POCSO पीड़िता को मेडिकल रिपोर्ट न होने पर मुआवजे से वंचित नहीं कर सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट; 10 दिन में ₹3 लाख देने का आदेश

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मेडिकल जांच से इनकार करने के अधिकार पर क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO पीड़िता को चोट की मेडिकल रिपोर्ट न होने के आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संबंधित शर्त रद्द कर नाबालिग पीड़िता को 10 दिन में ₹3 लाख देने का निर्देश दिया।

प्रयागराज | कानूनी समाचार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ितों के अधिकारों और पुनर्वास को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी पीड़िता को आर्थिक सहायता देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह प्रवेशात्मक यौन हमले (Penetrative Sexual Assault) को दर्शाने वाली चोट की मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर पाई।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली, 2015 के तहत आर्थिक सहायता के लिए चोट की रिपोर्ट को अनिवार्य बनाने वाली शर्त को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता नाबालिग पीड़िता को 10 दिनों के भीतर ₹3 लाख की आर्थिक सहायता जारी करने का निर्देश भी दिया।

मेडिकल रिपोर्ट न होना मुआवजे से इनकार का आधार नहीं

अदालत ने कहा कि यदि चोट की मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध है, तो संबंधित प्राधिकारी उस पर विचार कर सकता है। लेकिन रिपोर्ट का उपलब्ध न होना आर्थिक सहायता पाने में पूर्ण बाधा नहीं बन सकता।

खंडपीठ के अनुसार, चोट की रिपोर्ट को कल्याणकारी योजना के तहत शुरुआती आर्थिक सहायता देने की अनिवार्य शर्त बनाना उचित नहीं है, विशेषकर तब जब प्राथमिकी में अपराध का खुलासा हो और जांच के बाद संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका हो।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राथमिकी, आरोपपत्र और चोट की रिपोर्ट—इनमें से कोई भी दस्तावेज अपने आप में अपराध के घटित होने का अंतिम न्यायिक निर्धारण नहीं है। आपराधिक मुकदमे का फैसला समस्त साक्ष्यों के मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।

क्या है पूरा मामला?

हाईकोर्ट एक नाबालिग पीड़िता की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसे उसकी मां के माध्यम से दाखिल किया गया था। याचिका के अनुसार, वर्ष 2024 में कथित अपराध के समय पीड़िता आठ वर्ष की थी।

मामले में आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता के निजी अंग में उंगली डालने और उसके मुंह में अपना लिंग डालने जैसे कृत्य किए। प्राथमिकी दर्ज होने के समय पीड़िता ने कथित तौर पर प्रवेशात्मक यौन हमले से संबंधित मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं दी थी।

बाद में पुलिस ने एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया और मामले में आरोपपत्र दाखिल हुआ। मुकदमे का ट्रायल अभी लंबित बताया गया। इस बीच, पीड़िता ने राज्य की आर्थिक सहायता योजना के तहत मुआवजे के लिए आवेदन किया, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत न कर पाने के आधार पर उसका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया।

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इसके बाद पीड़िता ने हाईकोर्ट का रुख किया और दलील दी कि केवल मेडिकल रिकॉर्ड में चोट दर्ज न होने के कारण आर्थिक सहायता से वंचित करना उचित नहीं है।

राज्य सरकार ने क्या दलील दी?

राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती फैसले में दिखाई देने वाली शारीरिक चोट की अनिवार्यता पर विचार किया गया था, लेकिन चोट की रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आवश्यकता को समाप्त नहीं किया गया था।

अदालत ने इस दलील पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि चोट की रिपोर्ट की उपयोगिता और उसे सहायता पाने की अनिवार्य शर्त बनाने के बीच अंतर है। रिपोर्ट उपलब्ध होने पर उस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति के कारण किसी पात्र पीड़िता को योजना के लाभ से पूरी तरह बाहर नहीं किया जा सकता।

POCSO Act की धारा 3 में प्रवेशात्मक यौन हमले का दायरा

खंडपीठ ने POCSO Act की धारा 3 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रवेशात्मक यौन हमला केवल उन्हीं कृत्यों तक सीमित नहीं है जिनमें अनिवार्य रूप से दिखाई देने वाली शारीरिक चोट हो।

