जस्टिस संजय किशन कौल का संस्मरण: CJI चंद्रचूड़ के सरकार से रिश्तों पर उठाए सवाल, कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर भी जताई चिंता

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छठे नाम को लेकर कॉलेजियम में मतभेद

जस्टिस संजय किशन कौल ने अपने संस्मरण Without Fear of Favour में न्यायाधीशों की नियुक्ति, कॉलेजियम और केंद्र सरकार के प्रभाव पर अपने अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ के साथ मतभेदों और न्यायिक स्वतंत्रता की चुनौतियों का भी उल्लेख किया।

नई दिल्ली | न्यायपालिका विशेष

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने अपने संस्मरण Without Fear of Favour में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था और केंद्र सरकार के साथ न्यायपालिका के संबंधों को लेकर कई महत्वपूर्ण अनुभव साझा किए हैं। पुस्तक में उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के साथ नियुक्तियों के मुद्दे पर हुए मतभेदों, सरकार की भूमिका और कॉलेजियम की संस्थागत कमजोरियों का उल्लेख किया है।

द इंडियन एक्सप्रेस की ओर से समीक्षा की गई पुस्तक की प्रकाशन-पूर्व पांडुलिपि के मुताबिक, जस्टिस कौल का मानना है कि न्यायपालिका को सरकार के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा की रक्षा करनी चाहिए। उनके अनुसार, सरकार के साथ व्यवहार में दृढ़ता महत्वपूर्ण है, लेकिन अदालत को राजनीतिक विरोधियों की ओर से लड़ने वाला मंच भी नहीं बनना चाहिए।

पुस्तक में वर्णित घटनाएं जस्टिस कौल के व्यक्तिगत अनुभव और आकलन हैं। इनमें से कुछ टिप्पणियों पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पुस्तक पढ़ने के बाद ही वह विस्तार से टिप्पणी कर सकेंगे।

सरकार के साथ संबंधों पर चंद्रचूड़ और कौल के विचारों में अंतर

जस्टिस कौल के अनुसार, जून 2022 में कॉलेजियम का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सुझाव दिया था कि वह और तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ सरकार के साथ बातचीत में एक समन्वित रणनीति अपनाएं। उनके विचार में, दोनों न्यायाधीश अलग-अलग भूमिकाएं निभाकर सरकार के समक्ष कॉलेजियम की संस्थागत स्थिति अधिक प्रभावी ढंग से रख सकते थे।

कौल ने इसे ‘गुड कॉप-बैड कॉप’ रणनीति की तरह बताया। उनके अनुसार, वह स्वयं अपेक्षाकृत सख्त रुख अपनाने के लिए तैयार थे, जबकि मुख्य न्यायाधीश बातचीत का दूसरा पक्ष संभाल सकते थे।

हालांकि, कौल का कहना है कि कुछ अपवादों को छोड़कर, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सरकार के साथ संबंधों को अपने तरीके से संभालना पसंद करते थे।

जस्टिस कौल ने अपने अनुभव के आधार पर लिखा कि सरकार उन न्यायाधीशों का अधिक सम्मान करती है, जो अपने संस्थागत दायित्वों पर दृढ़ रहते हैं और दबाव में आए बिना अपना पक्ष रखते हैं।

कॉलेजियम की बैठक से पहले सरकार की मंजूरी लेने पर आपत्ति

पुस्तक में जस्टिस कौल ने सरकार से परामर्श और कॉलेजियम की औपचारिक प्रक्रिया से पहले उसकी मंजूरी लेने के बीच अंतर पर जोर दिया है।

उनके अनुसार, यदि कॉलेजियम किसी नाम पर औपचारिक विचार-विमर्श करने से पहले ही सरकार की सहमति तलाशने लगे, तो इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति की स्वतंत्र प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

कौल का तर्क है कि राजनीतिक सत्ता स्वाभाविक रूप से अपने प्रभाव का विस्तार करने की कोशिश करती है। इसलिए कॉलेजियम को ऐसी प्रक्रिया से बचना चाहिए, जिससे नियुक्तियों में सरकार की भूमिका औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया से आगे बढ़ती दिखाई दे।

यह टिप्पणी न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकारों के संतुलन से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा है।

छठे नाम को लेकर कॉलेजियम में मतभेद का दावा

जस्टिस कौल ने पुस्तक में कॉलेजियम की उस बैठक का भी वर्णन किया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में छह रिक्त पदों को भरने के लिए नामों पर विचार किया जा रहा था।

उनके मुताबिक, पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। बैठक के दिन तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ ने छठे नाम का प्रस्ताव रखा, जिसका अन्य सदस्यों ने विरोध किया।

