राज्य सरकार किसी कर्मचारी के वेतनमान को कम करने और अपीलकर्ता से अतिरिक्त राशि वसूलने के लिए पारित “बेहद अवैध तथा मनमाने” आदेश को किया खारिज – SC

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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार किसी कर्मचारी के वेतनमान को पूर्वव्यापी प्रभाव से कम नहीं कर सकती है और दी गई अतिरिक्त राशि की वसूली नहीं कर सकती है।

विशेष अनुमति द्वारा यह अपील, लेटर्स पेटेंट अपील संख्या 1254/2011 में पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित दिनांक 27 अगस्त, 2012 के अंतिम निर्णय के विरुद्ध निर्देशित है, जिसके तहत अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत उक्त अपील को खारिज कर दिया गया था और सिविल रिट अधिकारिता मामले (सीडब्ल्यूजेसी) संख्या 18542/2009 में उच्च न्यायालय के विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित दिनांक 23 फरवरी, 2010 के निर्णय और सिविल समीक्षा संख्या 82/2010 में विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित दिनांक 23 मार्च, 2011 के निर्णय को भी बरकरार रखा गया था।

न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा कर्मचारी (अपीलकर्ता) के वेतनमान को कम करने तथा अपीलकर्ता से अतिरिक्त राशि वसूलने के लिए पारित किए गए “बेहद अवैध तथा मनमाने” आदेश को खारिज कर दिया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि वेतनमान में कटौती तथा सरकारी कर्मचारी से वसूली का कोई भी कदम “दंडात्मक कार्रवाई के समान होगा, क्योंकि इसके गंभीर नागरिक तथा बुरे परिणाम हो सकते हैं।”

न्यायमूर्ति संदीप मेहता तथा न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा, “हमारा दृढ़ विश्वास है कि राज्य सरकार द्वारा किसी कर्मचारी के वेतनमान को कम करने तथा अतिरिक्त राशि वसूलने के लिए लिया गया कोई भी निर्णय पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता, वह भी लंबे समय के अंतराल के बाद।”

वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए, जबकि एएसजी विक्रमजीत बनर्जी तथा वरिष्ठ अधिवक्ता रूपेश कुमार प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

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अपीलकर्ता को 1966 में बिहार सरकार द्वारा आपूर्ति निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। इन वर्षों में, उन्होंने पदोन्नति अर्जित की, जिसके परिणामस्वरूप 1991 में उन्हें 5वें वेतन आयोग के अनुसार संशोधित वेतनमान के साथ एडीएसओ के रूप में नियुक्ति मिली। 2001 में उनकी सेवानिवृत्ति के बाद, उनकी पेंशन की गणना ADSO के रूप में इसी वेतनमान के आधार पर की गई।

हालांकि, 2009 में, राज्य सरकार ने वेतन निर्धारण में गलती के कारण पारिश्रमिक के अतिरिक्त भुगतान की वसूली की मांग करते हुए एक पत्र जारी किया और दावा किया कि 1999 में पारित एक सरकारी प्रस्ताव के कारण अपीलकर्ता को दी गई पदोन्नति 1996 में अप्रभावी हो गई थी। वसूली नोटिस को चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता की सेवानिवृत्ति के आठ साल बाद राज्य द्वारा उसके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती थी क्योंकि अपीलकर्ता की सेवानिवृत्ति के बाद नियोक्ता-कर्मचारी संबंध समाप्त हो गया था। पीठ ने कहा, “वेतनमान में कटौती और अपीलकर्ता से वसूली का निर्देश देने वाले आदेश से पहले कोई कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया था और इस प्रकार, यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।”

न्यायालय ने सैयद अब्दुल कादिर बनाम बिहार राज्य (2009) में अपने निर्णय का हवाला दिया, जिसमें यह माना गया था कि जब कम समय के भीतर अतिरिक्त अनधिकृत भुगतान का पता चलता है, तो नियोक्ता के लिए उसे वसूलना खुला होगा। इसके विपरीत, यदि भुगतान लंबे समय तक किया गया है, तो कोई भी वसूली करना अन्यायपूर्ण होगा।

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पीठ ने कहा कि “वेतनमान में कटौती और अतिरिक्त राशि की वसूली का निर्देश देने वाली विवादित कार्रवाई पूरी तरह से मनमानी और अवैध है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन न करने के दोष से ग्रस्त है और इसलिए, इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है।”

परिणामस्वरूप, न्यायालय ने स्पष्ट किया, “यदि विवादित आदेशों के कारण पेंशन में कोई कटौती और परिणामी वसूली की गई थी, तो अपीलकर्ता लागू ब्याज के साथ इसकी बहाली/प्रतिपूर्ति का हकदार होगा।”

तदनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार कर लिया।

वाद शीर्षक – जगदीश प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य और अन्य।

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