कोडीन कफ सिरप मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लाइसेंसधारकों को राहत दी, NDPS के तहत FIR पर सवाल

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोडीन युक्त कफ सिरप मामलों में बड़ी राहत देते हुए NDPS एक्ट के तहत दर्ज FIRs पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि कोडीन कफ सिरप को स्वतः ‘निर्मित मादक पदार्थ’ नहीं माना जा सकता और 17 दिसंबर को अगली सुनवाई तय की।

कोडीन कफ सिरप मामला: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लाइसेंसधारकों को राहत दी, NDPS के तहत FIR पर सवाल

कोडीन युक्त कफ सिरप को लेकर उत्तर प्रदेश में दर्ज कई आपराधिक मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को लाइसेंसधारक दवा विक्रेताओं और निर्माताओं को महत्वपूर्ण राहत दी। अदालत ने इन मामलों में अगली सुनवाई की तारीख 17 दिसंबर तय करते हुए संकेत दिया कि ऐसे मामलों में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) के प्रावधानों का यांत्रिक रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यह आदेश जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने उस समय पारित किया, जब अदालत विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज FIRs को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी। इन FIRs में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता कोडीन युक्त कफ सिरप का अवैध व्यापार कर रहे थे, जिससे NDPS एक्ट के तहत गंभीर अपराध बनता है।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि जिन दवाओं की बात की जा रही है, वे ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट Drugs & Cosmatic Act के तहत विधिवत लाइसेंस प्राप्त हैं। उनका तर्क था कि केवल इस आधार पर कि कफ सिरप Cough Syrup में कोडीन मौजूद है, उसे स्वतः NDPS एक्ट के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

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वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत का ध्यान NDPS एक्ट की धारा 2(xi) की ओर दिलाया, जिसमें “manufactured drug” यानी “निर्मित मादक पदार्थ” की परिभाषा दी गई है। उन्होंने दलील दी कि कोडीन युक्त कफ सिरप, यदि निर्धारित मात्रा और चिकित्सकीय उपयोग के लिए लाइसेंस के तहत बेचा जा रहा है, तो वह इस परिभाषा में स्वतः शामिल नहीं होता।

NDPS बनाम ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स कानून एक विशेष कानून है, जो दवाओं के निर्माण, भंडारण और बिक्री को नियंत्रित करता है। जब कोई व्यक्ति वैध लाइसेंस के तहत काम कर रहा हो, तो उसके खिलाफ सीधे NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज करना कानून का दुरुपयोग माना जाना चाहिए।

अधिवक्ताओं का कहना था कि पुलिस द्वारा NDPS एक्ट का सहारा लेना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे दवा कारोबार से जुड़े वैध लाइसेंसधारकों को अनावश्यक रूप से आपराधिक मुकदमों में फंसाया जा रहा है।

हाईकोर्ट का रुख

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस चरण पर FIRs को रद्द नहीं किया, लेकिन उसने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देते हुए मामले को गंभीर कानूनी प्रश्नों से जुड़ा बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह जांच आवश्यक है कि क्या संबंधित पदार्थ वास्तव में NDPS एक्ट के तहत “manufactured drug” की श्रेणी में आता है या नहीं।

अदालत ने राज्य सरकार से भी जवाब दाखिल करने का संकेत देते हुए कहा कि इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है, क्योंकि मामला न केवल याचिकाकर्ताओं के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि दवा उद्योग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच संतुलन का भी प्रश्न उठाता है।

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आगे की सुनवाई

खंडपीठ ने सभी याचिकाओं को 17 दिसंबर को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। उस दिन यह तय किया जा सकता है कि कोडीन युक्त कफ सिरप से जुड़े मामलों में NDPS एक्ट के तहत दर्ज FIRs कानूनन टिकाऊ हैं या नहीं।

यह मामला भविष्य में फार्मा इंडस्ट्री, दवा लाइसेंसधारकों और पुलिस कार्रवाई के मानकों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।

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