NEET-PG 2025 के लिए शून्य व निगेटिव स्कोर तक कट-ऑफ घटाने के खिलाफ डॉ. लक्ष्य मित्तल ने सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की; मरीजों की सुरक्षा और मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल।
प्रमुख बिंदु:-
- 13.01.2026 का NBEMS नोटिस रद्द (quash) किया जाए
- पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में न्यूनतम योग्यता मानकों की बहाली के निर्देश दिए जाएं
- भविष्य में मेरिट के इस प्रकार के क्षरण को रोकने के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाएं
नई दिल्ली:
NEET-PG 2025 कट-ऑफ विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुँचा: शून्य व निगेटिव स्कोर को चुनौती, मरीजों की सुरक्षा पर सवाल
पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा Post Graduet Medical Education की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट (UDF) के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने NEET-PG 2025-26 के लिए योग्यता कट-ऑफ पर्सेंटाइल में अभूतपूर्व और मनमानी कमी, यहां तक कि शून्य और निगेटिव स्कोर तक पात्रता दिए जाने के निर्णय को चुनौती देते हुए जनहित याचिका (PIL) दायर की है।
यह याचिका डायरी नंबर 3085/2026 के रूप में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। याचिका एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत, एडवोकेट आदर्श सिंह और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नीमा के माध्यम से दाखिल की गई है। चुनौती नेशनल बोर्ड ऑफ एग्ज़ामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज़ (NBEMS) द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी उस नोटिस के खिलाफ है, जिसके जरिए स्नातकोत्तर मेडिकल प्रवेश के न्यूनतम योग्यता मानकों को कथित तौर पर गंभीर रूप से कमजोर किया गया।
‘मेरिट का क्षरण, मरीजों की सुरक्षा खतरे में’
डॉ. लक्ष्य मित्तल के नेतृत्व में दायर याचिका में कहा गया है कि असामान्य रूप से कम या निगेटिव स्कोर वाले अभ्यर्थियों को पोस्टग्रेजुएट मेडिकल प्रशिक्षण के लिए योग्य ठहराना जनस्वास्थ्य, मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है। याचिका के अनुसार, यह निर्णय मनमाना, असंवैधानिक और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता सीधे तौर पर मरीजों के जीवन से जुड़ी होती है। ऐसे में न्यूनतम योग्यता मानकों का इस स्तर तक गिराया जाना स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के भी विपरीत है, जिनमें समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने मेरिट और मानकों को सर्वोपरि बताया है।
NMC Act, 2019 के उल्लंघन का आरोप
PIL में यह भी कहा गया है कि यह निर्णय नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट, 2019 की भावना और वैधानिक अनिवार्यता के खिलाफ है। अधिनियम के तहत नियामक संस्थाओं पर मेडिकल शिक्षा में न्यूनतम मानकों को बनाए रखने का दायित्व है। याचिका के अनुसार, NBEMS का यह कदम न केवल उस दायित्व का उल्लंघन है, बल्कि पूरे चयन तंत्र को मनमानेपन की ओर ले जाता है।
सुप्रीम कोर्ट से क्या राहत मांगी गई
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि:
- 13.01.2026 का NBEMS नोटिस रद्द (quash) किया जाए
- पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में न्यूनतम योग्यता मानकों की बहाली के निर्देश दिए जाएं
- भविष्य में मेरिट के इस प्रकार के क्षरण को रोकने के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाएं
यह मामला हाल ही में दायर किया गया है और संभावना है कि आने वाले दिनों में इसे सुप्रीम कोर्ट की उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।
FORDA का सरकार पर दबाव
इसी बीच, फेडरेशन ऑफ रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन्स (FORDA) ने बुधवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर NEET-PG 2025 के लिए कट-ऑफ में “ड्रास्टिक कटौती” के निर्णय को वापस लेने की मांग की।
FORDA ने चेतावनी दी कि यह फैसला मेरिट-आधारित चयन प्रणाली को कमजोर करता है और चिकित्सा पेशे की साख के लिए “गंभीर खतरा” है। संगठन ने NMC, NBE और रेज़िडेंट डॉक्टरों के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करने की मांग की है।
पत्र में कहा गया कि वर्षों तक कठिन तैयारी करने वाले लाखों अभ्यर्थियों के साथ यह निर्णय अन्याय है और बिना किसी ठोस कारण या परामर्श के की गई कट-ऑफ में कमी से कमजोर उम्मीदवारों के विशेषज्ञ प्रशिक्षण में प्रवेश का जोखिम बढ़ेगा, जिसका सीधा असर मरीजों की देखभाल पर पड़ेगा।
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