वकालत पेशे के कारण FIR दर्ज होने के आरोप पर कोर्ट गंभीर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रामपुर के वकील के खिलाफ दर्ज FIR, तत्काल चार्जशीट और उसी दिन संज्ञान लेने के मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने डिप्टी कमिश्नर GST, CO और विवेचना अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया।
रामपुर के वकील पर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिकारियों को तलब किया
वकालत पेशे के कारण FIR दर्ज होने के आरोप पर कोर्ट गंभीर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रामपुर के एक अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर, त्वरित विवेचना और उसी दिन मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के मामले को गंभीरता से लिया है। अदालत ने संकेत दिया कि प्रथम दृष्टया यह कार्रवाई संबंधित अधिकारियों के दबाव में की गई प्रतीत होती है।
मामला रामपुर के अधिवक्ता समर्पण जैन से जुड़ा है, जिन्होंने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी है।
कोर्ट ने अधिकारियों की भूमिका पर जताई चिंता
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि डिप्टी कमिश्नर जीएसटी रामपुर संदेश कुमार जैन, सीओ (अपराध) कीर्ति निधि आनंद तथा विवेचना अधिकारी अनुपम शर्मा के दबाव के कारण एफआईआर दर्ज हुई, तुरंत चार्जशीट दाखिल की गई और मजिस्ट्रेट ने उसी दिन संज्ञान भी ले लिया।
अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
डिप्टी कमिश्नर कोर्ट में हुए पेश
हाई कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में डिप्टी कमिश्नर संदेश कुमार जैन व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करते हुए अदालत में उपस्थित हुए।
उनकी ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली तारीख पर डिप्टी कमिश्नर, सीओ और विवेचना अधिकारी की उपस्थिति अनिवार्य होगी और इसमें किसी प्रकार की चूक स्वीकार नहीं की जाएगी।
याची की गिरफ्तारी पर पहले से रोक
हाई कोर्ट ने इससे पहले ही अधिवक्ता समर्पण जैन की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा रखी है।
अब अदालत ने याची को चार्जशीट और मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान आदेश को चुनौती देने के लिए समय प्रदान किया है।
मामले की अगली सुनवाई 21 मई को निर्धारित की गई है।
त्वरित विवेचना और संज्ञान पर उठे सवाल
मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह माना जा रहा है कि एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद विवेचना पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी गई और मजिस्ट्रेट ने उसी दिन उस पर संज्ञान भी ले लिया।
इसी प्रक्रिया को लेकर हाई कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत यह जांच कर सकती है कि क्या पूरी कार्रवाई निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से की गई थी या फिर प्रशासनिक दबाव में प्रक्रिया को असामान्य तेजी से आगे बढ़ाया गया।
वकीलों की स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच का मुद्दा
यह मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इससे वकीलों की पेशेगत स्वतंत्रता, निष्पक्ष जांच और आपराधिक प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे व्यापक सवाल भी जुड़े हुए हैं।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी से संकेत मिल रहे हैं कि अदालत इस मामले में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की गहराई से जांच कर सकती है।
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