अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाई कोर्ट नहीं जा सकते, जब अपील का वैधानिक उपाय उपलब्ध हो: कर्नाटक हाई कोर्ट

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि अंतरिम निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) से जुड़े ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ जब सीपीसी के तहत वैधानिक अपील का प्रावधान मौजूद हो, तब संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं होगी।

कर्नाटक हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष के पास सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत प्रभावी वैधानिक अपील का उपाय उपलब्ध है, तो वह सीधे संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकता।

न्यायमूर्ति तारा वितस्ता गंजू की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि याचिकाकर्ता के पास वैधानिक अपीलीय उपाय उपलब्ध था।


क्या था मामला?

याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में संपत्ति विवाद को लेकर तत्काल एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा (Ex Parte Interim Injunction) देने की मांग की थी।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने बिना विपक्षी पक्ष को सुने अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और प्रतिवादियों को समन के माध्यम से तत्काल नोटिस जारी करने का आदेश दिया।

इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने अनुच्छेद 227 के तहत कर्नाटक हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की और ट्रायल कोर्ट के आदेश को मनमाना एवं अवैध बताया।


हाई कोर्ट ने अंतरिम राहत भी दी थी

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए प्रतिवादियों को अगली सुनवाई तक विवादित संपत्ति का हस्तांतरण करने या उस पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार सृजित करने से रोक दिया था।

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बाद में न्यायालय की रजिस्ट्री ने बताया कि प्रतिवादियों ने नोटिस लेने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद उन्हें विधिक रूप से नोटिस प्राप्त मान लिया गया।


अनुच्छेद 227 की याचिका क्यों नहीं मानी गई सुनवाई योग्य?

हाई कोर्ट ने कहा कि यह प्रश्न पहले ही सुप्रीम कोर्ट के निर्णय A. Venkatasubbiah Naidu v. S. Chellappan (2000) में स्पष्ट किया जा चुका है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आदेश 39 नियम 1 CPC के तहत पारित अंतरिम निषेधाज्ञा संबंधी आदेश के खिलाफ आदेश 43 नियम 1(r) CPC के तहत अपील का अधिकार उपलब्ध है।

ऐसी स्थिति में संबंधित पक्ष के पास दो वैधानिक विकल्प होते हैं—

  • ट्रायल कोर्ट के समक्ष आदेश 39 नियम 4 CPC के तहत अंतरिम आदेश निरस्त कराने का आवेदन देना, या
  • आदेश 43 नियम 1(r) CPC के तहत अपील दायर करना।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाई कोर्ट ने Virudhunagar Hindu Nadargal Dharma Paribalana Sabai v. Tuticorin Educational Society (2019) तथा Mohd. Ali v. V. Jaya (2022) के निर्णयों का भी उल्लेख किया।

अदालत ने कहा कि जहां प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध हो, वहां अनुच्छेद 227 के तहत याचिका दायर करना उचित नहीं है।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने उपलब्ध वैधानिक अपील का उपयोग करने के बजाय सीधे संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का सहारा लिया, जो स्वीकार्य नहीं है।


ट्रायल कोर्ट को जल्द फैसला करने का निर्देश

हाई कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर आदेश 39 नियम 1 एवं 2 CPC के तहत अंतरिम निषेधाज्ञा का आवेदन अभी भी ट्रायल कोर्ट में लंबित है।

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इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह उक्त आवेदन का चार सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय करे।


अंतरिम राहत चार सप्ताह तक जारी रहेगी

हाई कोर्ट ने अपने द्वारा पहले पारित अंतरिम आदेश को भी चार सप्ताह तक प्रभावी बनाए रखने का निर्देश दिया, ताकि ट्रायल कोर्ट इस अवधि के भीतर अंतरिम आवेदन पर निर्णय कर सके।


फैसले का महत्व

यह निर्णय दोहराता है कि अनुच्छेद 227 के तहत हाई कोर्ट की पर्यवेक्षी (Supervisory) शक्ति असाधारण प्रकृति की है और इसका प्रयोग तभी किया जाएगा जब कोई प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध न हो। यदि कानून अपील का स्पष्ट प्रावधान देता है, तो पहले उसी उपाय का उपयोग करना आवश्यक है।

मामला: Bharath Kumar v. Munivenkatappa, निर्णय दिनांक 7 जनवरी 2026

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