सुप्रीम कोर्ट ने Reliance Industries Ltd. v. NTPC Ltd. में कहा कि रिकॉर्ड से बाहर किए गए आंतरिक दस्तावेजों की सामग्री को मौखिक साक्ष्य के जरिए पेश नहीं किया जा सकता। RIL पर ₹10 लाख लागत लगाई और 2005 से लंबित मुकदमे के शीघ्र निपटारे का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने Reliance Industries Limited और NTPC Limited के बीच लंबे समय से लंबित गैस आपूर्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि जिन दस्तावेजों या आंतरिक संचार को अदालत पहले ही अप्रासंगिक मानकर रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर चुकी है, उनकी सामग्री को बाद में मौखिक साक्ष्य के माध्यम से पेश नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोई गवाह यह बता सकता है कि बैठक या बातचीत हुई थी और उसने स्वयं क्या देखा या अनुभव किया, बशर्ते उसके बयान के जरिए बाहर किए गए दस्तावेज की सामग्री को अप्रत्यक्ष रूप से रिकॉर्ड पर लाने की कोशिश न हो।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा RIL के साक्ष्य हलफनामों के कुछ हिस्सों को हटाने के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए RIL पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई।
मामला क्या था?
विवाद की शुरुआत NTPC द्वारा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए जारी किए गए Request for Qualification (RFQ) से हुई। RIL ने वित्तीय प्रस्ताव दिया और NTPC ने 16 जून 2004 को Letter of Intent (LOI) जारी किया।
इसके बाद NTPC ने दावा किया कि LOI की शर्तों को स्वीकार किए जाने के परिणामस्वरूप 132 ट्रिलियन BTU प्राकृतिक गैस की 17 वर्षों तक आपूर्ति के लिए बाध्यकारी अनुबंध अस्तित्व में आ गया था।
RIL ने इसका विरोध किया और अनुबंध से संबंधित बातचीत तथा आंतरिक निर्णय प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लाने की कोशिश की।
NTPC ने वर्ष 2005 में मुकदमा दायर किया, जो लगभग दो दशक बाद भी लंबित है।
आंतरिक दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने से हाईकोर्ट ने किया था इनकार
RIL ने NTPC के आंतरिक नोटिंग्स, पत्राचार और GSPA को अंतिम रूप देने से संबंधित चर्चाओं के दस्तावेजों की discovery और inspection की मांग की थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन्हें यह कहते हुए अप्रासंगिक माना कि इन दस्तावेजों से यह तय करने में सहायता नहीं मिलेगी कि दोनों पक्षों के बीच कोई concluded contract अस्तित्व में आया था या नहीं।
बाद में RIL ने अपने Defence Witness 1 (DW-1) के evidence affidavits में इन घटनाओं और आंतरिक संचार से संबंधित सामग्री शामिल की।
NTPC ने आपत्ति करते हुए कहा कि जिन दस्तावेजों को अदालत पहले ही रिकॉर्ड से बाहर कर चुकी है, उनकी सामग्री को गवाह के बयान के जरिए पेश किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में क्या कहा था?
इस विवाद के पहले चरण में सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी 2019 को महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी दस्तावेज या correspondence को अप्रासंगिक मानकर रिकॉर्ड पर लेने से मना कर दिया गया है, तो पक्षकार उसकी सामग्री को मौखिक साक्ष्य के जरिए रिकॉर्ड पर नहीं ला सकता।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि गवाह को उस घटना के बारे में बोलने से पूरी तरह रोक दिया जाए।
गवाह क्या बता सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले में इसी अंतर को दोहराया:
- गवाह यह बता सकता है कि कोई बैठक हुई थी।
- वह बता सकता है कि उसने स्वयं क्या देखा या अनुभव किया।
- वह घटनाओं के संबंध में अपनी व्यक्तिगत perception बता सकता है।
- लेकिन वह बाहर किए गए दस्तावेज, ई-मेल या internal communication की सामग्री को अपने बयान के जरिए पेश नहीं कर सकता।
यानी, घटना का तथ्य और गवाह का व्यक्तिगत अनुभव admissible हो सकता है, लेकिन excluded document का substantive contents नहीं।
हाईकोर्ट ने सभी हिस्से mechanically नहीं हटाए
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के paragraph-wise approach की सराहना की।
हाईकोर्ट ने RIL के दोनों evidence affidavits को अलग-अलग पैराग्राफ में जांचा और केवल वही अंश हटाए जो सुप्रीम कोर्ट के 2019 के निर्देश के विपरीत थे।
उदाहरण के तौर पर, 1st Evidence Affidavit के Para 23 में आंतरिक communications से संबंधित हिस्से हटाए गए, लेकिन DW-1 की अपनी perception से संबंधित बाद का हिस्सा रहने दिया गया।
