व्यभिचार के प्रथम दृष्टया सबूत हों तो अंतरिम भरण-पोषण नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने तय किया महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत

Like to Share

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से पत्नी के व्यभिचार का प्रथम दृष्टया मामला बनता है तो BNSS की धारा 144 (पूर्व CrPC धारा 125) के तहत अंतरिम भरण-पोषण स्वतः नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रथम दृष्टया ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं।


वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों से पत्नी के व्यभिचार (Adultery) का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित होता है, तो उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 (पूर्व में CrPC की धारा 125) के तहत अंतरिम भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पति द्वारा लगाया गया आरोप पर्याप्त नहीं होगा। न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना आवश्यक है।


क्या था मामला?

मामला हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) से जुड़ा है।

पति और पत्नी का विवाह वर्ष 2014 में हुआ था। वैवाहिक विवाद के बाद वर्ष 2020 में पत्नी पति का घर छोड़कर अलग रहने लगी।

इसके बाद पत्नी ने BNSS की धारा 144 (पूर्व CrPC धारा 125) के तहत अंतरिम भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दायर किया।

पति ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, इसलिए वह कानून के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं है।


ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने क्या कहा?

ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की आपत्ति स्वीकार नहीं की।

दोनों अदालतों का कहना था कि पत्नी के व्यभिचार का प्रश्न साक्ष्य के आधार पर अंतिम सुनवाई में तय होगा। इसलिए केवल इस आधार पर अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था—

Must Read -  853 मामलों के विश्लेषण देने में देरी पर इलाहाबाद HC की खिंचाई करते हुए, SC ने कहा - छुट्टियों में काम करें या केस हमें भेज दें-

यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से पत्नी के व्यभिचार का प्रथम दृष्टया आधार बनता हो, तो क्या उसे अंतरिम भरण-पोषण दिया जा सकता है?


सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण स्वतः प्राप्त होने वाला अधिकार (Automatic Right) नहीं है।

यदि पति न्यायालय के समक्ष ऐसे स्पष्ट और विश्वसनीय दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है, जिनसे प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता हो कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तो अदालत उस आपत्ति पर प्रारंभिक स्तर पर भी विचार कर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि केवल यह कहकर कि मामला अंतिम सुनवाई में तय होगा, हर स्थिति में पति की आपत्ति को टालना कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा।


सिर्फ आरोप पर्याप्त नहीं होंगे

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • केवल पति द्वारा लगाया गया आरोप पर्याप्त नहीं है।
  • न्यायालय को उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना होगा।
  • यदि आरोपों के परीक्षण के लिए विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता हो, तो अंतरिम भरण-पोषण जारी रह सकता है।
  • लेकिन जहां रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया वैधानिक अपवाद को स्थापित करती हो, वहां अदालत अंतरिम राहत देने से इनकार कर सकती है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 144 (पूर्व CrPC धारा 125) का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी को त्वरित राहत देना है ताकि वह मुकदमे के दौरान अभावग्रस्त न रहे।

लेकिन इसी प्रावधान में कुछ वैधानिक अपवाद भी दिए गए हैं, जिनमें प्रमुख है—

  • पत्नी व्यभिचार में रह रही हो।
  • बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से इंकार करती हो।
  • दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों।

कोर्ट ने कहा कि यदि इन अपवादों को हर मामले में अंतिम निर्णय तक टाल दिया जाए तो कानून का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा।


मामला वापस ट्रायल कोर्ट भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया।

Must Read -  फर्जी जमानतदारों पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट सख्त, बार-बार जमानत देने वालों की पहचान के लिए तंत्र बनाने का सुझाव

अब ट्रायल कोर्ट पति की ओर से दाखिल आवेदन पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर गुण-दोष के अनुसार पुनः निर्णय करेगा।


निजी जासूसों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर भी जताई चिंता

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में निजी जासूसों द्वारा जुटाए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर भी चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने केंद्र सरकार और विधि आयोग से निजी जासूसी एजेंसियों के नियमन, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संग्रह, संरक्षण, गोपनीयता और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करने को कहा।


सुप्रीम कोर्ट का कानूनी निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

  • अंतरिम भरण-पोषण कोई स्वचालित अधिकार नहीं है।
  • पत्नी के व्यभिचार का केवल आरोप पर्याप्त नहीं होगा।
  • अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया संतुष्ट होना आवश्यक है।
  • यदि प्रथम दृष्टया वैधानिक अपवाद सिद्ध होता है, तो अंतरिम भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है।
  • यदि आरोपों के लिए विस्तृत साक्ष्य परीक्षण आवश्यक हो, तो अंतिम निर्णय तक अंतरिम भरण-पोषण जारी रह सकता है।

मामला (Case Title)

Himanshu Chordia v. State of Rajasthan & Another (2026)


Tags:
#SupremeCourt #Maintenance #InterimMaintenance #BNSS #CrPC125 #Adultery #MatrimonialDispute #ElectronicEvidence #PrivateDetectives #FamilyLaw #LegalNews #सुप्रीमकोर्ट #भरणपोषण #गुजाराभत्ता #व्यभिचार #बीएनएसएस #पारिवारिकविवाद #कानूनीसमाचार

Leave a Comment