कानून के तहत अपराध की परिभाषा में प्रवेश की विभिन्न परिस्थितियां और कुछ विशिष्ट मौखिक कृत्य भी शामिल हैं। इसलिए, किसी आरोप की कानूनी प्रकृति का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि मेडिकल जांच में चोट दिखाई दी या नहीं।

अदालत ने माना कि मेडिकल साक्ष्य आरोपों के समर्थन में उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रवेशात्मक यौन हमले की पहचान का एकमात्र साधन नहीं बनाया जा सकता। किसी रिपोर्ट में चोट का उल्लेख न होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोपित अपराध नहीं हुआ।

मेडिकल जांच से इनकार करने के अधिकार पर क्या कहा?

अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) का हवाला देते हुए मेडिकल जांच के लिए सहमति से इनकार करने के कानूनी पहलू पर भी विचार किया।

खंडपीठ के अनुसार, यदि कानून पीड़िता को जांच के लिए सहमति देने से इनकार करने का अधिकार देता है, तो उसी इनकार को कल्याणकारी योजना के तहत आर्थिक सहायता से वंचित करने का पर्याप्त आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि ऐसी शर्त पीड़िता को अनुचित दुविधा में डालती है—या तो वह ऐसी जांच के लिए सहमति दे, जिसे कराने के लिए वह तैयार नहीं है, या फिर पुनर्वास के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता खोने का जोखिम उठाए।

अदालत के विचार में, कल्याणकारी योजना को इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि वह अप्रत्यक्ष रूप से किसी पीड़िता को ऐसा कदम उठाने के लिए विवश करे, जिसके संबंध में कानून उसे सहमति से इनकार करने की अनुमति देता है।

चोट की रिपोर्ट की शर्त अनुच्छेद 14 के विरुद्ध

हाईकोर्ट ने चोट की रिपोर्ट को अनिवार्य बनाने वाली शर्त को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के संदर्भ में भी परखा।

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अदालत ने कहा कि यह शर्त एक ही प्रकार के अपराध की पीड़िताओं को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांट देती है—एक वे जिनकी चोट की रिपोर्ट उपलब्ध है और दूसरी वे जिनकी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।

दूसरी श्रेणी में ऐसी पीड़िताएं भी आ सकती हैं जिन्होंने मेडिकल जांच के लिए सहमति नहीं दी, जिनकी जांच शारीरिक लक्षण समाप्त होने के बाद हुई, या जिनके साथ कथित कृत्य में सामान्यतः दिखाई देने वाली चोट होने की संभावना नहीं होती।

अदालत के अनुसार, केवल इस अंतर के आधार पर आर्थिक सहायता से वंचित करना समानता और कल्याणकारी योजना के उद्देश्य से संबंधित गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

राज्य पात्रता की जांच कर सकता है, लेकिन सहायता में अनुचित बाधा नहीं डाल सकता

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि राज्य सरकार को पात्र लाभार्थियों की पहचान करने, दावों की जांच करने और सार्वजनिक धन के उचित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार है।

हालांकि, ऐसी प्रक्रिया को इस हद तक कठोर नहीं बनाया जा सकता कि उसके कारण वास्तव में पात्र पीड़िताएं योजना के लाभ से बाहर हो जाएं। अदालत ने चोट की रिपोर्ट को अनिवार्य शर्त बनाने वाले प्रावधान को इसी दृष्टि से अनुचित माना।

10 दिन में ₹3 लाख देने का निर्देश

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने संबंधित दस्तावेजी शर्त को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता नाबालिग पीड़िता को 10 दिनों के भीतर ₹3 लाख की आर्थिक सहायता जारी करे।

कानूनी महत्व: यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि यौन अपराधों की पीड़िताओं के पुनर्वास के लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं में मेडिकल रिपोर्ट को ऐसा निर्णायक मानदंड नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसकी अनुपस्थिति मात्र से आर्थिक सहायता का अधिकार समाप्त हो जाए। साथ ही, आर्थिक सहायता के लिए पात्रता का निर्धारण और आपराधिक मुकदमे में आरोपों का अंतिम निर्णय अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।

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