इसी तरह Para 35 में गवाह द्वारा 12 अगस्त 2004 के पत्र के संबंध में अपनी perception बताने वाले हिस्से को बरकरार रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने न तो हर उस हिस्से को हटाया जिसमें internal meeting का उल्लेख था और न ही mechanically redaction किया।
Section 60 Evidence Act के तर्क को भी कोर्ट ने नहीं माना
RIL की ओर से Section 60, Evidence Act, 1872 के आधार पर oral testimony की admissibility का तर्क दिया गया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह वही मुद्दा है जिस पर 28 फरवरी 2019 के फैसले में पहले ही विचार किया जा चुका है।
इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अपने पुराने फैसले को दोबारा खोलने के लिए तैयार नहीं है।
दो दशक से लंबित मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सबसे कड़ी टिप्पणियों में से एक मुकदमे में हो रही लगातार देरी को लेकर थी।
कोर्ट ने नोट किया कि:
- discovery और inspection में करीब 4 साल लगे;
- internal documents के production से जुड़ा चरण एक वर्ष से अधिक चला;
- redaction से जुड़ी कार्यवाही 2016 से 2019 तक चली;
- 2024 में हाईकोर्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश लागू किए जाने के बाद भी वर्तमान अपील दायर की गई।
नतीजा यह हुआ कि 2005 में शुरू हुआ commercial suit लगभग दो दशक बाद भी evidence stage पर है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के अपने ही आदेश को याद किया, जिसमें trial court से मुकदमे को नौ महीने के भीतर पूरा करने का अनुरोध किया गया था। कोर्ट ने कहा कि उस निर्देश को भी सात वर्ष बीत चुके हैं।
RIL की litigation strategy पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
पीठ ने मुकदमे को लगातार आगे बढ़ने से रोकने के तरीके पर बेहद कड़ी टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि:
“the power of the RIL to litigate and obstruct progress of the suit seems unlimited.”
कोर्ट ने आगे कहा कि हर चरण में कोई न कोई आपत्ति उठाई गई और ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद appellate तथा special leave jurisdiction का सहारा लिया गया।
पीठ ने इस मुकदमे को “multiple seasons laden with many episodes” वाला litigation बताया।
यह टिप्पणी केवल वर्तमान appeal के merits पर नहीं, बल्कि commercial litigation में procedural obstruction और repeated challenges के कारण होने वाली न्यायिक देरी पर भी महत्वपूर्ण संदेश देती है।
₹10 लाख की लागत
सुप्रीम कोर्ट ने RIL की अपील खारिज करते हुए ₹10 लाख की लागत लगाई।
यह राशि Supreme Court Advocates-on-Record Association (SCAORA) को पांच सप्ताह के भीतर जमा कराने का निर्देश दिया गया।
साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट से कहा गया कि वह 2005 से लंबित suit को यथासंभव शीघ्रता से अंतिम रूप से तय करे।
फैसले का कानूनी महत्व
इस फैसले का महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि admissibility को दरकिनार करने के लिए oral evidence का सहारा नहीं लिया जा सकता।
यदि कोई document अदालत के समक्ष पेश करने के लिए पहले ही inadmissible या irrelevant माना जा चुका है, तो पक्षकार उसी document की सामग्री को:
Document → Oral testimony → Backdoor admission
के जरिए रिकॉर्ड पर नहीं ला सकता।
हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि उस document से संबंधित हर factual circumstance स्वतः inadmissible हो जाता है। गवाह अपने प्रत्यक्ष ज्ञान, perception और किसी बैठक के वास्तव में होने के बारे में गवाही दे सकता है।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने “excluded document की contents” और “उससे संबंधित witness’s personal perception” के बीच स्पष्ट रेखा खींची है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की redaction को सही ठहराते हुए कहा कि 2019 में तय कानूनी स्थिति का पालन किया गया है। RIL excluded internal documents की सामग्री को oral evidence के जरिए पेश नहीं कर सकता।
साथ ही, करीब 20 साल से लंबित commercial dispute में अदालत ने मुकदमे को और लंबा खींचने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई और ₹10 लाख की लागत लगाकर शीघ्र सुनवाई का रास्ता साफ किया।
केस: Reliance Industries Ltd. v. NTPC Ltd.
Citation: 2026 SCC OnLine SC 1579
निर्णय: 14 अगस्त 2026
पीठ: जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
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