हर तीन में से एक वकील फर्जी, सुप्रीम कोर्ट सख्त, राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री पर केंद्र और BCI से मांगा जवाब
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, हर तीन में से एक वकील फर्जी है
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के वकीलों के लिए आधार जैसी राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और यूजीसी से जवाब मांगा है। बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया का दावा है कि देश में हर तीन में से एक वकील फर्जी है।
नई दिल्ली: देश में वकालत के पेशे में कथित घुसपैठ और फर्जी वकीलों की बढ़ती संख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने देशभर के वकीलों के लिए आधार की तर्ज पर एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य पक्षों से जवाब तलब किया है।
हर वकील के लिए होगा यूनिक डिजिटल पहचान नंबर
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा कि यह विचार नवाचारपूर्ण प्रतीत होता है और आधुनिक तकनीक की सहायता से इसे लागू किया जा सकता है।
प्रस्तावित डिजिटल रजिस्ट्री के तहत प्रत्येक नामांकित अधिवक्ता को एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान संख्या (Unique National Advocate Identifier) दी जाएगी। इसका उद्देश्य फर्जी वकीलों और अवैध रूप से प्रैक्टिस करने वालों पर प्रभावी अंकुश लगाना है।
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने दायर की है याचिका
यह याचिका बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि देश में वकालत के पेशे में गंभीर घुसपैठ हो चुकी है और हर तीन में से एक वकील कथित रूप से फर्जी है।
बीएआई की ओर से अधिवक्ता विपिन नायर और प्रशांत कुमार ने अदालत में पक्ष रखा।
डिजिटल आचार संहिता बनाने की भी मांग
याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49 के तहत इंटरनेट मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े मामलों के लिए एक डिजिटल आचार संहिता (Digital Code of Conduct) बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि बदलते डिजिटल दौर में वकीलों के आचरण और ऑनलाइन गतिविधियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हैं।
केंद्र, BCI और UGC को जारी हुआ नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
मामले को जुलाई में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
कानून विश्वविद्यालयों को भी पक्षकार बनाने पर जोर
सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि कानून विश्वविद्यालयों को भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाना चाहिए, क्योंकि अधिवक्ताओं की शिक्षा और पंजीकरण व्यवस्था से उनका सीधा संबंध है।
इस पर बीएआई की ओर से कहा गया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को पहले ही याचिका में पक्षकार बनाया जा चुका है।
तकनीक के जरिए फर्जी वकीलों पर लग सकती है रोक
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि भविष्य में देशभर के अधिवक्ताओं के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जा सकता है, जिससे उनकी शैक्षणिक योग्यता, नामांकन और पेशेवर पहचान का सत्यापन आसान होगा।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो फर्जी वकीलों की पहचान करने और कानूनी पेशे में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
मामला : Bar Association of India v. Union of India & Ors.
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