सुप्रीम कोर्ट: इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के सर्टिफिकेट नियम को वैध ठहराया, BSA की धारा 63(4) बरकरार

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सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 63(4) को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ सर्टिफिकेट की अनिवार्यता मनमानी नहीं है और इससे डिजिटल साक्ष्य की प्रामाणिकता सुनिश्चित होती है।


सुप्रीम कोर्ट: इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए सर्टिफिकेट की अनिवार्यता वैध, BSA की धारा 63(4) को चुनौती खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam-BSA) की धारा 63(4) और उससे जुड़े अनुसूची (Schedule) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निर्धारित प्रमाणपत्र (Certificate) की अनिवार्यता मनमानी या असंवैधानिक नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह प्रावधान आवश्यक है।

याचिका में क्या चुनौती दी गई थी?

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि धारा 63(4) BSA के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ निर्धारित प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अत्यधिक बोझिल और अव्यावहारिक है।

याचिका के अनुसार, अनुसूची के भाग-A में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का हैश वैल्यू (Hash Value) देना अनिवार्य है, जबकि भाग-B में विशेषज्ञ (Expert) द्वारा प्रमाणन (Certification) आवश्यक है। इससे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को अदालत में स्वीकार कराना अनावश्यक रूप से कठिन हो जाता है।

मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का भी दिया गया हवाला

याचिकाकर्ता ने R. v. B. (2024) मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूची के भाग-B पर केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79-A के तहत अधिसूचित Examiner of Electronic Evidence ही हस्ताक्षर कर सकता है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि देश में ऐसे अधिकृत विशेषज्ञों की संख्या बेहद सीमित है, जिससे इस प्रावधान का पालन करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों माना सर्टिफिकेट जरूरी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड में छेड़छाड़, बदलाव और संशोधन की संभावना सामान्य दस्तावेजों की तुलना में कहीं अधिक होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डीपफेक (Deepfake) जैसी तकनीकों के बढ़ते उपयोग ने इन चुनौतियों को और गंभीर बना दिया है।

अदालत ने कहा कि हैश वैल्यू किसी इलेक्ट्रॉनिक डेटा का डिजिटल फिंगरप्रिंट होती है, जो उसकी पहचान और प्रामाणिकता की पुष्टि करने का विश्वसनीय माध्यम है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भाग-B में विशेषज्ञ द्वारा दिया जाने वाला प्रमाणपत्र इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की एक अतिरिक्त सुरक्षा परत (Additional Layer of Authenticity) प्रदान करता है।

इसी आधार पर अदालत ने माना कि धारा 63(4) का कानून के उद्देश्य से स्पष्ट और तार्किक संबंध है तथा इसे मनमाना या अनुचित नहीं कहा जा सकता।

क्या केवल 79-A के विशेषज्ञ ही प्रमाणपत्र दे सकते हैं?

इस प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला देने से फिलहाल परहेज किया।

अदालत ने BSA की धारा 39 का विश्लेषण करते हुए कहा कि धारा 39(1) ऐसे व्यक्तियों की विशेषज्ञ राय को मान्यता देती है, जिन्हें विज्ञान, कला, कंप्यूटर विज्ञान या साइबर फॉरेंसिक जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान और अनुभव प्राप्त हो।

कोर्ट ने कहा कि यदि अदालत विश्वसनीय सामग्री के आधार पर संतुष्ट हो जाए कि किसी व्यक्ति के पास कंप्यूटर विज्ञान और साइबर फॉरेंसिक का पर्याप्त विशेषज्ञ ज्ञान है, तो वह भी विशेषज्ञ के रूप में माना जा सकता है और अनुसूची के भाग-B पर हस्ताक्षर कर सकता है।

हालांकि, चूंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी नहीं किया और याचिका स्वीकार नहीं की, इसलिए इस मुद्दे पर अंतिम और निर्णायक फैसला देने से इनकार कर दिया।

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मद्रास हाईकोर्ट का फैसला बाध्यकारी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि R. v. B. मामले में मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी कि भाग-B केवल धारा 79-A के अधिसूचित विशेषज्ञ द्वारा ही भरा जा सकता है, बाध्यकारी नज़ीर (Binding Precedent) नहीं मानी जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि इस कानूनी प्रश्न पर उचित मामले में भविष्य में विस्तार से विचार किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए—

  • BSA की धारा 63(4) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी।
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ प्रमाणपत्र की अनिवार्यता को उचित और वैध माना।
  • मद्रास हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को बाध्यकारी नज़ीर मानने से इनकार किया, जिसमें केवल धारा 79-A के अधिसूचित विशेषज्ञ द्वारा प्रमाणन की बात कही गई थी।
  • भाग-B पर विशेषज्ञ प्रमाणन के दायरे से जुड़े कानूनी प्रश्न को भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में तय करने के लिए खुला छोड़ा।

मामला: Pune Bar Association v. Union of India, रिट याचिका (सिविल) संख्या 599/2026, निर्णय दिनांक 22 मई 2026

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