बेटे के इलाज के लिए देना पड़ा था इस्तीफा, हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को किया बहाल

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ऑटिज्म से पीड़ित नाबालिग बेटे के इलाज के लिए भुवनेश्वर पोस्टिंग न मिलने पर इस्तीफा देने वाली न्यायिक अधिकारी को ओडिशा हाईकोर्ट ने बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस्तीफा वापस लेने के बाद उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था।

ओडिशा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस न्यायिक अधिकारी इप्सिता महांती को सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है, जिन्होंने अपने नाबालिग बेटे के इलाज के लिए राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में पोस्टिंग की मांग पूरी नहीं होने के बाद “मजबूर परिस्थितियों” में इस्तीफा दिया था।

जस्टिस मनाश रंजन पाठक और जस्टिस शिबो शंकर मिश्रा की खंडपीठ ने 10 सितंबर को दिए फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा इस्तीफा वापस लेने का आवेदन समय रहते दिया गया था। ऐसे में सक्षम प्राधिकारी द्वारा बाद में इस्तीफा स्वीकार किया जाना उचित नहीं था।

तीन सप्ताह के भीतर वापस ले लिया था इस्तीफा

इप्सिता महांती ने 29 नवंबर 2022 को सेवा से इस्तीफा देने की अनुमति मांगी थी। इसका कारण उनके 15 वर्षीय बेटे का ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर समेत अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझना था।

हालांकि, करीब तीन सप्ताह बाद 21 दिसंबर 2022 को उन्होंने हाईकोर्ट से अपने मामले पर पुनर्विचार करने और इस्तीफा स्वीकार न करने का अनुरोध किया।

इस बीच, हाईकोर्ट ने उनके इस्तीफे की सिफारिश ओडिशा सरकार को कर दी थी। राज्य सरकार ने 2 जनवरी 2023 को इस्तीफा स्वीकार कर लिया और उसी दिन विधि विभाग ने उन्हें सेवा से मुक्त करने की अधिसूचना जारी कर दी।

महांती ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

बेटे के इलाज के लिए भुवनेश्वर में पोस्टिंग की थी मांग

इप्सिता महांती फरवरी 2015 में ओडिशा न्यायिक सेवा में शामिल हुई थीं। उनकी पोस्टिंग पहले बरगढ़ में हुई और बाद में उन्हें पुरी, मदनपुर-रामपुर, चांदिखोल तथा अन्य स्थानों पर स्थानांतरित किया गया।

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अक्टूबर 2019 में उन्हें भुवनेश्वर में पोस्टिंग मिली। उनके बेटे की चिकित्सा और थेरेपी की जरूरतों को देखते हुए उन्होंने भुवनेश्वर में अपनी पोस्टिंग को करीब ढाई वर्ष और जारी रखने का अनुरोध किया।

2022 में उन्होंने दोबारा राज्य की राजधानी में दो वर्ष तक रहने की अनुमति मांगी, ताकि उनके बेटे का समुचित उपचार जारी रह सके। यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया और जुलाई 2022 में उनका तबादला ढेंकानाल जिले के हिंदोल कर दिया गया।

महांती के अनुसार, हिंदोल में उनके बेटे के लिए आवश्यक उपचार और थेरेपी की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। सितंबर 2022 में उन्होंने फिर अधिकारियों से अनुरोध किया और कहा कि समय पर आवश्यक इलाज और थेरेपी नहीं मिलने से उनके बेटे को अपूरणीय नुकसान हो सकता है।

जब करीब दो महीने तक इस अनुरोध पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने नवंबर 2022 में इस्तीफा देने का फैसला किया।

हाईकोर्ट: समय पर इस्तीफा वापस लेने के बावजूद स्वीकार किया गया

खंडपीठ ने कहा कि यह महांती की गलती नहीं थी कि उनके इस्तीफे को वापस लेने के आवेदन पर उसी तेजी से कार्रवाई नहीं हुई, जिस तेजी से इस्तीफे के आवेदन को आगे बढ़ाया गया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय पर इस्तीफा वापस लेने के बावजूद केवल प्रशासनिक स्तर पर आवेदन पर कार्रवाई में हुई देरी के कारण अधिकारी को दंडित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि महांती ने इस्तीफा वापस लेने में लागू वैधानिक प्रावधानों और दिशानिर्देशों का पालन किया था।

‘एक विवेकशील और समझदार व्यक्ति यही करता’

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अपने बच्चे की देखभाल के लिए इस्तीफा वापस लेने का महांती का निर्णय “एक rational and prudent person” द्वारा उठाया जाने वाला स्वाभाविक कदम था।

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अदालत ने माना कि उन्होंने अपने बच्चे के हित को देखते हुए इस्तीफा वापस लेने का निर्णय लिया था और इसमें उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

सेवा में निरंतरता का लाभ, लेकिन बैक वेज नहीं

हाईकोर्ट ने इप्सिता महांती को Additional Civil Judge (Junior Division)-cum-SDJM के पद पर बहाल करने का आदेश दिया है।

अदालत ने उनकी सेवा में 3 जनवरी 2023 से निरंतरता मानी है और अन्य परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया है।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस अवधि के लिए बकाया वेतन (back wages) नहीं मिलेगा।

फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि एक न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने बच्चे के आवश्यक उपचार को सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदम को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई देरी के कारण प्रतिकूल परिणाम का आधार नहीं बनाया जा सकता।

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