अदालत ने कहा कि जब तक ऐसे वाहनों की पहचान, निगरानी और जब्ती नहीं होगी, तब तक संगठित अवैध खनन नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाना संभव नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और संकटग्रस्त जलीय जीवों पर खतरे को गंभीर बताते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीव आवासों की रक्षा राज्य का संवैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और NHAI को कड़े निर्देश जारी किए।
चंबल अभयारण्य में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में जारी अवैध रेत खनन और उससे संकटग्रस्त जलीय वन्यजीवों को हो रहे खतरे पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों और वन्यजीव आवासों की सुरक्षा राज्य का सतत संवैधानिक दायित्व है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21, 48-ए और 51-ए(ग) राज्य को पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए सक्रिय एवं प्रभावी कदम उठाने के लिए बाध्य करते हैं।
अदालत ने कहा कि अवैध रेत खनन को केवल मामूली जुर्मानों या सीमित प्रशासनिक कार्रवाइयों से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए निगरानी, प्रवर्तन, जब्ती, अभियोजन और संस्थागत समन्वय पर आधारित एक मजबूत और प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।
क्या है मामला?
यह मामला राष्ट्रीय चंबल क्षेत्र में जारी अवैध रेत खनन से जुड़ा है, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन एवं वन्यजीव संरक्षण क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से इस मामले की निगरानी कर रहा है। पूर्व में अदालत ने राज्यों द्वारा दायर अनुपालन हलफनामों, केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्टों और एमिकस क्यूरी की दलीलों का परीक्षण किया था।
कोर्ट ने पाया था कि राज्यों ने कुछ प्रारंभिक कदम तो उठाए हैं, लेकिन उसके पूर्व आदेशों का प्रभावी अनुपालन नहीं हुआ और कई महत्वपूर्ण उपाय केवल कागजों तक सीमित रहे।
राजस्थान की निष्क्रियता पर कोर्ट की नाराजगी
अदालत ने विशेष रूप से राजस्थान सरकार की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त किया।
कोर्ट ने कहा कि निगरानी, अंतर-विभागीय समन्वय और अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई संबंधी पूर्व निर्देशों का पर्याप्त पालन नहीं किया गया। यह भी पाया गया कि बड़ी संख्या में बिना पंजीकरण वाले वाहन और भारी मशीनें अवैध खनन एवं परिवहन में लगी हुई हैं।
अदालत ने कहा कि जब तक ऐसे वाहनों की पहचान, निगरानी और जब्ती नहीं होगी, तब तक संगठित अवैध खनन नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाना संभव नहीं है।
पर्यावरण संरक्षण केवल अदालत के हस्तक्षेप पर निर्भर नहीं हो सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकांश कदम तब उठाए गए जब वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया।
इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा—
“पर्यावरणीय प्रशासन को केवल न्यायालय के बार-बार हस्तक्षेप या अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही के भय पर आधारित प्रतिक्रियात्मक प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण एक सतत संवैधानिक दायित्व है और इसे केवल अदालत में हलफनामे दाखिल कर पूरा नहीं माना जा सकता।
वन विभाग में रिक्त पदों पर चिंता
कोर्ट ने वन विभागों में बड़ी संख्या में रिक्त पदों, विशेषकर वन रक्षकों (Forest Guards) की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
अदालत ने कहा कि वन रक्षक अवैध खनन, अतिक्रमण और वन्यजीव आवासों के विनाश के खिलाफ रक्षा की पहली और सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति हैं।
कोर्ट ने कहा—
“पर्याप्त फील्ड स्टाफ के बिना केवल तकनीकी उपकरणों या प्रशासनिक आदेशों से पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।”
NH-44 पुल की सुरक्षा को लेकर निर्देश
मामले में मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (NH-44) के पुल के निकट हो रहे अवैध खनन पर भी अदालत ने चिंता जताई।
हालांकि निरीक्षण में पुल वर्तमान में सुरक्षित पाया गया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि पुल की संरचनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल निरीक्षण तक सीमित नहीं रह सकता।
अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे खतरों को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी और सुरक्षा उपाय अपनाए।
चंबल नदी में प्रदूषण और ई-फ्लो का मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशक्त समिति द्वारा उठाई गई उस चिंता पर भी ध्यान दिया जिसमें पुल से कचरा और अन्य अपशिष्ट पदार्थ चंबल नदी में गिराए जाने की बात कही गई थी।
