केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विदेशी वकील भारत में एडवोकेट कमिश्नर के सामने गवाहों की जिरह नहीं कर सकते

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केरल हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालतों के मामलों में भी भारत में नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर के समक्ष विदेशी वकील गवाहों की जिरह या परीक्षा नहीं कर सकते। हालांकि, उन्हें कार्यवाही में उपस्थित रहकर केवल अवलोकन और भागीदारी की अनुमति दी जा सकती है।


मामले की पृष्ठभूमि

केरल हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि विदेशी अदालत में लंबित मुकदमे के लिए भारत में नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर के समक्ष विदेशी वकीलों को गवाहों की मुख्य परीक्षा (Examination-in-Chief) या जिरह (Cross-Examination) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसा करना एडवोकेट्स एक्ट, 1961, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (विदेशी वकील) नियम, 2022 तथा भारतीय कानून के तहत लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (Letter of Request) के निष्पादन की प्रक्रिया के विपरीत होगा।

हालांकि, अदालत ने विदेशी वकीलों को कार्यवाही में उपस्थित रहने, उसे देखने तथा सीमित रूप से भाग लेने की अनुमति दी, लेकिन यह निर्देश दिया कि गवाहों की परीक्षा और जिरह केवल भारतीय अधिवक्ता ही करेंगे।


क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित एक निजी कंपनी है, जो अमेरिका में रियल एस्टेट निवेशकों और डेवलपर्स के लिए कस्टमाइज्ड लेंडिंग समाधान उपलब्ध कराती है। प्रतिवादी भारत का नागरिक है और निजी आईटी कंसल्टिंग का कार्य करता है।

कंपनी ने न्यूयॉर्क के यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रतिवादी के विरुद्ध धोखाधड़ी, अनुबंध उल्लंघन, न्यासी दायित्व (Fiduciary Duty) के उल्लंघन और अनुचित लाभ (Unjust Enrichment) के आरोपों के आधार पर धन वसूली का मुकदमा दायर किया।


हेग कन्वेंशन के तहत भारत से मांगी गई न्यायिक सहायता

अमेरिकी अदालत ने हेग कन्वेंशन ऑन द टेकिंग ऑफ एविडेंस एब्रॉड इन सिविल ऑर कमर्शियल मैटर्स के अनुच्छेद 3 के तहत भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय को एक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट भेजा। इसमें प्रतिवादी से संबंधित दस्तावेज, संचार, चालान, भुगतान रसीदें और मौखिक साक्ष्य एकत्र करने के लिए न्यायिक सहायता मांगी गई।

इसके आधार पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 26 नियम 20(ए) के अंतर्गत केरल हाईकोर्ट में कार्यवाही शुरू हुई और अदालत ने एक एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर साक्ष्य रिकॉर्ड करने का निर्देश दिया।


विदेशी वकीलों की मांग

अमेरिकी मुकदमे में प्रतिवादी पक्ष ने अदालत से अनुरोध किया कि उनके अमेरिकी वकीलों को भारत में एडवोकेट कमिश्नर के समक्ष गवाहों की परीक्षा और जिरह करने की अनुमति दी जाए।

याचिकाकर्ता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि हेग कन्वेंशन के अनुच्छेद 9 के अनुसार लेटर ऑफ रिक्वेस्ट का निष्पादन उसी देश के कानून के अनुसार होगा जहां साक्ष्य दर्ज किए जा रहे हैं। भारत में विदेशी वकीलों को मुकदमेबाजी संबंधी कार्य करने की अनुमति नहीं है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 32 के तहत अदालत विशेष परिस्थितियों में विदेशी वकीलों को अनुमति दे सकती है। उनका कहना था कि यह कार्यवाही केवल साक्ष्य संग्रह की प्रक्रिया है, न कि नियमित सिविल ट्रायल।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायालय ने कहा कि हेग कन्वेंशन के अनुच्छेद 9 के अनुसार विदेशी अदालत द्वारा मांगी गई विशेष प्रक्रिया तभी अपनाई जा सकती है जब वह भारत के कानून से असंगत न हो।

अदालत ने यह भी कहा कि अमेरिकी अदालत के लेटर ऑफ रिक्वेस्ट में स्वयं यह उल्लेख था कि अमेरिकी संघीय सिविल प्रक्रिया नियम (Federal Rules of Civil Procedure) केवल उसी सीमा तक लागू होंगे, जहां वे भारतीय कानून से मेल खाते हों।

