प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़ी अर्जेंट याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के पास वीडियो देखने का समय नहीं है और वकील को कोर्ट का समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस कार्रवाई से संबंधित एक अर्जेंट याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अधिवक्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि वह कथित पुलिस कार्रवाई के वीडियो देखें और मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लें।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि अदालत के पास वीडियो देखने का समय नहीं है।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
मामले का उल्लेख करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि प्रदर्शनकारियों, जिनमें छात्र भी शामिल थे, पर पुलिस ने बल प्रयोग किया और इस संबंध में कई वीडियो उपलब्ध हैं।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इन वीडियो को देखकर मामले में स्वतः संज्ञान लिया जाए।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया।
CJI की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा—
“हमारे पास वीडियो देखने का समय नहीं है।”
उन्होंने अधिवक्ता से यह भी कहा कि—
“कोर्ट का समय बर्बाद मत कीजिए और अपना समय भी बर्बाद मत कीजिए।”
इसके बाद अदालत ने मामले पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन कर रहे छात्र कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठा रहे हैं, जिनमें प्रमुख रूप से—
- नीट (NEET) परीक्षा का निष्पक्ष एवं व्यवस्थित संचालन, और
- राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में सुधार
की मांग शामिल है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, छात्रों का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और सुधार सुनिश्चित करना है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अनियमितता न हो।
अदालत ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर न तो मामले में स्वतः संज्ञान लिया और न ही अर्जेंट सुनवाई के लिए कोई आदेश पारित किया। अदालत ने केवल तत्काल हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।
नोट: उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि याचिका किस संगठन या समूह की ओर से दायर की गई थी। साथ ही, “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम का स्वतंत्र रूप से आधिकारिक सत्यापन उपलब्ध नहीं है। इसलिए न्यायिक रिपोर्टिंग में बिना सत्यापन के ऐसे दावे को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से बचना उचित है।
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