फैमिली कोर्ट ने मां की अर्जी को 10 दिन की देरी के आधार पर खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बेटी की कस्टडी विवाद में फैमिली कोर्ट के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट के 22 जुलाई 2026 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद फैमिली कोर्ट ने उनके विपरीत निष्कर्ष दर्ज किए। पिता को हाई कोर्ट के आदेश का तत्काल पालन करने का निर्देश दिया गया।
नाबालिग बेटी की कस्टडी और विजिटेशन से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के कामकाज पर गंभीर नाराजगी जताई। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पाली की खंडपीठ ने कहा कि वह इस बात से “astonished” है कि फैमिली कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के विपरीत निष्कर्ष दर्ज किए।
सुप्रीम कोर्ट ने पिता की विशेष अनुमति याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए उन्हें हाई कोर्ट के 22 जुलाई 2026 के आदेश का तत्काल पालन करने का निर्देश दिया। साथ ही, कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के न्यायिक अधिकारी को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा जताई।
मां के पुणे स्थानांतरण के बाद बदली विजिटेशन व्यवस्था
पिता ने 22 अगस्त 2025 को बेंगलुरु फैमिली कोर्ट में नाबालिग बेटी की कस्टडी मांगते हुए कार्यवाही शुरू की थी। फैमिली कोर्ट ने 17 अप्रैल 2026 को पिता को विजिटेशन का अधिकार दिया था।
इसके तहत पिता को हर चौथे रविवार सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक सार्वजनिक स्थान पर बेटी से मिलने और हर दूसरे शुक्रवार शाम से रविवार शाम तक रातभर की कस्टडी की अनुमति दी गई थी।
बाद में मां नौकरी के सिलसिले में पुणे चली गईं। चूंकि पहले की विजिटेशन व्यवस्था उस समय बनाई गई थी जब दोनों पक्ष बेंगलुरु में रह रहे थे, मां ने कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया।
22 जुलाई 2026 को हाई कोर्ट ने व्यवस्था में संशोधन करते हुए पिता को वैकल्पिक दिनों में शाम 7 से 8 बजे के बीच 20 मिनट तक ऑडियो/वीडियो कॉल की अनुमति दी। इसके अलावा पिता को महीने में एक बार दो दिन के लिए बच्ची की कस्टडी देने का निर्देश दिया गया। पिता शुक्रवार को स्कूल के बाद बच्ची को ले सकते थे और रविवार शाम तक उसे पुणे में मां को वापस करना था। उन्हें पुणे में रहने या बच्ची को बेंगलुरु ले जाने का विकल्प भी दिया गया था।
मां ने कस्टडी छीनने का लगाया आरोप
मां के अनुसार, 18 जुलाई 2026 को फैमिली कोर्ट ने पिता को सीमित समय के लिए कोर्ट परिसर में बच्ची से मिलने की अनुमति दी थी। मुलाकात के बाद बच्ची को मां के पास वापस कर दिया गया।
मां का आरोप था कि कोर्ट परिसर से बाहर निकलने के बाद पिता ने बिना किसी कानूनी अधिकार के बच्ची को जबरन अपनी कस्टडी में लिया और वहां से चले गए। उन्होंने पुलिस और आपातकालीन हेल्पलाइन से संपर्क किया।
बाद में मां ने पुलिस शिकायत दर्ज कराई और हैबियस कॉर्पस कार्यवाही शुरू की। 28 जुलाई 2026 को उन्होंने फैमिली कोर्ट में बच्ची को तत्काल पेश करने और कस्टडी वापस दिलाने की मांग करते हुए आवेदन दिया।
पिता ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह बच्ची को उसकी मौसी के घर ले गए थे और मां भी उनके साथ कार में गई थीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि बच्ची उनके साथ सहज थी और उनकी कस्टडी में रहना चाहती थी।
फैमिली कोर्ट ने मां की अर्जी को 10 दिन की देरी के आधार पर खारिज किया
फैमिली कोर्ट ने मां की 28 जुलाई की अर्जी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि 18 जुलाई को उन्होंने कस्टडी कब खोई और आवेदन 10 दिन की देरी से दाखिल किया गया।
फैमिली कोर्ट ने यहां तक कहा कि मां ने “cleverly taken time” लेकर कस्टडी के लिए आवेदन किया और वह अपने ही गलत आचरण का लाभ नहीं उठा सकतीं।
इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि मां की अर्जी अब विचार योग्य नहीं रह गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों पर सवाल उठाए
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता। मां के affidavit में बच्ची को उनकी कस्टडी से ले जाने की परिस्थितियों का स्पष्ट विवरण मौजूद था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि फैमिली कोर्ट ने मां के पुणे स्थानांतरण को लेकर जो निष्कर्ष निकाला, वह भी रिकॉर्ड के अनुरूप नहीं था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने 22 जुलाई के आदेश में मां के पुणे स्थानांतरित होने के तथ्य को पहले ही ध्यान में रखा था और उसी आधार पर विजिटेशन की व्यवस्था में बदलाव किया था।
मां की ओर से यह भी बताया गया कि फैमिली कोर्ट ने उनके पुणे के पते को उपलब्ध नहीं बताया, जबकि वह पता आवेदन के cause title में दर्ज था।
“हम हैरान हैं…” — सुप्रीम कोर्ट
फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात से “astonished” है कि 22 जुलाई 2026 के हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद फैमिली कोर्ट ने ऐसे निष्कर्ष दर्ज किए जो हाई कोर्ट के आदेश के विपरीत थे।
सुप्रीम कोर्ट ने पिता की याचिका में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया और उन्हें निर्देश दिया कि वे हाई कोर्ट के आदेश का तुरंत पालन करें।
हालांकि, कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के न्यायिक अधिकारी के आचरण को लेकर मामले को यहीं समाप्त नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति कर्नाटक हाई कोर्ट के Registrar General को भेजने और उसे हाई कोर्ट के Chief Justice के समक्ष रखने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी से भविष्य में “more cautious” रहने की अपेक्षा जताई।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने:
- पिता की SLP में हस्तक्षेप करने से इनकार किया;
- पिता को 22 जुलाई 2026 के कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश का तत्काल पालन करने का निर्देश दिया;
- फैमिली कोर्ट द्वारा रिकॉर्ड के विपरीत निष्कर्ष दर्ज करने पर गंभीर आपत्ति जताई;
- आदेश की प्रति कर्नाटक हाई कोर्ट के Registrar General को भेजने का निर्देश दिया;
- मामले को Chief Justice of Karnataka High Court के संज्ञान में रखने को कहा; और
- संबंधित न्यायिक अधिकारी को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा जताई।
यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि अधीनस्थ न्यायालयों को उच्च न्यायालय के स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देशों का पूरी तरह पालन करना होता है। साथ ही, कस्टडी विवादों में तथ्यात्मक रिकॉर्ड की सावधानीपूर्वक जांच और बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
[Sandeep R. v. Manpreeth R., Special Leave Petition (Civil) Diary No. 50965 of 2026, decided on 25-8-2026]
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