इसलिए भारत में साक्ष्य रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया भारतीय कानून के अनुसार ही होगी।


एडवोकेट्स एक्ट और बीसीआई नियमों का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धाराओं 29 और 33 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में केवल नामांकित अधिवक्ता ही न्यायालयों या अन्य प्राधिकरणों के समक्ष विधि व्यवसाय (Practice of Law) कर सकते हैं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Bar Council of India v. A.K. Balaji (2018) 5 SCC 379 का हवाला देते हुए कहा कि विदेशी वकील भारत में न तो मुकदमेबाजी और न ही गैर-मुकदमेबाजी संबंधी विधिक कार्य कर सकते हैं, जब तक वे भारतीय कानून के नियामक ढांचे का पालन न करें।

‘फ्लाई-इन, फ्लाई-आउट’ (Fly-in Fly-out) व्यवस्था केवल सीमित और अस्थायी कानूनी सलाह देने तक सीमित है। इससे भारत में विधि व्यवसाय करने का अधिकार नहीं मिल जाता।


क्या एडवोकेट कमिश्नर के समक्ष जिरह करना ‘प्रैक्टिस ऑफ लॉ’ है?

अदालत ने कहा कि एडवोकेट कमिश्नर न्यायालय की “आंख और कान” (Eyes and Ears of the Court) तथा उसका विस्तारित अंग (Extended Arm) होता है।

कमिश्नर द्वारा दर्ज किया गया साक्ष्य न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है और उसकी रिपोर्ट अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त होती है। इसलिए कमिश्नर के समक्ष गवाहों की परीक्षा और जिरह करना भी भारत में विधि व्यवसाय (Practice of Law) का हिस्सा है।

इस कारण विदेशी वकीलों को ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।


धारा 32 के तहत भी नहीं मिली राहत

अदालत ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 32 केवल विशेष परिस्थितियों में किसी गैर-अधिवक्ता को अदालत में उपस्थित होने की विवेकाधीन अनुमति देती है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Harishankar Rastogi v. Girdhari Sharma (1978) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान किसी भी व्यक्ति को अदालत में पेश होने का सामान्य अधिकार नहीं देता।

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वर्तमान मामले में ऐसी कोई विशेष परिस्थिति नहीं थी, जिससे विदेशी वकीलों को यह अनुमति दी जा सके। अदालत ने कहा कि ऐसी अनुमति देना उस कार्य को अप्रत्यक्ष रूप से वैध ठहराना होगा, जिसे प्रत्यक्ष रूप से कानून प्रतिबंधित करता है।


अन्य हाईकोर्टों का भी यही दृष्टिकोण

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि बॉम्बे, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक हाईकोर्ट भी पहले ऐसे मामलों में यही रुख अपना चुके हैं। इन अदालतों ने विदेशी वकीलों को केवल कार्यवाही में उपस्थित रहने और उसका अवलोकन करने की अनुमति दी थी, जबकि गवाहों की परीक्षा और जिरह भारतीय अधिवक्ताओं द्वारा कराई गई थी।


हाईकोर्ट का फैसला

अदालत ने विदेशी वकीलों को एडवोकेट कमिश्नर के समक्ष गवाहों की मुख्य परीक्षा या जिरह करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

हालांकि, विदेशी वकीलों और उनके प्रतिनिधियों को कार्यवाही में उपस्थित रहने, उसे देखने और सीमित रूप से भाग लेने की अनुमति दी गई।

साथ ही यह स्पष्ट निर्देश दिया गया कि गवाहों की परीक्षा और जिरह केवल संबंधित पक्षों की ओर से उपस्थित भारतीय अधिवक्ता ही करेंगे।


निर्णय का महत्व

यह फैसला स्पष्ट करता है कि विदेशी अदालतों के लिए भारत में साक्ष्य रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया भी भारतीय कानून के अधीन होगी। साथ ही, विदेशी वकील भारत में किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में गवाहों की परीक्षा या जिरह नहीं कर सकते, भले ही मामला विदेशी अदालत में लंबित क्यों न हो।

मामला: Sharestates, Inc. v. Prasad Choorakuzhiyil Gopalan, IA No. 1 of 2026 in MJC No. 82 of 2026, निर्णय दिनांक 13 जुलाई 2026।


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