मौजूदा जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने के उद्देश्य से ऑनलाइन धमकियों पर भी निगरानी के निर्देश
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को निर्देश दिया है कि मौजूदा जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने के उद्देश्य से होने वाले प्रदर्शनों की अनुमति न दी जाए। कोर्ट ने सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ आपराधिक धमकियों की निगरानी करने का भी आदेश दिया।
न्यायपालिका और न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत हमलों तथा अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाई कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को निर्देश दिया है कि मौजूदा न्यायाधीशों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने के उद्देश्य से आयोजित होने वाले किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शन, रैली या मार्च की अनुमति न दी जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी अनुमति प्राप्त सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शन व्यक्तिगत हमले या न्यायपालिका को बदनाम करने का माध्यम बन जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को तत्काल कार्यक्रम समाप्त कराकर उचित कानूनी कार्रवाई करनी होगी।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने ये निर्देश जारी किए।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, “किसी भी सार्वजनिक सभा या मार्च के लिए अनुमति नहीं दी जाएगी, जिसका उद्देश्य किसी मौजूदा न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना, बदनाम करना या डराना हो। यदि अनुमति प्राप्त सभा व्यक्तिगत हमले में बदल जाती है, तो संबंधित अधिकारियों को तत्काल कार्यक्रम समाप्त करना होगा और उचित कानूनी कार्रवाई करनी होगी।”
फैसलों की आलोचना करना अधिकार, लेकिन जजों पर व्यक्तिगत हमला नहीं
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नागरिकों को न्यायिक फैसलों से असहमति जताने और उनकी आलोचना करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार का इस्तेमाल न्यायाधीशों के खिलाफ गाली-गलौज, मानहानि या जाति आधारित हमलों के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक फैसले की आलोचना और उस फैसले को लिखने वाले न्यायाधीश पर व्यक्तिगत हमला करने के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर है।
पीठ ने टिप्पणी की:
“नागरिकों को किसी फैसले से असहमत होने का पूरा अधिकार है। हालांकि, किसी कानूनी निष्कर्ष की आलोचना करने और उसे लिखने वाले न्यायाधीश पर हमला करने के बीच एक स्पष्ट कानूनी रेखा है।”
अदालत के अनुसार, न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक और जाति आधारित हमलों के लिए चलाए जाने वाले संगठित अभियान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण के तहत उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ धमकियों की निगरानी के निर्देश
हाई कोर्ट ने केवल सार्वजनिक प्रदर्शनों तक अपने निर्देश सीमित नहीं रखे, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी निगरानी रखने को कहा है।
पीठ ने तमिलनाडु पुलिस के साइबर क्राइम डिवीजन को निर्देश दिया कि वह सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय निगरानी रखे, ताकि मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ आपराधिक धमकियों को रोका जा सके।
अदालत ने कहा:
“राज्य पुलिस के साइबर क्राइम डिवीजन को निर्देश दिया जाता है कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय निगरानी रखें, यह सुनिश्चित करें कि ऑनलाइन सामग्री मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ आपराधिक धमकी का रूप न ले और किसी भी उल्लंघन के खिलाफ कानून के अनुसार तत्काल कार्रवाई करें।”
क्या है पूरा मामला?
यह मामला आर. कार्तिकेयन की ओर से दाखिल जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। याचिका में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस पी.बी. बालाजी की मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा 25 जून को दिए गए फैसले के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों का मुद्दा उठाया गया था।
इस फैसले में हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति के ऐसे लोगों को पिछड़े वर्ग के मुस्लिम के रूप में वर्गीकृत किया जाता था, जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, फैसले के बाद तमिलनाडु तौहीद जमात (TNTJ) और तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कड़गम (TMMK) जैसे संगठनों ने राज्यभर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।
याचिका में आरोप लगाया गया कि ये प्रदर्शन न्यायिक फैसले की सामान्य आलोचना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के एक मौजूदा न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने और उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण अभियान चलाने का माध्यम बन गए।
पोस्टर, रैलियों और सोशल मीडिया वीडियो में अपमानजनक टिप्पणियों का आरोप
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान लगाए गए पोस्टरों, रैलियों और सोशल मीडिया वीडियो में कथित तौर पर अपमानजनक और जाति आधारित टिप्पणियां की गईं।
याचिका के मुताबिक, इन गतिविधियों का उद्देश्य न्यायपालिका के प्रति आम लोगों का भरोसा कमजोर करना था।
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से मांग की थी कि न्यायपालिका को कमजोर करने या मौजूदा न्यायाधीशों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने वाले संगठित अभियानों, सार्वजनिक बैठकों, जुलूसों, प्रदर्शनों, भाषणों और सोशल मीडिया प्रकाशनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं।
तमिलनाडु सरकार ने कोर्ट में क्या बताया?
सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने अदालत को बताया कि पुलिस पहले ही कुछ कथित गैरकानूनी प्रदर्शनों के खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है।
राज्य सरकार के मुताबिक:
- 29 जून: मदुरै में TNTJ के विरोध प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी एकत्र हुए, जिसके बाद पुलिस ने FIR दर्ज की।
- 3 जुलाई: इसी तरह की एक अन्य घटना के बाद TMMK के सदस्यों के खिलाफ भी FIR दर्ज की गई।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से उठाए गए इन कदमों पर गौर किया, लेकिन कहा कि भौतिक और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चलाए जा रहे समन्वित अभियानों से निपटने के लिए केवल स्थानीय स्तर पर की गई कार्रवाई पर्याप्त नहीं हो सकती।
पुलिस को सभी जिलों में एक समान कार्रवाई करने का निर्देश
हाई कोर्ट ने कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को राज्य के सभी जिलों में तेजी और एकरूपता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत नाराजगी या न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत हमलों को वैध सार्वजनिक विरोध का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
पीठ के निर्देशों का उद्देश्य न्यायिक फैसलों की आलोचना और न्यायाधीशों को व्यक्तिगत रूप से डराने, बदनाम करने या धमकाने वाली गतिविधियों के बीच अंतर बनाए रखना है।
इस प्रकार, मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों पर असहमति और सार्वजनिक बहस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन न्यायाधीशों के खिलाफ व्यक्तिगत हमले और आपराधिक धमकियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उचित नहीं ठहराई जा सकतीं।
Tags:
#MadrasHighCourt #JudicialIndependence #FreedomOfSpeech #Judges #TamilNaduPolice #JusticeGRSwaminathan #PublicProtest #CyberCrime #LegalNews #मद्रासहाईकोर्ट #न्यायिकस्वतंत्रता #अभिव्यक्तिकीआजादी #न्यायाधीश #तमिलनाडुपुलिस #सार्वजनिकप्रदर्शन #साइबरक्राइम #कानूनीखबरें
