चुनाव में पैसे और प्रलोभन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FIR से ट्रायल तक दिए अहम निर्देश

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2019 से 2025 के बीच हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों से संबंधित कुल 1,44,030 FIR का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया की शुचिता के लिए नकदी और प्रलोभन पर रोक, जब्ती में लिखित कारण, एक साल में जांच और चुनावी मामलों की तेज सुनवाई के निर्देश दिए।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि चुनाव में काला धन, नकदी, शराब, उपहार या अन्य प्रलोभनों का इस्तेमाल लोकतंत्र की बुनियाद को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि मतदाता का निर्णय यदि बाहरी प्रभावों से प्रभावित हो जाए तो वह वास्तव में उसका स्वतंत्र निर्णय नहीं रह जाता। इसलिए चुनावी प्रक्रिया को धनबल और अन्य अनुचित प्रभावों से सुरक्षित रखना जरूरी है।

चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत व्यापक शक्तियां

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को प्राप्त शक्तियों की प्रकृति और सीमाओं पर भी विचार किया।

कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास चुनावों के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने के लिए व्यापक शक्तियां हैं। इनका इस्तेमाल नकदी, शराब, उपहार और अन्य चुनावी प्रलोभनों के वितरण को रोकने के लिए भी किया जा सकता है।

हालांकि, ये शक्तियां असीमित नहीं हैं। जहां संसद या राज्य विधानमंडल ने किसी विषय पर वैध कानून बनाया है, वहां चुनाव आयोग को उसी कानूनी व्यवस्था के अनुरूप कार्य करना होगा। वहीं, जहां कानून मौन है, वहां अनुच्छेद 324 चुनाव की शुचिता बनाए रखने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

2014 बेल्लारी उपचुनाव से शुरू हुआ मामला

मामला कर्नाटक के बेल्लारी लोकसभा क्षेत्र में 2014 के उपचुनाव के दौरान सामने आई एक घटना से जुड़ा था।

चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की फ्लाइंग स्क्वॉड ने एक गुमनाम शिकायत के आधार पर एक व्यक्ति के घर और व्यावसायिक परिसरों की तलाशी ली थी। शिकायत में आरोप था कि मतदाताओं को रिश्वत देने के लिए नकली मुद्रा रखी गई है।

तलाशी के दौरान अधिकारियों ने लैपटॉप, चेकबुक, खाली चेक, पेन ड्राइव और ₹20,48,355 नकद बरामद किए।

इसके बाद 11 अप्रैल 2014 को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 171-E और 188 के तहत FIR दर्ज की गई।

हाईकोर्ट ने FIR की थी रद्द

आरोपी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग की। 12 फरवरी 2015 को हाईकोर्ट ने FIR रद्द कर दी।

हाईकोर्ट का कहना था कि शिकायत में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि कथित तौर पर रिश्वत किन व्यक्तियों को दी जानी थी या रिश्वत देने का तरीका क्या था।

कर्नाटक सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में काले धन और अन्य प्रलोभनों के व्यापक इस्तेमाल तथा ऐसे अपराधों की रोकथाम, जांच और अभियोजन की प्रभावशीलता पर गंभीरता से विचार किया।

चुनावी मामलों की जांच और ट्रायल में देरी पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि चुनाव संबंधी अनेक आपराधिक मामले प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं क्योंकि अभियोजन काफी हद तक संबंधित राज्य सरकारों पर निर्भर रहता है।

कोर्ट ने पाया कि केवल FIR दर्ज करना या नकदी जब्त करना पर्याप्त नहीं है। चुनावी अपराधों की जांच और अभियोजन को भी तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए।

चुनाव आयोग के आंकड़ों में 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों तथा 2019 से 2025 के बीच हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों से संबंधित कुल 1,44,030 FIR का उल्लेख किया गया। इनमें केवल 37,215 मामलों यानी करीब 25.8% में दोषसिद्धि हुई, जबकि 44,387 मामले यानी करीब 31% पांच वर्ष या उससे अधिक समय के बाद भी ट्रायल में लंबित थे।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को गंभीर चिंता का विषय माना।

नकदी जब्ती में मनमानी नहीं चलेगी

कोर्ट ने चुनाव के दौरान फ्लाइंग स्क्वॉड और स्टैटिक सर्विलांस टीमों द्वारा नकदी या अन्य मूल्यवान वस्तुओं की जब्ती की प्रक्रिया की भी समीक्षा की।

कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह या किसी वस्तु के चुनावी अपराध से जुड़े होने की आशंका के आधार पर नागरिकों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

इसलिए जब्ती करने वाले अधिकारी को लिखित रूप में कारण दर्ज करने होंगे। इसमें उस सूचना का उल्लेख होना चाहिए जिसके आधार पर कार्रवाई की गई और जब्त वस्तु का संदिग्ध चुनावी अपराध से प्रथमदृष्टया संबंध भी स्पष्ट करना होगा।

24 घंटे में जब्ती की रिपोर्ट जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि नकदी या अन्य संपत्ति जब्त किए जाने पर संबंधित अधिकारी को 24 घंटे के भीतर इसकी जानकारी जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या सक्षम अदालत को देनी होगी।

रिपोर्ट के साथ लिखित कारण भी देने होंगे, ताकि यह स्पष्ट हो कि जब्त सामग्री का कथित चुनावी अपराध से प्रथमदृष्टया क्या संबंध है।

कोर्ट ने माना कि यह व्यवस्था मनमानी जब्ती को रोकने के साथ अधिकारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करेगी।

