इलाहाबाद हाईकोर्ट: केवल शिकायतकर्ता का SC-ST वर्ग से होना पर्याप्त नहीं, जाति के आधार पर अपमान का स्पष्ट आरोप जरूरी

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SC-ST एक्ट लागू करने के लिए केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या जनजाति से होना पर्याप्त नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि SC-ST एक्ट लागू करने के लिए केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या जनजाति से होना पर्याप्त नहीं है। जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित करने का स्पष्ट आरोप जरूरी है। मारपीट का केस जारी रहेगा।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 यानी SC-ST एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना इस कानून को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपों से यह भी सामने आना चाहिए कि आरोपी ने जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित करने या अपमानित करने की नीयत से कोई कृत्य किया।

न्यायमूर्ति संतोष राय ने अमरनाथ चौधरी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने पाया कि एफआईआर में अपीलार्थी द्वारा जातिसूचक अपशब्द कहने या शिकायतकर्ता को उसकी जाति के कारण अपमानित करने का कोई स्पष्ट आरोप नहीं था। इस आधार पर अदालत ने अपीलार्थी को SC-ST एक्ट के अपराध से मुक्त कर दिया, हालांकि मारपीट से संबंधित मामला जारी रखने का निर्देश दिया।

क्या है पूरा मामला?

मामला सिद्धार्थनगर जिले के इटवा थाने में दर्ज एक मुकदमे से संबंधित है। आरोप के अनुसार, अपीलार्थी ने कथित तौर पर फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाया था। शिकायतकर्ता ने इस संबंध में शिकायत की, जिसके बाद आरोप है कि अपीलार्थी ने उसके साथ मारपीट की।

इस मामले में पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद विशेष न्यायाधीश, सिद्धार्थनगर द्वारा पारित संज्ञान और समन आदेश को अमरनाथ चौधरी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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अपीलार्थी की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर में उसके खिलाफ जातिसूचक अपशब्द कहने या जाति के आधार पर अपमानित करने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं है। इसलिए SC-ST एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया पूरे नहीं होते।

जातिगत अपमान का स्पष्ट आरोप होना जरूरी

मामले के तथ्यों और एफआईआर का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में ऐसा कोई स्पष्ट कथन नहीं था, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि अपीलार्थी ने शिकायतकर्ता को उसकी अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंधित होने के कारण अपमानित किया था।

अदालत के अनुसार, SC-ST एक्ट के तहत आरोप तय करने के लिए केवल शिकायतकर्ता की जातिगत पहचान पर्याप्त नहीं है। शिकायत में कथित जातिगत अपमान से जुड़े आवश्यक तथ्यों का उल्लेख होना भी जरूरी है।

इस मामले में एफआईआर पढ़ने से ऐसा नहीं लगा कि अपीलार्थी ने कोई जातिसूचक अपशब्द या ऐसी अपमानजनक भाषा इस्तेमाल की थी, जिससे जाति के आधार पर अपमानित करने का आरोप बनता हो।

SC-ST एक्ट के आरोप से राहत, मारपीट का मामला जारी रहेगा

हाईकोर्ट ने उपलब्ध आरोपों के आधार पर अपीलार्थी को SC-ST एक्ट के तहत अपराध से मुक्त कर दिया। हालांकि, अदालत ने मारपीट के आरोप को समाप्त नहीं किया। इस संबंध में आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी।

इस प्रकार, अदालत ने स्पष्ट किया कि SC-ST एक्ट के तहत अभियोजन के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का आरोपों से सामने आना जरूरी है। साथ ही, किसी एक अपराध के आरोप में राहत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि मामले में लगाए गए अन्य स्वतंत्र आरोप भी स्वतः समाप्त हो जाएंगे।

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फैसले का कानूनी महत्व

यह आदेश इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि SC-ST एक्ट के तहत आपराधिक दायित्व तय करने के लिए शिकायतकर्ता की जातिगत पहचान के साथ-साथ कथित अपराध के कानूनी तत्वों का भी मौजूद होना आवश्यक है।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि जातिसूचक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख हर परिस्थिति में ही निर्णायक कसौटी नहीं होता। लागू प्रावधान, घटना के तथ्य, कथित कृत्य और कानून की अन्य आवश्यक शर्तों का भी परीक्षण किया जाना चाहिए। इसलिए इस फैसले को प्रत्येक SC-ST मामले में लागू होने वाले सार्वभौमिक नियम के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

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