महिला वकील पर हमले पर सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान, निष्पक्ष जांच के आदेश

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दिल्ली में महिला अधिवक्ता पर पति द्वारा हमले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच, बच्चों की सुरक्षा और 3 लाख रुपये अंतरिम मुआवजे के निर्देश दिए।


सुप्रीम कोर्ट का त्वरित हस्तक्षेप

Supreme Court of India ने एक महिला अधिवक्ता पर उसके पति द्वारा किए गए कथित क्रूर हमले के मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए त्वरित हस्तक्षेप किया है। न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया और निष्पक्ष एवं निष्कलंक जांच सुनिश्चित करने के लिए अंतरिम आदेश जारी किए।


सीजेआई को पत्र से शुरू हुआ मामला

यह मामला तब सामने आया जब एक सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। पत्र में महिला अधिवक्ता पर धारदार हथियार से किए गए हमले का जिक्र किया गया था और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के मुआवजा योजना के तहत सहायता देने की भी मांग की गई।


गंभीर हालत में AIIMS में भर्ती

पत्र के साथ संलग्न तस्वीरों में महिला अधिवक्ता के शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर गंभीर चोटें दिखाई गईं। हमले के बाद उन्हें गंभीर अवस्था में All India Institute of Medical Sciences के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है।


एफआईआर दर्ज, पति गिरफ्तार

मामले में दिल्ली के खजूरी खास थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने 25-26 अप्रैल 2026 की रात आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया। वहीं, ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों पर भी आरोप लगे हैं, जो फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं।

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नाबालिग बेटियों को लेकर चिंता

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़िता की तीन नाबालिग बेटियां हैं। आरोप है कि हमले के बाद ससुराल पक्ष दो छोटी बेटियों (1 वर्ष और 4 वर्ष) को अपने साथ ले गया, जबकि 12 वर्षीय बड़ी बेटी को घर के बाहर छोड़ दिया गया।


पीठ ने दिए अहम निर्देश

मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कई महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए:

  • दिल्ली पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया गया कि जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी, अधिमानतः महिला अधिकारी (ACP/DCP रैंक) को सौंपी जाए।
  • पुलिस को दो नाबालिग बच्चियों का पता लगाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा गया।
  • यदि बच्चियां दादी के पास सुरक्षित हैं, तो अगली सुनवाई तक मौजूदा व्यवस्था जारी रखी जा सकती है।
  • बड़ी बेटी की कस्टडी फिलहाल ननिहाल (मातृ पक्ष) के पास ही बनी रहेगी।

3 लाख रुपये की अंतरिम सहायता

अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता को इलाज के लिए तत्काल आर्थिक सहायता की आवश्यकता है। इसको ध्यान में रखते हुए National Legal Services Authority को निर्देश दिया गया कि वह महिला अधिवक्ता को 3 लाख रुपये की अंतरिम सहायता राशि जारी करे।


निष्पक्ष जांच पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में सभी पक्षों के अधिकारों का सम्मान करते हुए निष्पक्ष और निष्कलंक जांच सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि कोई भी दोषी कानून से बच न सके।

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अगली सुनवाई 11 मई को

मामले को आगे की सुनवाई के लिए 11 मई 2026 को सूचीबद्ध किया गया है। कोर्ट के अंतरिम निर्देश तब तक प्रभावी रहेंगे।


मामले का महत्व

यह मामला न केवल घरेलू हिंसा के गंभीर पहलू को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका संवेदनशील मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर पीड़ितों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभा सकती है।


केस संदर्भ

In Re Brutal Assault on a Member of the Legal Fraternity, सुओ मोटू रिट याचिका (सिविल) संख्या 4/2026, आदेश दिनांक 27 अप्रैल 2026।


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