जब्ती की डिजिटल ट्रैकिंग पर जोर

Amicus Curiae की ओर से सुझाव दिया गया कि प्रत्येक जब्ती को एक विशिष्ट पहचान संख्या दी जाए और उसकी स्थिति को डिजिटल माध्यम से ट्रैक किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को उचित माना। हालांकि, कोर्ट ने तत्काल पूरे देश में लागू करने के बजाय पहले पायलट या सीमित स्तर पर ऐसी व्यवस्था विकसित करने और फिर चरणबद्ध तरीके से लागू करने की संभावना पर विचार किया।

चुनावी अपराधों की जांच एक साल में पूरी करने का प्रयास

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी अपराधों की जांच को लंबे समय तक लंबित रखने पर भी चिंता जताई।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी FIR दर्ज होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर जांच पूरी करने का हर संभव प्रयास करें।

यदि एक वर्ष में जांच पूरी नहीं हो पाती है तो उसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे और इसकी जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी।

हर तीन महीने में जांच की स्टेटस रिपोर्ट

कोर्ट ने जांच अधिकारियों को चुनाव आयोग के समक्ष त्रैमासिक स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

यह रिपोर्ट संबंधित नोडल अधिकारी के माध्यम से और जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस उपायुक्त की मंजूरी के बाद चुनाव आयोग तक पहुंचाई जाएगी।

इसका उद्देश्य चुनाव संबंधी आपराधिक मामलों की जांच की नियमित निगरानी सुनिश्चित करना है।

₹10 लाख से अधिक नकदी की जानकारी आयकर विभाग को

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि स्टैटिक सर्विलांस टीम को ₹10 लाख से अधिक नकदी मिलती है, तो इसकी जानकारी आयकर अधिकारियों को दी जानी चाहिए।

इससे चुनाव के दौरान संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की समानांतर जांच का रास्ता भी मजबूत होगा।

अगला चुनाव आने से पहले ट्रायल पूरा करने पर जोर

कोर्ट ने कहा कि चुनाव लगातार होने वाली प्रक्रिया है। इसलिए यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव संबंधी आपराधिक मामला वर्षों तक लंबित रहता है तो मतदाताओं को अगले चुनाव के समय उसके आचरण से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।

इसलिए हाईकोर्ट उपयुक्त अदालतों को ऐसे मामलों की शीघ्र सुनवाई और निपटारे के लिए नामित कर सकते हैं, विशेषकर उम्मीदवारों, मौजूदा सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों में।

हालांकि, कोर्ट ने प्रत्येक मामले के लिए एक कठोर और समान समयसीमा तय करने से परहेज किया।

सरकार बदलने पर चुनावी केस वापस नहीं होंगे

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव संबंधी आपराधिक मामलों को राजनीतिक सरकार बदलने के बाद वापस लिए जाने की प्रवृत्ति पर भी गंभीर चिंता जताई।

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कोर्ट ने कहा कि किसी चुनावी चक्र में उम्मीदवार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला केवल इसलिए वापस नहीं लिया जा सकता कि राज्य में सरकार बदल गई है।

अभियोजन वापस लेने के लिए लोक अभियोजक को स्वतंत्र रूप से अपना विवेक लागू करना होगा और अदालत को भी यह देखना होगा कि वापसी वास्तव में जनहित और न्याय के हित में है या उसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य तो नहीं है।

हाईकोर्ट की मंजूरी के बिना केस वापसी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने State of Kerala v. K. Ajith और Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India में दिए सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि किसी विशेष चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव संबंधी आपराधिक मामलों को वापस लेने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की मंजूरी आवश्यक होगी।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता परिवर्तन के कारण चुनावी अपराधों से जुड़े मामलों को स्वतः समाप्त न किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी अपराधों और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को लेकर प्रमुख रूप से ये निर्देश दिए—

  1. जब्ती में लिखित कारण: नकदी या अन्य संपत्ति जब्त करते समय प्रथमदृष्टया चुनावी अपराध से संबंध दर्शाने वाले कारण रिकॉर्ड किए जाएं।
  2. 24 घंटे में रिपोर्ट: जब्ती की सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित जिला मजिस्ट्रेट/सक्षम अदालत को दी जाए।
  3. एक साल में जांच: चुनावी FIR की जांच एक वर्ष के भीतर पूरी करने का हर संभव प्रयास किया जाए।
  4. त्रैमासिक रिपोर्ट: जांच की स्थिति की रिपोर्ट हर तीन महीने में चुनाव आयोग को भेजी जाए।
  5. ₹10 लाख से अधिक नकदी: इतनी राशि मिलने पर आयकर अधिकारियों को सूचना दी जाए।
  6. शीघ्र ट्रायल: हाईकोर्ट उम्मीदवारों, मौजूदा सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की तेज सुनवाई के लिए उपयुक्त अदालतें नामित कर सकते हैं।
  7. केस वापसी पर नियंत्रण: चुनावी चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मामलों को वापस लेने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी होगी।
  8. लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा: अदालतें चुनावी अपराधों से जुड़े लंबित मामलों को जल्द से जल्द तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का प्रयास करें।
  9. अनुपालन रिपोर्ट: चुनाव आयोग और संबंधित राज्य सरकारों को 18 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

चुनावी शुचिता की रक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का व्यापक महत्व चुनावी प्रक्रिया में धनबल और अन्य प्रलोभनों पर प्रभावी नियंत्रण से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी अपराधों की प्रभावी जांच, अभियोजन और समयबद्ध न्याय भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक हैं।

केस: State of Karnataka v. Prathik Parasrampuria
निर्णय: 17 अगस्त 2026
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह

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