कोर्ट ने कहा कि इससे नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और जलीय जीव-जंतु प्रभावित हो रहे हैं।
अदालत ने चंबल नदी में पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flows/E-Flows) बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया और कहा कि जल प्रवाह में कमी से जलीय जैव विविधता और आवासीय संपर्क (Habitat Connectivity) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अभयारण्य क्षेत्र को डीनोटिफाई करने पर रोक
राजस्थान सरकार द्वारा राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के लगभग 732 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य से बाहर करने (De-notification) के प्रस्ताव का भी अदालत ने संज्ञान लिया।
कोर्ट ने कहा कि वन्यजीव अभयारण्य के किसी हिस्से को डीनोटिफाई करने के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट की अनुमति भी आवश्यक है।
चूंकि इस संबंध में पहले ही रोक लगाई जा चुकी है, इसलिए अदालत ने इस मुद्दे पर आगे की सुनवाई बाद में करने का निर्णय लिया।
राज्यों को दिए गए 11 महत्वपूर्ण निर्देश
अवैध रेत खनन पर प्रभावी रोक लगाने और चंबल अभयारण्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत निर्देश जारी किए।
1. वन विभाग में रिक्त पद भरने का आदेश
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को वन रक्षक सहित सभी महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती प्रक्रिया एक वर्ष के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया गया।
2. छह महीने में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने का आदेश
राज्यों को सीसीटीवी कैमरे, कंट्रोल रूम, निगरानी प्रणाली और तकनीकी बुनियादी ढांचे को युद्धस्तर पर स्थापित करने का निर्देश दिया गया।
3. अवैध खनन में लगे वाहनों की तत्काल जब्ती
कोर्ट ने बिना पंजीकरण वाले, फर्जी नंबर प्लेट वाले तथा अवैध खनन में प्रयुक्त वाहनों और मशीनों को तत्काल जब्त कर उनके विरुद्ध जब्ती एवं कुर्की की कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया।
4. संगठित खनन गिरोहों पर कार्रवाई
अदालत ने निर्देश दिया कि केवल चालक ही नहीं बल्कि वाहन मालिक, वित्तपोषक, ठेकेदार और अवैध खनन नेटवर्क से जुड़े अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध भी आपराधिक कार्रवाई की जाए।
5. डिजिटल रिकॉर्ड बनाए जाएं
सभी जब्त वाहनों, उनके स्वामित्व, पूर्व उल्लंघनों और दर्ज आपराधिक मामलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने का आदेश दिया गया।
6. वन कर्मियों को सुरक्षा
वन रक्षकों और अन्य फील्ड अधिकारियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए राज्यों को उनके लिए कानूनी संरक्षण प्रदान करने पर विचार करने का निर्देश दिया गया।
7. NH-44 पुल के आसपास हाई-रिजॉल्यूशन CCTV
NHAI को मोरेना-धौलपुर सीमा पर स्थित पुल के आसपास हाई-रिजॉल्यूशन नाइट विजन सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया गया।
8. निगरानी डेटा साझा करने का निर्देश
NHAI को पुलिस, वन विभाग और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों को लाइव सीसीटीवी एक्सेस उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।
9. चंबल नदी में कचरा फेंकने पर रोक
कोर्ट ने पुल और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा अवरोधक, चेतावनी बोर्ड और अन्य उपाय स्थापित कर नदी में कचरा गिरने से रोकने का निर्देश दिया।
10. स्थानीय लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार
राज्यों को स्थानीय समुदायों के लिए कौशल विकास, रोजगार और आजीविका कार्यक्रम विकसित करने को कहा गया, ताकि लोगों की अवैध खनन पर निर्भरता कम हो सके।
11. हर दो महीने में समीक्षा
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को हर दो महीने में प्रगति की समीक्षा कर सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग को भी बनाया पक्षकार
सुप्रीम कोर्ट ने जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग को भी मामले में पक्षकार बनाने का आदेश दिया है।
सभी संबंधित प्राधिकरणों को अगली सुनवाई से पहले नई प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 को
मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई 2026 को होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों की रक्षा केवल सरकारी औपचारिकताओं से नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी कार्यवाही से ही संभव है।
मामला: Illegal Sand Mining in National Chambal Sanctuary
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