विवाहेतर संबंध पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति का विवाहेतर संबंध होना अपने आप में IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने साक्ष्यों की कमी के आधार पर पति को बरी करने के फैसले के खिलाफ अपील खारिज कर दी।
मद्रास हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता और विवाहेतर संबंध से जुड़े एक मामले में कहा है कि पति का किसी दूसरी महिला के साथ संबंध होना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी का आचरण कानून में निर्धारित क्रूरता के आवश्यक तत्वों को पूरा करता है।
जस्टिस सुंदर मोहन ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि विवाहेतर संबंध और पत्नी के साथ कानूनी अर्थों में क्रूरता करना दो अलग-अलग प्रश्न हैं। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद हाईकोर्ट ने पति को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2010 में एक महिला और उसके डेढ़ साल के बच्चे की मौत से जुड़ा था। आरोप था कि महिला ने अपने बच्चे के साथ आत्महत्या कर ली थी। घटना के बाद महिला के भाई ने शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि महिला का पति दहेज को लेकर उसे प्रताड़ित करता था और उसका किसी दूसरी महिला के साथ विवाहेतर संबंध भी था। अभियोजन पक्ष ने पति पर पत्नी के साथ क्रूरता करने और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए।
हालांकि, वर्ष 2018 में ट्रायल कोर्ट ने पति को बरी कर दिया। निचली अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग और विवाहेतर संबंध से जुड़े आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया। महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाली क्रूरता के आरोप के समर्थन में भी पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।
इस फैसले से असंतुष्ट महिला के भाई ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की।
विवाहेतर संबंध पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने महिला के भाई की गवाही पर उचित ध्यान नहीं दिया। यह भी कहा गया कि संबंधित महिला को गवाह के रूप में पेश नहीं किए जाने मात्र से विवाहेतर संबंध के आरोप को खारिज नहीं किया जाना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने इस पहलू पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी आरोप की पुष्टि के लिए किसी एक विशेष गवाह की अनुपस्थिति को ही निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। लेकिन विवाहेतर संबंध साबित हो जाने से भी धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध स्वतः साबित नहीं हो जाता।
जस्टिस सुंदर मोहन के अनुसार, अभियोजन पक्ष को ऐसे तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं, जिनसे यह स्थापित हो सके कि आरोपी का आचरण संबंधित कानूनी प्रावधान के तहत दंडनीय क्रूरता की श्रेणी में आता है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि विवाहेतर संबंध के आरोप से आगे बढ़कर क्रूरता के आवश्यक तत्वों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।
दहेज उत्पीड़न के आरोप भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए
हाईकोर्ट ने दहेज की मांग से संबंधित आरोपों की भी जांच की। अदालत के समक्ष ये आरोप स्पष्ट और पर्याप्त रूप से समर्थित नहीं पाए गए। शुरुआती शिकायत में भी दहेज की मांग का उल्लेख नहीं था।
अदालत ने शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और अपील खारिज कर दी।
क्या थी IPC की धारा 498A?
भारतीय दंड संहिता की धारा 498A पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ क्रूरता किए जाने से संबंधित थी। इसके तहत क्रूरता में ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण शामिल था, जिससे महिला को गंभीर मानसिक या शारीरिक नुकसान पहुंचने की आशंका हो, अथवा उसे गैरकानूनी मांग पूरी करने के लिए प्रताड़ित किया जाए।
इस प्रावधान के तहत दोषसिद्धि के लिए अभियोजन पक्ष को अपराध के आवश्यक तत्वों को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है। केवल वैवाहिक विवाद या विवाहेतर संबंध का आरोप अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि IPC की धारा 498A ऐतिहासिक रूप से संबंधित अपराधों पर लागू होती थी। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) में वैवाहिक क्रूरता से संबंधित प्रावधान धारा 85 और 86 में दिए गए हैं। पुराने मामलों में लागू कानून का निर्धारण घटना की तारीख और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।
फैसले का कानूनी महत्व
मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी इस अंतर को रेखांकित करती है कि किसी पति का विवाहेतर संबंध होना और उसका IPC की धारा 498A के तहत दंडनीय क्रूरता करना एक ही बात नहीं है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि विवाहेतर संबंध कभी भी क्रूरता के आरोप के समर्थन में प्रासंगिक नहीं हो सकता। उसका महत्व मामले के तथ्यों, आरोपी के आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: मद्रास हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को अपर्याप्त पाते हुए पति को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील खारिज कर दी। अदालत का जोर इस बात पर था कि आपराधिक दोषसिद्धि के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं, बल्कि कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को संदेह से परे साबित करना जरूरी है।
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