राजस्थान हाई कोर्ट ने कथित ऑनर किलिंग मामले में 11 दोषियों को किया बरी, एक की फांसी की सजा भी रद्द; जांच को बताया ‘लापरवाह और सतही’

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अदालत ने बताया कि महर्षि कात्यायन ने साक्ष्य को ‘धर्म की आंख’ बताते हुए न्याय प्रदान करने का महत्वपूर्ण साधन माना

राजस्थान हाई कोर्ट ने 2019 के कथित ऑनर किलिंग और दोहरे हत्याकांड में 11 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने जांच को लापरवाहीपूर्ण बताते हुए कहा कि केवल बयान को अपराध साबित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटाने के लिए SOP बनाने और पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का निर्देश भी दिया।

राजस्थान हाई कोर्ट ने वर्ष 2019 के कथित ऑनर किलिंग और दोहरे हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए 11 आरोपियों को बरी कर दिया है। इनमें मृतक महिला के पिता भी शामिल हैं, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियां पाते हुए इसे ‘कैजुअल, परफंक्टरी और लैकडेजिकल’ यानी लापरवाह, सतही और उदासीन बताया।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोय की खंडपीठ ने 30 अक्टूबर को पारित आदेश में कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं। केवल किसी व्यक्ति के बयान को अपराध साबित करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अदालत ने करीब 1,900 से 2,000 वर्ष पुराने ग्रंथ ‘कात्यायन स्मृति’ का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय प्रदान करने के लिए साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूर्ण और अखंड कड़ी स्थापित करने में विफल रहा, जिससे अपराध का निष्कर्ष केवल आरोपियों की दोषिता की ओर ही जाता हो।

हाई कोर्ट ने सभी आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजाओं को रद्द कर दिया।

क्या था कथित ऑनर किलिंग का पूरा मामला?

यह मामला एक महिला और पुरुष की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन महिला के पिता को उनका रिश्ता मंजूर नहीं था। आरोप था कि इसी वजह से महिला के पिता ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर दोनों की हत्या की साजिश रची।

अभियोजन के मुताबिक, 21 अक्टूबर 2019 की रात पुरुष पीड़ित को एक पेट्रोल पंप पर बुलाया गया था। वहां तीन से चार लोगों ने कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की और उसे एक यात्री वाहन में बैठाकर ले गए।

आरोप था कि इसके बाद दोनों पीड़ितों को महिला के पिता के घर ले जाया गया, जहां उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया। बाद में उनके शवों को दूसरी जगह ठिकाने लगा दिया गया।

ट्रायल कोर्ट ने एक आरोपी को सुनाई थी फांसी की सजा

अभियोजन पक्ष ने आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए पेट्रोल पंप और महिला के पिता के घर से प्राप्त CCTV फुटेज, आरोपियों की निशानदेही पर कथित बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा किया था।

पेट्रोल पंप के CCTV फुटेज में एक लड़का और लड़की काली मोटरसाइकिल से आते दिखाई दिए थे। इसके बाद तीन से चार लोगों ने पुरुष पीड़ित के साथ मारपीट की और उसे एक यात्री वाहन में ले जाते हुए देखा गया।

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महिला के पिता के घर से प्राप्त फुटेज में भी एक व्यक्ति को महिला के साथ गंभीर मारपीट करते हुए दिखाया गया था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि वह व्यक्ति महिला का पिता था।

ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 को आरोपियों को दोषी ठहराया था। महिला के पिता को मृत्युदंड, नौ अन्य आरोपियों को आजीवन कारावास और एक आरोपी को साक्ष्य नष्ट करने से संबंधित अपराध के लिए तीन वर्ष की कैद सुनाई गई थी।

इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपियों ने राजस्थान हाई कोर्ट में अपील दाखिल की।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

आरोपियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट वी.आर. बाजवा ने दलील दी कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसी परिस्थितियों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी स्थापित नहीं कर पाया, जिससे केवल आरोपियों की दोषिता का निष्कर्ष निकलता हो।

उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।

बचाव पक्ष ने कहा कि CCTV फुटेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर भरोसा करने से पहले अदालत को यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संबंधित सैंपल और रिकॉर्ड की जब्ती, संरक्षण तथा अदालत में पेश किए जाने तक उनकी कस्टडी की अखंड कड़ी बनी रही हो।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इस मामले में साक्ष्यों की कस्टडी की ऐसी कोई अखंड कड़ी स्थापित नहीं की गई।

इसके अलावा, बचाव पक्ष ने कहा कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी विरलतम श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड दिया जाना भी उचित नहीं था।

वहीं, सरकारी वकील अमित कुमार पुनिया ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि CCTV फुटेज, बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य आरोपियों की संलिप्तता साबित करते हैं।

हाई कोर्ट ने CCTV फुटेज की जांच में पाईं गंभीर खामियां

हाई कोर्ट ने पेट्रोल पंप और महिला के पिता के घर से प्राप्त CCTV फुटेज के संग्रह और इस्तेमाल की प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाईं।

अदालत ने गौर किया कि फुटेज में कई व्यक्तियों के चेहरे स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे थे। इसके अलावा, जांच अधिकारी घटना से पहले आरोपियों को जानता तक नहीं था।

कोर्ट ने जांच की पूरी प्रक्रिया को ‘कैजुअल, परफंक्टरी और लैकडेजिकल’ बताते हुए कहा कि जांच अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संग्रह, जब्ती, संरक्षण और अदालत में उन्हें साबित करने की आवश्यक प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन नहीं किया।

पीठ ने कहा कि आपराधिक मामलों में न्याय प्रदान करना काफी हद तक अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत के सामने प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

कात्यायन स्मृति का उल्लेख कर कोर्ट ने साक्ष्य के महत्व पर दिया जोर

फैसले में हाई कोर्ट ने प्राचीन कानूनी ग्रंथ ‘कात्यायन स्मृति’ का उल्लेख किया। यह ग्रंथ महर्षि कात्यायन से संबंधित है।

अदालत ने बताया कि महर्षि कात्यायन ने साक्ष्य को ‘धर्म की आंख’ बताते हुए न्याय प्रदान करने का महत्वपूर्ण साधन माना था।

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खंडपीठ ने कात्यायन से संबंधित एक अन्य श्लोक का भी उल्लेख किया, जिसका आशय है:

“विद्वान न्यायाधीश को बिना साक्ष्य के किसी मामले को स्वीकार नहीं करना चाहिए। केवल एक बयान को प्रमाण नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने इस सिद्धांत के माध्यम से स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए केवल आरोप या बयान पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन पक्ष को विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से आरोप साबित करने होंगे।

पुलिस महानिदेशक को SOP बनाने और जांच अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का निर्देश

हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से संबंधित प्रक्रियाओं में पुलिस अधिकारियों की जानकारी और प्रशिक्षण की कमी पर भी चिंता जताई।

पीठ ने कहा कि कई जांच और पर्यवेक्षण अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, विशेषकर CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को एकत्र करने, जब्त करने, सुरक्षित रखने और अदालत में प्रमाणित करने की प्रक्रियाओं से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।

इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र करने, जब्त करने, संरक्षित रखने और अदालत में साबित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करें।
  2. SOP को पूरे राज्य में पुलिस अधिकारियों के बीच प्रसारित किया जाए।
  3. CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संरक्षण और प्रमाणन पर विशेष ध्यान दिया जाए।
  4. जांच अधिकारियों, थाना प्रभारियों (SHO) और पर्यवेक्षण अधिकारियों के लिए पूरे राज्य में नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

हाई कोर्ट ने क्या अंतिम फैसला सुनाया?

ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा:

“अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं (आरोपियों) की दोषिता की परिकल्पना के अनुरूप परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण और अखंड कड़ी स्थापित नहीं कर सका।”

अदालत ने आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया और ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई सजाओं को रद्द कर दिया।

इस फैसले में हाई कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि गंभीर आपराधिक आरोपों में भी दोषसिद्धि का आधार ठोस, विश्वसनीय और विधि के अनुसार साबित किए गए साक्ष्य होने चाहिए। साथ ही, जांच में लापरवाही और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संरक्षण में प्रक्रियात्मक खामियां आपराधिक मुकदमे के परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।

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