कौल लिखते हैं कि उन्हें संदेह हुआ कि यह नाम सरकार के सुझाव पर सामने आया था। उनके अनुसार, चंद्रचूड़ ने उनसे अलग बातचीत में विचार किया कि क्या सरकार का रुख जानने के लिए फोन किया जाना चाहिए।

कौल ने कथित तौर पर इस विचार का विरोध करते हुए कहा कि कॉलेजियम की बैठक के दौरान इस तरह सरकार से संपर्क करना उचित नहीं होगा। अंततः पांच नामों को मंजूरी मिली, जबकि छठे नाम पर सहमति नहीं बन सकी।

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यह विवरण जस्टिस कौल के संस्मरण में प्रस्तुत उनका पक्ष है। संबंधित बैठक का पूरा आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध हुए बिना इस घटनाक्रम को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

अल्पसंख्यक समुदाय के उम्मीदवार को लेकर कथित पूछताछ

पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा अल्पसंख्यक धर्म से जुड़े एक न्यायिक उम्मीदवार की नियुक्ति से संबंधित है।

जस्टिस कौल के अनुसार, सरकार की ओर से न्यायपालिका में धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाए गए। इसके बाद उम्मीदवार के परिवार की जाति को लेकर भी पूछताछ हुई, जिसे कौल ने अप्रासंगिक और असामान्य बताया।

उनके संस्मरण के मुताबिक, इस मुद्दे पर तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ द्वारा सरकार का पक्ष साझा किए जाने के बाद वह नाराज हो गए। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि यदि नियुक्तियां इसी तरह की पूछताछ के आधार पर होनी हैं, तो कॉलेजियम व्यवस्था के उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा होता है।

कौल लिखते हैं कि उन्होंने फाइल बंद कर दी और बैठक से बाहर चले गए। उनके अनुसार, कुछ समय तक कॉलेजियम की बैठक नहीं हुई और बाद में सरकार ने उम्मीदवार की नियुक्ति को मंजूरी दे दी।

यह घटना, यदि संस्मरण में वर्णित रूप में हुई, तो नियुक्तियों में सामाजिक पृष्ठभूमि, प्रतिनिधित्व और संस्थागत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर गंभीर प्रश्न उठाती है। हालांकि, उम्मीदवार की पहचान और बातचीत के कुछ विवरण पुस्तक में सार्वजनिक न किए जाने की बात भी लेख में सामने आई है।

CJI चंद्रचूड़ ने क्या जवाब दिया?

इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि उन्होंने अभी जस्टिस कौल की पुस्तक नहीं पढ़ी है। इसलिए वह उसके संदर्भ और सामग्री को समझे बिना विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते।

चंद्रचूड़ ने कहा कि उनके और जस्टिस कौल के बीच कॉलेजियम में सम्मानजनक संबंध रहे और बैठकों में तर्कपूर्ण विचार-विमर्श होता था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ऐसा कोई अवसर याद नहीं है, जब जस्टिस कौल कॉलेजियम की बैठक से उठकर बाहर चले गए हों।

पूर्व CJI ने कॉलेजियम की बैठकों के बाद प्रस्ताव पारित करने की अपनी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें किसी प्रस्ताव में सदस्य की असहमति दर्ज होने की याद नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में संवाद करती है और अंततः नियुक्ति संबंधी वारंट पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते हैं।

इस प्रकार, पुस्तक में प्रस्तुत जस्टिस कौल के विवरण और जस्टिस चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया के बीच कुछ घटनाओं की स्मृति और उनके अर्थ को लेकर अंतर दिखाई देता है।

NJAC और कॉलेजियम व्यवस्था पर कौल की राय

जस्टिस कौल ने 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने के फैसले पर भी अपनी राय व्यक्त की है।

NJAC का उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव लाना था, जिसमें कार्यपालिका की भूमिका भी शामिल थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराते हुए कॉलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा था।

कौल लिखते हैं कि उनकी व्यक्तिगत राय में NJAC व्यवस्था को तुरंत समाप्त करने के बजाय उसे काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए था।

हालांकि, उन्होंने कॉलेजियम की कार्यप्रणाली की भी आलोचना की। उनके अनुसार, पारदर्शिता का अभाव, निर्णय लेने की शक्ति का केंद्रीकरण और अनौपचारिक दबावों के प्रति संवेदनशीलता इस व्यवस्था की प्रमुख कमजोरियां हैं।

उनका मानना है कि कॉलेजियम को राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त मान लेना वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा होगा। चुनौती यह है कि सरकार के साथ संवाद के बावजूद नियुक्तियों की प्रक्रिया में न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

