छिपी हुई ऑडियो रिकॉर्डिंग भी कोर्ट में सबूत हो सकती है, निजता का अधिकार पूर्ण नहीं: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि बिना जानकारी के रिकॉर्ड की गई बातचीत केवल निजता के आधार पर अदालत में अस्वीकार्य नहीं हो जाती। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता उसकी प्रासंगिकता, प्रामाणिकता और कानूनी आवश्यकताओं के आधार पर तय होगी।


छिपी हुई ऑडियो रिकॉर्डिंग को केवल निजता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला निजता (Privacy) का अधिकार अपने आप किसी गुप्त रूप से रिकॉर्ड की गई बातचीत को अदालत में सबूत के रूप में पेश करने से नहीं रोकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी बातचीत को दूसरे पक्ष की जानकारी या सहमति के बिना रिकॉर्ड किया गया है, तो केवल इसी आधार पर उसे न्यायिक कार्यवाही में अस्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ भूमि बिक्री समझौते से जुड़े एक दीवानी विवाद की सुनवाई कर रही थी।


क्या था मामला?

याचिकाकर्ता मनीत सिंह वाधवा ने एक भूमि बिक्री समझौते के विशिष्ट पालन (Specific Performance) और बाद में अन्य खरीदारों के पक्ष में निष्पादित बिक्री विलेखों को अपने विरुद्ध प्रभावहीन घोषित करने की मांग करते हुए दीवानी वाद दायर किया था।

मुकदमे के दौरान उन्होंने अपने पक्ष के समर्थन में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग, उसकी ट्रांसक्रिप्ट और फोरेंसिक विश्लेषण रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति मांगी। उनका कहना था कि यह रिकॉर्डिंग उनके भाई और प्रतिवादी के बीच हुई फोन बातचीत की है, जिससे भूमि बिक्री समझौते और भुगतान से जुड़े तथ्यों की पुष्टि होती है।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने निजता के अधिकार का हवाला देते हुए इन दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया था। इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन यह ऐसा पूर्ण अधिकार नहीं है जिसके आधार पर हर निजी रिकॉर्डिंग को स्वतः अस्वीकार्य घोषित कर दिया जाए।

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अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता का परीक्षण निम्न आधारों पर किया जाना चाहिए—

  • क्या वह विवादित मुद्दे से संबंधित (Relevant) है?
  • क्या उसकी प्रामाणिकता (Authenticity) स्थापित की जा सकती है?
  • क्या उसे कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तुत किया गया है?

सिर्फ इसलिए कि बातचीत बिना दूसरे पक्ष की जानकारी या सहमति के रिकॉर्ड की गई, उसे अदालत में सबूत के रूप में स्वीकार करने से इनकार नहीं किया जा सकता।


ट्रायल कोर्ट की सोच को बताया गलत

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल निजता के अधिकार का हवाला देकर ऑडियो रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि (Jurisdictional Error) की है।

अदालत ने कहा कि यह प्रश्न कि—

  • रिकॉर्डिंग में आवाज वास्तव में किसकी है,
  • रिकॉर्डिंग से कोई छेड़छाड़ हुई है या नहीं,
  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से जुड़ी वैधानिक शर्तों का पालन किया गया है या नहीं,

इन सभी पहलुओं की जांच मुकदमे के दौरान साक्ष्य प्रस्तुत होने के बाद की जाएगी। प्रारंभिक स्तर पर इन मुद्दों का फैसला नहीं किया जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया।

अदालत ने R.M. Malkani बनाम महाराष्ट्र राज्य (1973) तथा Pooranmal बनाम Director of Inspection (1974) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई साक्ष्य प्रासंगिक है तो केवल इस आधार पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह किस तरीके से प्राप्त किया गया, जब तक कि कानून में उसके विरुद्ध कोई स्पष्ट निषेध न हो।

इसके अलावा के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) के संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute) नहीं है और उस पर संविधान सम्मत सीमाएं लागू हो सकती हैं।

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अदालत ने Arjun Panditrao Khotkar बनाम Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता और प्रमाणिकता के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया पर जोर दिया गया था।


हाई कोर्ट का फैसला

हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए रायगढ़ के पंचम जिला न्यायाधीश द्वारा 27 मार्च को पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि ऑडियो रिकॉर्डिंग, उसकी ट्रांसक्रिप्ट और फोरेंसिक रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया जाए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इन दस्तावेजों की स्वीकार्यता, प्रमाणिकता या साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।

इन सभी प्रश्नों का निर्णय ट्रायल कोर्ट मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों के साक्ष्य और आपत्तियों पर विचार करने के बाद कानून के अनुसार करेगा।


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