सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IBC की धारा 61 के तहत अपील योग्य NCLT आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर हाईकोर्ट को सामान्यतः विचार नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने परिसमापन कार्यवाही के दौरान नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई की थी। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि यदि NCLT का आदेश दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 (IBC) की धारा 61 के तहत अपील योग्य है, तो हाईकोर्ट को सामान्यतः ऐसी रिट याचिका पर विचार करने से बचना चाहिए।
हाईकोर्ट ने NCLT के आदेश के खिलाफ रिट पर की थी सुनवाई
मामला 21 अप्रैल 2026 के केरल हाईकोर्ट के आदेश से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने परिसमापन कार्यवाही के दौरान NCLT द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका स्वीकार की थी और नोटिस जारी करने के साथ अंतरिम आदेश भी पारित किया था।
इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की गई। अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के विवादित आदेश और उसके समक्ष चल रही आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
अनुच्छेद 226-227 की शक्ति पर क्या दलील दी गई?
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट की संवैधानिक शक्तियों को किसी कानून के माध्यम से सीमित नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि न्यायिक अनुशासन की मांग है कि IBC के तहत पारित आदेश को उसी कानून में उपलब्ध वैधानिक अपीलीय व्यवस्था के तहत चुनौती दी जाए।
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष KSK Mahanadi Power Co. Ltd. (CoC) v. U.P. Power Corpn. Ltd. और Mohd. Enterprises (Tanzania) Ltd. v. Farooq Ali Khan के फैसलों पर भरोसा किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 61 को माना महत्वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की दलील में दम पाया। पीठ ने कहा कि IBC की धारा 61 के तहत कोड के पार्ट-II के अंतर्गत Adjudicating Authority द्वारा पारित आदेश से ‘व्यथित कोई भी व्यक्ति’ (person aggrieved) अपील कर सकता है।
कोर्ट ने विशेष रूप से ध्यान दिया कि धारा 61 में ‘order’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है और इसमें उन आदेशों की प्रकृति को सीमित नहीं किया गया है जिनके खिलाफ अपील की जा सकती है।
NCLT के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट को रिट से बचना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में न्यायिक अनुशासन की मांग है कि हाईकोर्ट IBC के तहत Adjudicating Authority/NCLT द्वारा पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से बचे।
खासकर तब, जब संबंधित व्यक्ति अपनी शिकायत को IBC में उपलब्ध वैधानिक अपील के माध्यम से उठा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध होने की स्थिति में सीधे रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करना सामान्य नियम के अनुरूप नहीं होगा।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द, रिट याचिका खारिज
इन निष्कर्षों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के आधार पर रिट याचिका खारिज कर दी।
हालांकि, कोर्ट ने रिट याचिकाकर्ताओं को IBC के तहत उपलब्ध उचित वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।
NCLAT में अपील के लिए 15 दिन की मोहलत
प्रतिवादियों की ओर से बताया गया कि IBC के तहत वैधानिक अपील निर्धारित अवधि में दाखिल की जानी थी और यह अवधि 45 दिनों से आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। इस मामले में अपील की अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 15 दिनों के भीतर नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) का रुख करने की अनुमति दी।
साथ ही, उन्हें Limitation Act, 1963 की धारा 14 के तहत आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी गई, जिसमें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही लंबित रहने की अवधि को बाहर करने की मांग की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे आवेदन पर कानून के अनुसार विचार किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर की
सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और रिट याचिका को वैकल्पिक उपाय के आधार पर खारिज कर दिया। हालांकि, प्रभावित पक्षों के लिए IBC के तहत NCLAT जाने का रास्ता खुला रखा गया।
केस: Davis Koottala Varkey v. Samson T. George
निर्णय की तारीख: 5 अगस्त 2026
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई
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