राफेल मामले पर कौल की टिप्पणी: अदालत विपक्ष का मंच नहीं

संस्मरण में जस्टिस कौल ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे से जुड़ी याचिकाओं का भी उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि उनकी पीठ ने सौदे को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

उनके अनुसार, सरकार का विरोध करने वाले समूह कभी-कभी अदालत से अपेक्षा करते हैं कि वह उनके राजनीतिक संघर्ष में हस्तक्षेप करे। लेकिन अदालत का काम किसी सरकार के विरोधियों की ओर से लड़ना नहीं है।

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कौल का तर्क है कि न्यायालय को सरकार के निर्णयों की संवैधानिक और कानूनी समीक्षा अवश्य करनी चाहिए, लेकिन उसे राजनीतिक विपक्ष का विकल्प नहीं बनना चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायिक समीक्षा और राजनीतिक विरोध के बीच अंतर को रेखांकित करती है।

PMLA मामले को दूसरी पीठ के सामने भेजे जाने पर सवाल

जस्टिस कौल ने धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) से जुड़े एक मामले का भी उल्लेख किया है। उनके मुताबिक, उनकी अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस प्रश्न को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था कि क्या कानून से संबंधित पहले के फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार की जरूरत है।

कौल का दावा है कि बाद में उन्हें सूचित किए बिना मामला दूसरी पीठ के सामने चला गया। उन्होंने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी मामले को इस आशंका के आधार पर एक पीठ से दूसरी पीठ में नहीं भेजा जाना चाहिए कि पहली पीठ संभावित रूप से क्या फैसला दे सकती है।

उनके अनुसार, पीठ के पुनर्गठन के बाद उनके सेवानिवृत्त होने से पहले मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।

यह भी संस्मरण में दर्ज उनका व्यक्तिगत विवरण है। मामले के स्थानांतरण का कारण और प्रक्रिया समझने के लिए संबंधित न्यायिक आदेशों तथा प्रशासनिक रिकॉर्ड का परीक्षण जरूरी होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन में देरी का उल्लेख

जस्टिस कौल ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नामित किए जाने की प्रक्रिया में देरी का भी जिक्र किया है।

उनके मुताबिक, उन्हें बाद में जानकारी मिली कि कुछ लोगों ने तत्कालीन CJI चंद्रचूड़ को प्रक्रिया आगे बढ़ाने में देरी करने की सलाह दी थी, ताकि कौल की सेवानिवृत्ति के बाद यह काम पूरा हो।

कौल ने लिखा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन की प्रक्रिया जनवरी 2024 में पूरी हुई, जो उनकी दिसंबर 2023 की सेवानिवृत्ति के बाद का समय था। हालांकि, उन्होंने इस कथित सलाह को पुष्ट तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया; उन्होंने स्वयं इसकी सत्यता को लेकर अनिश्चितता व्यक्त की।

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन का सवाल

जस्टिस कौल का संस्मरण न्यायाधीशों की नियुक्तियों के विवाद से आगे बढ़कर न्यायपालिका की संस्थागत भूमिका पर भी सवाल उठाता है।

उनके अनुसार, अदालत को सरकार के निर्णयों की समीक्षा करने में स्वतंत्र और दृढ़ रहना चाहिए, लेकिन उसे राजनीतिक विरोध का औजार नहीं बनना चाहिए। दूसरी ओर, नियुक्तियों की प्रक्रिया में सरकार की अनौपचारिक भूमिका बढ़ने से न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

यह बहस भारत की संवैधानिक व्यवस्था में शक्तियों के पृथक्करण, जवाबदेही और नियंत्रण-संतुलन के सिद्धांतों से जुड़ी है। कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना और उसका बचाव—दोनों में मूल प्रश्न यही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति ऐसी कैसे हो, जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़े, लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर न पड़े।

निष्कर्ष

जस्टिस संजय किशन कौल का संस्मरण कॉलेजियम व्यवस्था के भीतर के अनुभवों और न्यायपालिका-कार्यपालिका संबंधों पर एक वरिष्ठ पूर्व न्यायाधीश का दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसमें पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ के साथ कथित मतभेदों, नियुक्तियों में सरकारी प्रभाव और कॉलेजियम की सीमाओं पर चर्चा है।

हालांकि, पुस्तक में वर्णित घटनाएं लेखक के दृष्टिकोण पर आधारित हैं और कुछ बिंदुओं पर चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। इसलिए इन दावों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में लेने के बजाय संस्थागत बहस के एक महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में देखना उचित होगा।

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