article 226 के तहत असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।

जस्टिस Prathiba M. Singh और जस्टिस Madhu Jain की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें पिता और दादी ने अमेरिका में मां के साथ रह रहे नाबालिग बच्चे को भारत लाने की मांग की थी।

क्या था मामला?

मामला Jasjit Singh Mangat & Anr Vs. Union of India Through Ministry of Home Affairs & Ors. से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता पिता, जो अमेरिकी नागरिक हैं, ने आरोप लगाया कि उनकी पूर्व पत्नी वर्ष 2018 में दोनों बच्चों को बिना उनकी अनुमति के भारत से अमेरिका ले गई थीं। याचिका में कहा गया कि उस समय वैवाहिक विवाद चल रहा था और पत्नी ने अचानक बच्चों के साथ भारत छोड़ दिया।

परिवार की ओर से स्थानीय पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की शिकायत भी दर्ज कराई गई थी।

पुलिस जांच में क्या सामने आया?

पुलिस जांच में पता चला कि मां दोनों बच्चों के साथ अमेरिका चली गई थीं। हालांकि स्टेटस रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि उड़ान रवाना होने के बाद पिता को एक ईमेल भेजा गया था।

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मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि दंपति बाद में अमेरिका में तलाक की कार्यवाही से गुजरे और तब से बच्चे मां के साथ वहीं रह रहे हैं।

पिता ने क्या मांग की?

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि नाबालिग बेटे को भारत वापस लाया जाए। इसके लिए उन्होंने Ministry of Home Affairs, Ministry of External Affairs और Central Bureau of Investigation (CBI) को भी आवश्यक निर्देश देने की मांग की, ताकि विदेश में किसी संभावित कस्टडी आदेश को लागू कराया जा सके।

मां का पक्ष

प्रतिवादी मां ने अदालत में कहा कि अमेरिका जाने का निर्णय दोनों पक्षों की सहमति से लिया गया था। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका में रहने की व्यवस्था स्वयं पिता ने करवाई थी।

मां ने यह भी कहा कि बच्चे पिछले कई वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहीं की सामाजिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था में पूरी तरह ढल चुके हैं।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई गंभीर तथ्यात्मक विवाद मौजूद हैं, जिनका निपटारा हेबियस कॉर्पस याचिका के सीमित दायरे में संभव नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट कहा:

“Habeas Corpus proceedings cannot be converted into custody battles for children.”

कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कस्टडी तय करने के लिए उनके कल्याण, भावनात्मक वातावरण, शिक्षा, सामाजिक स्थिरता और दीर्घकालिक हितों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक होता है।

बच्चे के अमेरिका में लंबे समय से रहने पर कोर्ट का जोर

खंडपीठ ने यह भी ध्यान दिया कि बच्चा पिछले लगभग आठ वर्षों से अमेरिका में रह रहा है और अमेरिकी नागरिक है।

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कोर्ट ने कहा कि आधिकारिक दस्तावेजों, पासपोर्ट और अन्य रिकॉर्ड में मां को वैध अभिभावक के रूप में दर्शाया गया है।

NCPCR मध्यस्थता तंत्र का उल्लेख

अदालत ने विशेष रूप से National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) द्वारा अंतरराष्ट्रीय कस्टडी विवादों के समाधान के लिए विकसित मध्यस्थता तंत्र का उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों का समाधान संरचित मध्यस्थता और वैधानिक गार्जियनशिप कार्यवाही के जरिए अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला Article 226 के तहत हेबियस कॉर्पस याचिका पर विचार करने के लिए उपयुक्त नहीं है।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं को NCPCR के समक्ष उपलब्ध उपायों और लंबित आपराधिक पुनरीक्षण कार्यवाही में अपने अधिकारों का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी।

यह फैसला अंतरराष्ट्रीय चाइल्ड कस्टडी मामलों में भारतीय अदालतों द्वारा अपनाए जा रहे संतुलित दृष्टिकोण और “child welfare principle” की प्राथमिकता को दोबारा रेखांकित करता है।

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